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सर्व धर्म समभाव के प्रतीक गुरु गोबिंद सिंह

Updated at : 24 Dec 2016 8:05 AM (IST)
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सर्व धर्म समभाव के प्रतीक गुरु गोबिंद सिंह

हिंदु कोई तुर्क कोई, राफजी इमाम साफी मानस की जाति सबै एकै पहिचानबो इस सिद्धांत के मानने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी की किसी मजहब से शत्रुता नहीं थी. कुछ अज्ञानी लोग यह समझाते हैं कि गुरु गाेबिंद सिंह का इस दुनिया में आना और खालसा पंथ की स्थापना केवल मुसलमान बादशाहों से लड़ने के […]

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हिंदु कोई तुर्क कोई, राफजी इमाम साफी

मानस की जाति सबै एकै पहिचानबो

इस सिद्धांत के मानने वाले गुरु गोबिंद सिंह जी की किसी मजहब से शत्रुता नहीं थी. कुछ अज्ञानी लोग यह समझाते हैं कि गुरु गाेबिंद सिंह का इस दुनिया में आना और खालसा पंथ की स्थापना केवल मुसलमान बादशाहों से लड़ने के लिए ही थी. दूसरे शब्दों में ऐसे समाज विरोधी लोग उन्हें इसलाम का दुश्मन मानते हैं.

वास्तव में उन का इस दुनिया में आना तीन मकसदों के लिए हुआ था. धर्म चलावन जो धर्म इस देश में चल रहे हैं उनके मानने वालों को अपनी-अपनी पूजा इबादत के तरीकों में कोई रुकावट नहीं हो. संत उबारन अच्छी प्रवृत्ति, नेक काम करने वालों की सदा रक्षा करना. दुष्ट सभन को मूल अपारन सभी दुष्ट प्रवृत्ति वालों को जड़ से उखाड़ कर फेंक देना, मिटा देना. यही कारण है कि उनका पहला युद्ध उन हिंदू पहाड़ी राजाओं से हुआ जो निरीह और कमजोर लोगों पर अत्याचार कर रहे थे. इसलिए ही उन्हें धर्म (ईमान) रक्षक और अत्याचार तथा अत्याचारी से युद्ध कर उनका नाश करने वाला सिपाही कहा जाता है. गुरु गाेबिंद सिंह की सेना में हिंदू और मुसलमान दोनों कौमों के जांबाज सिपाही थे. उनके व्यक्तित्व का दूसरा रूप एक साहित्य साधना के कवि रूप का है. उनके दरबार में 52 कवि थे, जिनमें 2 मुसलमान थे. गुरु जी ने मुसलमान काजी से फारसी की शिक्षा ली थी और हिंदू शिक्षक से हिंदी और संस्कृत का अध्ययन किया था. दूसरे शब्दों में उनके संत और सिपाही रूप में दोनों मजहबों के लोग शामिल थे. भंगानी के युद्ध में उन्हें मुसलिम फकीर बुद्धु शाह से बहुत मदद मिली थी.

जिस समय चमकौर का युद्ध चल रहा था जहां कुछ गिनती के बहादुर सिपाहियों का सामना औरंगजेब के लाखों फौजियों से हो रहा था वहां एक समय ऐसा आ गया जब गुरु जी दुश्मन की फौजी सेना से बुरी तरह घिर गये थे तो उन्हें जान बचाने के लिए युद्ध भूमि से निकलना पड़ा, भयभीत होकर नहीं बल्कि सामरिक दृष्टि से, तो उस विपत्ति के समय दो मुसलमान नबी खान और गनी खान ने उन्हें माछीवाड़ा जंगल से निकाल था. उन्होंने गुरु जी को नीले वस्त्र (जो अक्सर मुसलिम फकीर पहनते हैं) पहना दिये और एक पालकी में बिठा कर अपने कंधों पर उठा लिया. मार्ग में अनेकों सिपाहियों ने उन्हें रोका और पूछा वे लोग किसे पालकी में बैठा कर ले जा रहे हैं तो उन्होंने बताया कि यह उच्च के पीर अर्थात ऊंचे पीर हैं जिन्हें वह उनकी दरगाह में ले जा रहे हैं. इस प्रकार उस विपत्ति के समय उन्होंने गुरु जी की हिफाजत कर के अपनी गुरु के प्रति अकीदत का परिचय दिया. गुरु जी ने कहा भी है मंदिर और मसजिद ओही पूजा और नमाज ओही मानस सबै एक हैं. इतिहास गवाह है कि जिस समय गुरु गाेबिंद सिंह का अवतार पटना में हुआ था, तो सुदूर खरम निवासी सैयद भीखन शाह हिंदुस्तान आये. इबादत के वक्त ऐसा महसूस हुआ कि वहां से पूरब (मशरिक) में कोई गैबी हस्ती हिन्दोस्तान की सरजमीन पर तशरीफ लायी है. उनसे रूबरू होने के लिए वह पटना तशरीफ लाये और बालक के दीदार की ख्वाहिश जाहिर की. घर वाले पहले तो तैयार नहीं हुए मगर सारी बात समझने के बाद उन्हें वहां ले गये जहां बालक गाेबिंद राय अपनी माता गुजरी की गोद में बैठे थे. माता गुजरी और पिता गुरु तेग बहादुर के घर शादी के 32 साल के बाद बालक गाेबिंद राय का जन्म हुआ था. कहते हैं पीर भीखन शाह ने दो कूजे एक में-पानी दूसरे में दूध उनके सामने रख दिये. मन ही मन उन्होंने सोच रखा था कि अगर गुरु जी दूध वाले कूजे पर हाथ रखते हैं तो वह हिंदुओं के हिमायती होंगे पानी वाले कूजे पर हाथ रखते हैं तो मुसलमानों के हिमायती होंगे. यह गुरु गाेबिंद सिंह की पहली परीक्षा थी.

