अपसंस्कृति से दूर है नियमगिरी

By Prabhat Khabar Digital Desk
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जसिंता केरकेट्टा
नियमगिरि के एक धांगड़ी बासा में जमीन पर लेटे-लेटे मैं देर तक सबका चेहरा ताकती हूं. कमरे में और भी कोंध आदिवासी लड़कियां हैं. वे बातें कर रही हैं. मैं उनकी बातें सुन रही हूं. लेटे हुए बीच-बीच में मुस्कुरा देती हूं. दूसरे कमरे में गांव की बुजुर्ग महिला सो रही है. उसे कुई भाषा के साथ उड़िया भाषा का ज्ञान भी है. इससे संवाद में बहुत मदद मिलती है. कम उम्र की दूसरी लड़कियां उनके कमरे में सोती हैं.
बहुत छोटी बच्चियां अपनी मांओं के साथ अपने घर में सोती हैं. वे अभी धांगड़ी बासा नहीं आतीं.रात भर चुल्हे में दो लकड़ी पड़ी रहती है. उससे हल्का-हल्का धुंआ रात भर उठता और कमरे में फैलता है. पहले दिन लगा सांस लेने में दिक्कत होगी लेकिन लड़कियों ने कहा इससे कमरे में मच्छर नहीं होंगे. साथ ही कमरे के भीतर छत से टंगी अनाज की टोकरियां सूखी और गर्म रहेंगी.
समझ में आया क्यों घने जंगल के बीच इस गांव में बिना मच्छरदानी के भी सोना आसान है. कमरे में कहीं एक भी मच्छर नहीं. लोगों के पास अपने तरीके हैं.
नियमगिरि आंदोलन के बाद हर गांव में सौर लाइट की व्यवस्था सरकार ने की है. रातभर एक छोटा बल्ब जलता है. मुझे बल्ब की रोशनी में नींद नहीं आती. मैंने कुई भाषा में सीख लिया है कहना ‘बल्ब डूपोली’. इसका अर्थ है बत्ती बुझा दो. मेरे कहने से पहले ही अब वे बत्ती बुझा देती हैं. लेकिन अंधेरे में उनकी बातें चलती रहती हैं. कमरे में रातभर संगीत सा कुछ गूंजता रहता है.
आधी रात टीन के छप्पर जोर-जोर बजने लगे. जैसे बुरी तरीके से कोई छप्पर पीट रहा हो. बाहर जोरदार बारिश शुरू हो रही है. छोटा सा गांव. छोटे-छोटे मिट्टी के घर. टीन के छप्पर. पर पानी उनकी चौखटों के भीतर नहीं घुसता. बाहर बारिश और कमरे के भीतर थोड़ी सी गर्मी.
बारिश होने से पहले ही धांगड़ी बासा के बाहर कुछ सरसराहट की आवाज आई. मुंजाली बाहर जाकर देखती है. दरवाजा खुलते ही तीन लड़के दिखते हैं. ये इस गांव के तो नहीं, होते तो मैं पहचान जाती, मैंने मन ही मन सोचा. उठकर बैठ गई. उन्हें देखती हूं. ये दूसरे गांव के लड़के हैं. इस गांव लड़कियों से बातचीत करने आएं हैं. मुझे देखकर भी वे सहज हैं. मुझे देखकर मुस्कुराते हैं. मैं महसूस करती हूं कोई गलत मंशा नहीं है उनमें. नियमगिरि में लड़के, लड़कियां एक दूसरे के प्रति काफी सहज हैं.
वे हमारे साथ बैठ गये और बहुत रात तक लड़कियां उनसे बात करती रही. मेरी आंख कब लगी पता नहीं चला. भोर में लड़के नहीं दिखे. शायद वे सुबह होने से पहले चले गये हैं. धांगड़ी बासा लड़के-लड़कियों के एक दूसरे से संवाद करने की जगह भी है. नियमगिरि ने ऐसे पारंपरिक केंद्रों को बचा रखा है. यह लड़कियों के आपस में बातचीत करने, गीत गाने, हमउम्र लड़कियों के साथ सोने की जगह है. गांव के लड़कों के लिए दूसरी ओर धांगड़ा बासा घर है. वहां जवान अविवाहित लड़के सोते हैं.
समलैंगिकता और थर्ड जेंडर को लेकर पूरी दुनिया में एक अजीब-सी मानसिकता है. उससे नियमगिरि कोसों दूर है. आदिवासी समाज में थर्ड जेंडर को लेकर कोई तिरस्कारपूर्ण बातें सुनने को कभी नहीं मिलती. शंका होती है कि क्या आदिवासी समाज में थर्ड जेंडर नहीं होते? होते हैं, तो उनको कभी अलग कर नहीं देखा गया. एक साथी बतलाते हैं कि यहां थर्ड जेंडर का जन्म लेना अपमान की बात नहीं है. थर्ड जेंडर को तो प्रकृति की अद्भुत और विशेष कृति के रूप में देखा जाता है.
नियमगिरि में किसी भी लड़की या स्त्री के साथ किसी तरह की जबरदस्ती, छेड़खानी या उसके अपमान की अनुमति किसी को नहीं है.
बलात्कार की कुसंस्कृति सबसे घृणित माना जाती है. किसी भी तरह के संबंध के लिए स्त्री या लड़की की सहमति सबसे जरूरी है. लड़कियों को स्वतंत्रता है कि वे संबंध के लिए किसी लड़के को खुद पसंद कर लें. स्त्री पुरुष संबंध को समाज की इज्जत छिन जाने की तरह नहीं देखा जाता. इसलिए वे नहीं जानते कि स्त्रियों के साथ छेड़खानी, बलात्कार क्या होता है.
गांव के लोग मानते हैं कि समय रहते ही जवान हो रहे किशोरों को अपने जोड़े की पहचान करनी चाहिए. मगर अभिवावक विवाह के लिए हड़बड़ी में जीवनसाथी चुनने के पक्ष में भी नहीं रहते. लड़के या लड़की ने यदि जीवनसाथी चुन रखा हो तो माता पिता एक दूसरे को ठीक से समझ लेने पर जोर देते हैं.
वे मानते हैं कि विवाह के दौरान दो परिवार एक बड़े परिवार में बदल जाते हैं. जिम्मेदारियां भी बढ़ जाती हैं, इसलिए विवाह के विषय में जोड़ों को समझदारी से काम लेना चाहिए. अगर उन्होंने पहले से किसी को नहीं ढूंढा है तब अभिभावक उनके लिए जीवन जोड़ी ढूंढ़ते हैं.
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