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प्रोस्टेट कैंसर पर की नयी खोज

Updated at : 16 Dec 2016 6:37 AM (IST)
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प्रोस्टेट कैंसर पर की नयी खोज

बक्सर के रहनेवाले हैं अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो अखौरी ए सिन्हा बिहार के बक्सर जिले के चुरामनपुर गांव के रहनेवाले प्रो अखौरी ए सिन्हा कई दशक पहले अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं. लेकिन, बिहार से नाता अब भी है. उन्होंने दो साथियों के साथ मिल प्रोस्टेट कैंसर को लेकर एक नयी खोज की है. शुभ […]

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बक्सर के रहनेवाले हैं अमेरिकी वैज्ञानिक प्रो अखौरी ए सिन्हा
बिहार के बक्सर जिले के चुरामनपुर गांव के रहनेवाले प्रो अखौरी ए सिन्हा कई दशक पहले अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं. लेकिन, बिहार से नाता अब भी है. उन्होंने दो साथियों के साथ मिल प्रोस्टेट कैंसर को लेकर एक नयी खोज की है.
शुभ नारायण पाठक
भारतीय मूल के एक अमेरिकी वैज्ञानिक और उनकी टीम ने प्रोस्टेट कैंसर को लेकर एक नया शोध पूरा किया है. मूल रूप से बिहार के बक्सर जिले के रहनेवाले अखौरी अच्युतानंद सिन्हा व उनके दो साथियों ने लगभग 40 साल के शोध के बाद प्रोस्टेट कैंसर को लेकर एक नयी खोज की है, जो इलाज में काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है.
प्रो सिन्हा के मुताबिक, उनके शोध ने पहली बार यह साबित किया है कि प्रोस्टेट कैंसर दो तरह का होता है. एक वह, जिसकी वजह पुरुष हार्मोन टेस्टिस्टेरॉन है और दूसरा वह, जिसका कारण मादा हार्मोन एस्ट्रोजेन है. अब तक यह माना जाता रहा है कि प्रोस्टेट कैंसर की वजह पुरुष हार्मोन ही है. इस भ्रम की वजह से प्रोस्टेट कैंसर के इलाज में अब तक के तौर-तरीके उतने कारगर नहीं हुए. इस बीमारी का इलाज कास्ट्रेशन या एंड्रोजन एब्लेशन के जरिये होता रहा है. प्रो सिन्हा और उनकी टीम ने पिछले अगस्त माह में प्रकाशित अपने शोध के जरिये बताया है कि कास्ट्रेशन रेजिस्टेंट प्रोस्टेट कैंसर (सीआरपीसी) मादा हार्मोन एंड्रोजेन पर आश्रित है. इसलिए इसका उपचार एंड्रोजेन एब्लेशन (एंड्रोजेन पर नियंत्रण) के जरिये नहीं हो सकता है.
खास बात यह है कि एस्ट्रोजेन आश्रित बीमारी के उपचार के लिए पहले से दवाएं उपलब्ध हैं. माना जा रहा है कि अब नये शोध से कैंसर के उपचार में इनके इस्तेमाल का रास्ता प्रशस्त होगा.
भारत में भी बढ़ रहे प्रोस्टेट कैंसर के मामले : दुनियाभर में कैंसर से होनेवाली मौतों में प्रोस्टेट कैंसर से होनेवाली मौतों का छठवां स्थान है. ऐसे मामले पहले पश्चिमी देशों में ज्यादा सामने आते थे.
लेकिन, हाल के वर्षों में भारत में भी प्रोस्टेट कैंसर के मामले तेजी से बढ़े हैं. एक शोध के अनुसार, देश की राजधानी दिल्ली में हर एक लाख में 10.66 लोग इस बीमारी से पीड़ित हैं. यह दर दक्षिण पूर्व एशिया (8.3) और उत्तरी अफ्रीका (8.1) से ज्यादा है. हालांकि, उत्तरी अमेरिका (85.6), दक्षिणी यूरोप (50.0) और पूर्वी यूरोप (29.1) से यह आंकड़ा काफी नीचे है. पश्चिम एशिया का यह आंकड़ा (13.8) दिल्ली से कुछ ज्यादा है.
तीन लाेगों की टीम ने पूरा किया शोध : प्रो सिन्हा के नेतृत्ववाली शोध टीम में फ्रांसिस इ पॉमरॉय व माइकल जे विल्सन भी शामिल थे. इस शोध को अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ मिन्नेसोटा से प्रकाशित जर्नल एंटीकैंसर रिसर्च ने पिछले अगस्त महीने में प्रकाशित किया है. प्रो सिन्हा यूनिवर्सिटी ऑफ मिन्नेसोटा के कॉलेज ऑफ बॉयोलॉजिकल साइंसेज में जेनेटिक्स, सेल बॉयोलॉजी एंड डेवलपमेंट के प्रोफेसर हैं. प्रो सिन्हा के अब तक 100 से ज्यादा शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं.
अंटार्कटिका में सिन्हा के नाम है पहाड़ : अमेरिका के वैज्ञानिकों में प्रो सिन्हा की ख्याति व सम्मान है.1971-72 के दौरान अंटार्कटिका के समुद्री क्षेत्र में सील, ह्वेल और पक्षियों की सूचीबद्ध गणना से जुड़े एक प्रोजेक्ट को अंजाम तक पहुंचानेवाली टीम का नेतृत्व करते हुए प्रो सिन्हा ने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया था. इस अमेरिकी प्रोजेक्ट में इनके अमूल्य योगदान की सर्वत्र सराहना हुई. यूएस जियोलॉजिलक सर्वे की पहल पर अमेरिकी सरकार ने इनके सम्मान में अंटार्कटिका में इनके नाम पर एक पहाड़ का नामकरण कर दिया है. करीब 1000 मीटर ऊंचे इस पहाड़ को अब ‘माउंट सिन्हा’ के नाम से जाना जाता है.
हर साल आते हैं बक्सर : प्रो सिन्हा बिहार के बक्सर जिला मुख्यालय से सटे चुरामनपुर गांव के रहनेवाले हैं. हालांकि, वह कई दशक पहले अमेरिका की नागरिकता ले चुके हैं, पर अब भी हर साल अपने गांव जरूर आते हैं. यहां बक्सर में उनके बड़े भाई डॉ अखौरी रमेशचंद्र सिन्हा रहते हैं. वह पेशे से डॉक्टर हैं और बक्सर में ही अपना क्लिनिक चलाते हैं.
रांची में भी कर चुके हैं अध्यापन कार्य : प्रो सिन्हा की शुरुआती पढ़ाई आरा जिला स्कूल से हुई थी. उन्होंने 1954 में इलाहाबाद से बीएससी व 1956 में पटना से एमएससी की डिग्री हासिल की थी.
इसके बाद उन्होंने रांची कॉलेज के प्राणिशास्त्र विभाग में प्राध्यापक की नौकरी पकड़ ली थी. वह वहां 1961 तक कार्यरत रहे. यहीं से वह पहली बार अमेरिका गये थे. वहां के मिसौरी विश्वविद्यालय से उन्होंने पीएचडी कर डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की. इसके बाद उन्होंने अमेरिका के ही विस्कोंसिन विश्वविद्यालय से पोस्ट डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की थी.
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