बालक गाेबिंद ने हल्की सी मुस्कुराहट के साथ दोनों कूजों पर एक साथ हाथ रख दिये फिर दूध व पानी को उड़ेल कर मिला दिया. पीर भीखन शाह समझ गये कि यह दोनों के हैं और उनका सिर सजदे में झुक गया. वह एक रूहानी तसकीन के साथ वापस लौट गये. कहते है एक बार फकीर गियासुदीन से मजाक के लहजे में उन्होंने पूछा, आप किसके लिए हैं और यहां क्यों आये हैं, तो फकीर ने कहा मैं अपने दोस्त और दानिशमंद भाई नंदलाल के लिए आया हूं. जब किसी सिख ने कुछ एतराज करने की चेष्टा की, तो गुरु जी बोले जो मेरे भाई नंदलाल का दोस्त है, वह मेरा भी दोस्त हुआ. इसी तरह सैयद बेग और मैमूखान उनके अदबी साथी थे जो उनके 52 कवियों में शामिल थे. इसलिए हम कह सकते हैं कि गुरु जी किसी एक कौम के रहबर नहीं थे बल्कि सारी मानवता की भलाई के लिए इस संसार में आये थे चाहे वो हिंदू हो या मुसलमान.

माता गुजरी जी का कुआं

बाल गोबिंद का जीवन विविधताओं से भरपूर व रोचक है. गुरु साहिब के जन्म स्थान पर माता गुजरी जी का कुआं है जिसका पानी मीठा था, पास-पड़ोस व दूर-दराज के लोग भी इससे जल लेने आते, कुएं के पास पानी लेने वाली औरतों की खासी भीड़ रहती थी. गोबिंद राय, पानी ले जाती औरतों के घड़े को गुलेल से ढेले मार कर तोड़ देते, काफी दिनों तक यह क्रम चलता रहा और बाल गोबिंद की क्रीड़ा की शिकार होती रही. अंत: परेशान होकर उन्होंने माता गुजरी जी से शिकायत की आपका लाडला इतना नटखट है कि वह गुलेल से ढेला मार कर घड़े तोड़ देता है. माता जी ने इन शिकायतों से तंग आकर उन्हें तांबे के घड़े बनवा दिये, जिन पर ढेले का कोई असर न हो, गोबिंद राय जी ने अपना पैतरा बदल दिया, उन्होंने मिट्टी की गोलियों की जगह तीन कमान संभाल लिया तथा तांबे के घड़ों का शिकार करने लगे व अपने तीरों से छेदने लगे. उनकी इन हरकतों से तंग आकर माता जी से शिकायत की तब बाल गोविंद को पूछा गया कि वे ऐसा क्यों करते हैं तब उन्होंने कहा कि इसके घड़े में सांप था मैंने उसको मारा है ताकि जहर का असर उस परिवार पर न हो, देखा गया तो उस घड़े में मरा हुआ सांप था जो कि तीर लगने से मारा गया था.

माता जी ने रोज-रोज की शिकायतें सुन कर अभिशाप दे डाला कि कल से कुएं का पानी ही खारा हो जाये. माता जी के अभिशाप से पानी खारा हो गया अब परेशान पीड़ित महिलाओं ने विनती की अपना शाप वापस ले लें. माता जी ने कहा-जाओ एक दिन यह स्थान बहुत बड़ा तीर्थ बनेगा. यहां देश-विदेश से तीर्थ यात्री आयेंगे और इस कुएं का पानी मीठा हो जायेगा. धीरे-धीरे समय बीतता गया और आज भी पानी मीठा है और यात्रीगण अमृत-जल का चुल्ला लेते हैं तथा अमृतजल घरों को भी ले जाते हैं.

(प्रो जीएस चावला की पुस्तक गुरु गोबिंद सिंह जी का मानव प्रेम से साभार)

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