अंतरिक्ष में भी महिलाओं से भेदभाव

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 16 Jul 2013 1:34 PM

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अंतरिक्ष में जाने वाले यान की टिकटों को जीतने के लिए कई देशों में हुई प्रतियोगिताओं में महिलाओं को भाग नहीं लेने दिया गया. गौरतलब है कि अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला वैलेंटीना तेरेश्कोवा की उपलब्धि की इस साल 50वीं वर्षगांठ है. साथ ही अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सैली राइड की अंतरिक्ष यात्रा की भी […]

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अंतरिक्ष में जाने वाले यान की टिकटों को जीतने के लिए कई देशों में हुई प्रतियोगिताओं में महिलाओं को भाग नहीं लेने दिया गया. गौरतलब है कि अंतरिक्ष में जाने वाली पहली महिला वैलेंटीना तेरेश्कोवा की उपलब्धि की इस साल 50वीं वर्षगांठ है. साथ ही अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री सैली राइड की अंतरिक्ष यात्रा की भी 30वीं वर्षगांठ है. अब तक 55 महिलाएं अंतरिक्ष की यात्रा कर चुकी हैं, लेकिन महिलाओं के प्रति लोगों का रुख अब तक नहीं बदला है.

इस साल जनवरी में अपोलो अंतरिक्ष यात्री एडविन एल्ड्रिन ने एक नायाब प्रतियोगिता का आयोजन किया. अंतरिक्ष ले जाने का वायदा करने वाली इस प्रतियोगिता में महिलाएं और पुरु ष, दोनों ही भाग ले सकते हैं. लेकिन समस्या यह है कि प्रतियोगिता के स्लोगन में लिखा है ‘एक आदमी जो हीरो बन कर लौटा’. जाहिर है कि यह प्रतियोगिता पुरु षों को ही ध्यान में रख कर तैयार की गयी.

लेकिन आश्चर्य तो तब हुआ, जब वैलेंटीना तेरेश्कोवा के ही देश, रुस ने मैक्सिको, यूक्रेन, कुवैत, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया की तरह इस प्रतियोगिता में महिलाओं को भाग लेने से रोक दिया.

लड़नी है लंबी लड़ाई

बस फिर क्या था. टि¦टर पर महिलाओं व पुरु ष, दोनों वर्गो का गुस्सा बरसने लगा. और इसी की उपज रहा सोशल नेटवर्क पर बना एक समूह ‘एस्ट्रोगल्र्स’, जो उन महिलाओं के समर्थन के लिए बनाया गया है, जिन्हें इस प्रतियोगिता में भाग लेने की इजाजत नहीं दी गयी है. इस अभियान को चलाने के लिए एक फेसबुक पेज भी बनाया गया है. रोजर इस अभियान का हिस्सा बनीं.

उनका कहना है, मुङो उन महिलाओं से प्रेरणा मिली जो इस प्रतियोगिता में हिस्सा ले रही हैं. मुङो उन ब्लॉग पोस्ट से भी प्रेरणा मिली जो महिलाओं के प्रति हो रहे भेद-भाव की बात कर रहे हैं.

हो रही चहुंओर निंदा

विज्ञान के क्षेत्र से जुड़ी सैंकड़ों महिलाओं ने इस प्रतियोगिता की निंदा की है. ब्रिटेन की केट आर्कलेस ग्रे ने पहली बार इस प्रतियोगिता से जुड़े लैंगिक भेदभाव के खिलाफ आवाज उठायी. उनका कहना है, इस प्रतियोगिता के जरिये पुराने विचारों का प्रचार किया जा रहा है. आयोजनकर्ताओं के पास एक बहुत अच्छा मौका था जिसके जरिये वे इस मुहिम का प्रचार कर सकते थे.

दिखा असर भी

इसके खिलाफ चलायी गयी महिलाओं की मुहिम कुछ हद तक सफल रही है. इस प्रतियोगिता की प्रायोजक कंपनी यूनिलिवर ने एक वक्तव्य जारी किया, जिसमें कहा गया कि इस प्रतियोगिता में पुरुष और महिलाओं दोनों को भाग लेने दिया जाये. इस वक्तव्य के बाद कुछ देशों ने इसका अमल भी किया. लेकिन क्या यह लड़ाई यहीं खत्म हो जाती है?

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