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वैज्ञानिकों ने विकसित किया नया वाटर फिल्टर, आर्सेनिक मुक्त होगा पेयजल

Updated at : 02 Mar 2017 8:49 AM (IST)
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वैज्ञानिकों ने विकसित किया नया वाटर फिल्टर, आर्सेनिक मुक्त होगा पेयजल

उत्तर भारत के बड़े इलाके में खासकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा बहुत ज्यादा पायी जाती है. एशिया में तकरीबन साढ़े छह करोड़ लोग आर्सेनिक मिश्रित पानी से पैदा होनेवाले स्वास्थ्य जोखिमों से जूझ रहे हैं. इनमें से साढ़े तीन करोड़ लोग बांग्लादेश, 50 लाख भारत और साढ़े पांच […]

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उत्तर भारत के बड़े इलाके में खासकर गंगा के मैदानी क्षेत्रों में भूमिगत जल में आर्सेनिक की मात्रा बहुत ज्यादा पायी जाती है. एशिया में तकरीबन साढ़े छह करोड़ लोग आर्सेनिक मिश्रित पानी से पैदा होनेवाले स्वास्थ्य जोखिमों से जूझ रहे हैं. इनमें से साढ़े तीन करोड़ लोग बांग्लादेश, 50 लाख भारत और साढ़े पांच लाख नेपाल के हैं. इन इलाकों में ज्यादातर घरों में पेयजल के रूप में भूमिगत जल का इस्तेमाल होता है, लिहाजा यहां आर्सेनिक जनित बीमारियों का जोखिम ज्यादा पाया गया है.
कई बार यह जानलेवा भी साबित हुआ है. ऐसे में ऑस्ट्रेलिया के वैज्ञानिकों द्वारा भूमिगत जल से आर्सेनिक को हटाने के लिए विकसित किया गया फिल्टर बेहद उपयोगी साबित हो सकता है. आज के मेडिकल हेल्थ आलेख में जानते हैं इस उपयोगी फिल्टर व इससे संबंधित अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में …
दुनिया के 70 से अधिक देशों में पेयजल के रूप में भूमिगत जल का इस्तेमाल करनेवालों में इससे जुड़ी बीमारियों का गंभीर जोखिम पाया जाता है. भूमिगत जल में आर्सेनिक नामक जहर मौजूद होने के कारण इन देशों में 13.7 करोड़ लोगों का जीवन जोखिम में है. ‘साइंस अलर्ट’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ऑस्ट्रेलिया के शोधकर्ताओं ने एक नये फिल्ट्रेशन सिस्टम का विकास किया है, जिसके जरिये इस समस्या का समाधान किया जा सकता है. यह तकनीक आसान होने के साथ सस्ती होगी और इसमें रिसाइकिल्ड पार्ट्स का इस्तेमाल किया जा सकता है. यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी टीम ने इस नये फिल्टर का विकास किया है.
भूमिगत जल में से आर्सेनिक काे हटाने के लिए मौजूदा समय में जो प्रक्रिया अपनायी जाती है, उसकी लागत ज्यादा है और पूरी तरह से सक्षम नहीं है. इसका मतलब है कि भारत, वियतनाम और बांग्लादेश जैसे देशों में यह सिस्टम समग्रता से इस्तेमाल में नहीं लायी जाती है. नतीजन, इन देशों में एक बडी आबादी को कई प्रकार के कैंसर समेत गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल डिजॉर्डर जैसी अनेक बीमारियों का जोखिम झेलना होता है, जो एक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुकी है.
वियतनाम नेशनल यूनिवर्सिटी, वियतनाम एकेडमी ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी और वियतनाम के ही कुछ अन्य साझेदारों के के साथ मिल कर यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी के वैज्ञानिकों ने यह नया डिजाइन तैयार किया है. इसकी बड़ी खासियत यह है कि इसे बनाना बेहद आसान है और इसकी लागत भी बहुत कम है.
तीन प्रमुख कंपोनेंट्स से बना है यह उत्पाद
इस शोध के मुखिया सरवनामथ विघ्नेश्वरन का कहना है, ‘इस सिस्टम के तहत तीन प्रमुख कंपानेंट्स हैं : एक ऑर्गेनिक मेंब्रेन, एक टैंक या ड्रम, जिससे मेंब्रेन को जाेडा जाता है और तीसरा स्थानीय तौर पर उपलब्ध होनेवाले औद्योगिक वेस्ट प्रोडक्ट्स से बना हुआ एब्सॉर्प्टिव कारट्रेज यानी अवशोषक कारट्रेज है. इस सस्टेनेबल सिस्टम के जरिये स्थानीय रूप से मुहैया होनेवाले संसाधनों को प्रोत्साहित करेगा और आर्सेनिक कचरे को कम करेगा. इसका बडा फायदा यह होगा कि इससे पर्यावरण प्रदूषण कम होने के साथ लोगों का स्वास्थ्य और उनके जीवन की गुणवत्ता बेहतर होगी.’
इस सिस्टम में मौजूद मेंब्रेन कुछ प्रकार की अन्य चुनिंदा बाधाओं को मूल रूप से नष्ट करने में सक्षम होगा. साथ ही यह भूमिगत जल में मौजूद हानिकारक बैक्टीरिया और ठोस के रूप में मौजूद नुकसानदायक तत्वों को बाहर करेगा. यानी इस सिस्टम का अंतिम उत्पाद स्वच्छ पेयजल होगा. विघ्नेश्वरन कहते हैं, ‘इस फिल्टर सिस्टम को गुरुत्वाकर्षण ऊर्जा या सौर एनर्जी के माध्यम से या फिर हैंड पंप के द्वारा चलाया जा सकता है.
