अरब में महिला फिल्मकारों की क्रांति

Updated at :16 Jul 2013 1:46 PM
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अरब में महिला फिल्मकारों की क्रांति

इस साल लंदन में आयोजित ‘बर्डस आइ व्यू’ फिल्म फेस्टिवल अरब महिलाओं के लिए कुछ खास रहा. इस फेस्टिवल में पहली बार अरब की महिला फिल्म निर्देशकों ने शिरकत की. इन अरब महिलाओं द्वारा बनायी गयी फीचर फिल्में लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहीं. फेस्टिवल के कार्यक्र मों की निदेशक एलम शकरेफर कहती […]

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इस साल लंदन में आयोजित ‘बर्डस आइ व्यू’ फिल्म फेस्टिवल अरब महिलाओं के लिए कुछ खास रहा. इस फेस्टिवल में पहली बार अरब की महिला फिल्म निर्देशकों ने शिरकत की. इन अरब महिलाओं द्वारा बनायी गयी फीचर फिल्में लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी रहीं.

फेस्टिवल के कार्यक्र मों की निदेशक एलम शकरेफर कहती हैं कि अरब महिला फिल्मकारों की फिल्में पूरी दुनिया में बेजोड़ हैं. पिछले साल जब हम कतर, दुबई और अबू धाबी की यात्र पर थे, हमने अरब महिलाओं का फिल्मों के प्रति उत्साह, जज्बा देखा था. अरब में फिल्म निर्माण की नयी लहर चल पड़ी है, और महिलाएं इसमें बढ़-चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं.

बना रहीं हैं खास पहचान

इस कार्यक्र म की शुरुआत हुई एनीमेरी जाकिर की फिल्म प्रीमियर ‘वेन आइ सॉ यू’ से. 2007 में बनी यह फिल्म किसी फलीस्तीनी महिला की बनायी पहली फिल्म है. ब्रितानी मूल की पहली मिस्री निर्देशक की फिल्में भी इस फेस्टिवल की विशेषता हैं. यह निर्देशक हैं, 24 साल की हना अब्दुल्ला.

इनकी फिल्म ‘द शैडो ऑफ ए मैन’ दिखायी गयीं. वजदा सऊदी अरब की किसी महिला द्वारा बनायी गयी पहली फीचर फिल्म है, जिसकी निर्देशक हायफा अल-मंसूर हैं. निर्देशक अल-मंसूर कहती हैं कि युवा महिलाएं बड़ी तादाद में ऑनलाइन हो रही हैं. वह सब अपनी एक खास पहचान बनाने को उतावली हैं.

उनकी फिल्म बनाने की महत्वाकांक्षा और अरब की कई सामाजिक परंपराओं का आपस में टकराव स्वाभाविक है. इस टकराव ने अरब की महिला फिल्म निर्माताओं के लिए इस तरह के कई खूबसूरत तनाव पैदा कर दिये हैं.

आसान नहीं है राह

दूसरी ओर, अरब में फिल्म से जुड़ी महिला कार्यकर्ताओं की स्थिति के बारे में नादिन कृश, जिन्होंने अल-अरिबया न्यूज चैनल पर बिग स्क्र ीन सिनेमा की पहल की, बताती हैं, ‘मध्य पूर्व देशों में सांस्कृतिक परिदृश्य बदल रहा है. औरतें दमन, गैरबराबरी और भ्रष्टाचार को चुनौती दे रही हैं और यहीं से उनकी कामयाबी की दास्तां शुरू होती है.’

वक्त हमारा है

38 साल की जहेन नवजेम ने फिल्म बनाते समय कई परेशानियों को झेला है. फिल्म शूट करने के दौरान उन्हें पीटा गया, गोलियां चलायी गयीं, यहां तक कि गिरफ्तार भी किया गया. फिल्मनिर्माता 36 वर्षीय चेरिन डेविस को भी अपनी फिल्म मई इन द समर बनाते समय कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ा.

इनकी तरह देश में ऐसी कई महिलाएं हैं जिन्हें ऐसे कदम उठाने के लिए अपनी जान तक गंवानी पड़ी. चेरिन डेविस कहती हैं, ‘यहां फिल्म की राह में कांटे ही कांटे हैं. मगर हम महिलाओं ने इस चुनौती को स्वीकारा. हमने जीवन के बेहद करीब और साहस से भरी कहानियों पर फिल्म बनायी.’ एक महिला का फिल्म बनाना आज भी समाज की प्रचिलत धारा के विपरीत ही माना जाता है. चेरिन ने इन सारी चुनौतियों से जूझते हुए अपना एक मुकम्मल मुकाम बनाया है.

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