सामान्य तौर पर इसका मेंब्रेन करीब तीन वर्षों तक इस्तेमाल में लाया जा सकेगा, जबकि आर्सेनिक को सोखनेवाले कारट्रेज को एक नियमित अंतराल पर (जो आम तौर पर प्रत्येक तीन से छह महीने के बीच की समयावधि हो सकती है) बदलना होगा. यह वेस्ट कारट्रेज भी एक सुरक्षित बिल्डिंग मैटेरियल के तौर पर इस्तेमाल में लाया जा सकेगा. कुल मिला कर यह सिस्टम आर्सेनिक कचरे को सुरक्षित तरीके से निपटाने में कारगर साबित होगा.’
स्थानीय रूप से होगा निर्माण
शोधकर्ता टीम के सदस्यों काे यह भरोसा है कि इस उत्पाद का निर्माण, इंस्टॉलेशन और रख-रखाव समेत जैसी चीजें स्थानीय निर्माता कर सकते हैं. इसका अन्य फायदा यह भी होगा कि स्थानीय स्तर पर रोजगार का सृजन भी किया जा सकता है. इस वैश्विक समस्या के समाधान के लिए शोधकर्ता पिछले कई वर्षों से शोधकार्यों को अंजाम दे रहे थे और इसके लिए उन्होंने अनेक प्रोटोटाइप भी तैयार किया था और उनके नतीजे दर्शाये थे. आखिरकार उन्हें अब जाकर कामयाबी हाथ लगी है, जो दुनिया की एक बड़ी आबादी को राहत पहुंचा सकती है.
टेक्नोलॉजी अगेन्स्ट पॉवर्टी प्राइज
यह नया उत्पाद इसलिए भी महत्वपूर्ण और चर्चा में है, क्योंकि इसे गरीबों की समस्या से निपटने में सक्षम तकनीक का पुरस्कार (टेक्नोलॉजी अगेन्स्ट पॉवर्टी प्राइज) भी मिला है और वास्तविक में इसने उनके जीवन में बदलाव लाना शुरू कर दिया है. इनोवेशन एक्सचेंज और गूगल की साझेदारी के तहत दिये जानेवाले इस पुरस्कार के तहत पांच लाख डॉलर की रकम दी जाती है.
क्या है आर्सेनिक और क्यों है खतरनाक
आर्सेनिक एक गंधहीन और स्वादहीन धातु है, जो भूमि की सतह के नीचे प्रचुर मात्रा में पाया जाता है. कॉपर स्मेल्टिंग, खनन और काेयला जलाने से भी सह-उत्पाद के रूप में यह बनता है. आर्सेनिक के साथ अन्य रसायनों को मिला कर लकडियों को सुरक्षित रखनेवाली चीजें तैयार की जाती हैं. साथ ही इसका इस्तेमाल कपास व अन्य फसलों में कीटों को मारने के लिए भी किया जाता है.
क्या है इसका जोखिम
आर्सेनिक एएस-3 को इसका सबसे जहरीला स्वरूप माना जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन ने पेयजल में आर्सेनिक की प्रति लीटर मात्रा 0.01 मिलीग्राम तय की हुई है, जबकि भारत सरकार ने इसके लिए 0.05 मिलीग्राम तक आर्सेनिक का मानक तय किया हुआ है. पीने के पानी में इससे ज्यादा आर्सेनिक होना इनसान की सेहत के लिए घातक साबित हो सकता है.
इनसान की सेहत को कैसे प्रभावित करता है आर्सेनिक
भूमिगत जल में मौजूद आर्सेनिक को इनसान की आंत अवशोषित कर लेती है. वहां से रक्तवाहिनियां इन्हें शरीर के अनेक अंगों तक पहुंचाती हैं. शरीर में अवशोषित आर्सेनिक की मात्रा का पता नाखून और बाल के नमूनों से लगाया जाता है. आम तौर पर इनसान का शरीर आर्सेनिक की बहुत कम मात्रा का आदी होता है, जो मूत्र के जरिये बाहर निकल जाता है. लेकिन, ज्यादा मात्रा में आर्सेनिक का सेवन होने की दशा में यह मूत्र के जरिये पूरी तरह से बाहर नहीं निकल पाता है और इसका कुछ हिस्सा शरीर के अंदर ही रह जाता है. आर्सेनिक से इनसान की सेहत पर अनेक प्रकार के नकारात्मक असर दिखने शुरू हो जाते हैं.
पेयजल से कैसे निकाला जा सकता है आर्सेनिक
पानी को गर्म करके या उसे उबाल कर आर्सेनिक को नहीं निकाला जा सकता है. चूंकि यह वोलेटाइल पदार्थ नहीं है, लिहाजा इसे उबालने से इसकी सांद्रता बढ़ जाने का ही खतरा रहता है.
यहां तक कि क्लोरिन डिसिन्फेक्शन से भी आर्सेनिक को नहीं हटाया जा सकता है. इसे हटाने के लिए सामान्य तौर पर आरओ यानी रिवर्स ऑस्मोसिस, अल्ट्रा-फिल्ट्रेशन, डिस्टिलेशन या आयन एक्सचेंज जैसी प्रणालियां ही इस्तेमाल में लायी जाती हैं.
66,663 इलाकों में नहीं है साफ पेयजल की सुविधा
भारत में 66,663 इलाकों में लोगों को साफ पेयजल नहीं मिल पाता है. हाल ही में राज्य सभा में एक जानकारी मुहैया कराते हुए पेयजल और स्वच्छता मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने यह बात कही है. तोमर ने कहा कि आर्सेनिक और फ्लूराइड के कारण देश के इन इलाकों में भूमिगत जल पीने लायक नहीं है.
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