स्वच्छता और समरसता का उजास, देश के अलावा विदेशों में भी मनायी जाती है दिवाली

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Oct 2019 8:45 AM

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इस दिवाली हम परंपरा आधारित आधुनिक विरासत में एक दीया स्वच्छता के नाम का भी जलाएं, जिससे मन के मैल का तर्पण होने के साथ ही आस-पड़ोस का वातावरण भी साफ और स्वच्छ हो जाये. समाज और देश में स्वच्छता का उजास फैले, ताकि केवल एक दिन नहीं, हर दिन रोशन हो.आइए इस दिवाली पर […]

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इस दिवाली हम परंपरा आधारित आधुनिक विरासत में एक दीया स्वच्छता के नाम का भी जलाएं, जिससे मन के मैल का तर्पण होने के साथ ही आस-पड़ोस का वातावरण भी साफ और स्वच्छ हो जाये. समाज और देश में स्वच्छता का उजास फैले, ताकि केवल एक दिन नहीं, हर दिन रोशन हो.आइए इस दिवाली पर हम अपने घर-आंगन, आस-पड़ोस और गली-मुहल्ले के साफ-सफाई की इस पावन पंरपरा से ऊपर उठ कर समाज और सामाजिक स्वच्छता की नव आधुनिक परंपरा से खुद को जोड़ें और एक नयी स्वच्छ संस्कृति का सृजन करें.

दिवाली का पर्व केवल सजते हुए घर तथा संवरते हुए अरमानों का पर्व नहीं है, यह दीपोत्सव अंधेरे के सारे अणु-परमाणु पर उजाले को वहन करने का त्योहार है. इसमें उजास को केवल जलना ही नहीं होता है उसको फैलना भी पड़ता है. उन तमाम मानवीय निराशाओं को अपने अस्तित्व में विलीन करना पड़ता है, जो जनसमुदाय को हताश-परेशान और निराश करती हैं. जनसमुदाय का प्रत्येक व्यक्ति जब भी दिवाली का कोई भी एक प्रकाशपुंज जलाता है, तो इतिहास के गर्भ में छिपी कई सदियों के मिथक, कथाएं, लोककथाएं आदि सब सामने आ जाती है. जिससे हम ही नहीं जुड़ते है अपनी अगली पीढ़ी को भी जोड़ते है और अपनी सांस्कृतिक विरासत की थाती को गतिशील बनाये रखते हैं.

विस्तार पाये स्वच्छता का सामाजिक सरोकार
आज परंपरा और आधुनिकता के जीवन प्रवाही रफ्तार में हम अपनी तमाम सांस्कृतिक धरोहरों को समेटने का प्रयास करें, क्योंकि ये धरोहर ही हैं, जो भावी पीढ़ी के जीवन में संस्कृति के बीजों को स्थापित करते हैं. उनमें अपने इतिहास को समझने और उसके आधार पर नवसृजन करने की विचारधारा को पल्लवित और पुष्पित करते हैं. इससे आपसी संवाद, सहिष्णुता, सामाजिक सरोकार, मन के मैलों का तर्पण और तेरे-मेरे के भाव में शामिल ‘अहम’ की दीवार को गिराने की समझ विकसित होती है. इनके अभाव में किसी भी व्यक्ति का जीवन सुंदर नहीं बन सकता.

आज हमारे भागते-दौड़ते जीवन में जो एकाकीपन आ गया है, उसे तोड़ने में भी सामाजिक स्वच्छता अभियान सहायक है. सूखती संवेदनाओं और एकांकीपन के दौर में स्वच्छता के सामाजिक सरोकारों से जुड़ कर हम अपने अकेले पड़ गये मन में उजास और उल्लास दोनों भर सकते है. केवल रीति-रिवाज, परपरंराएं और आस्थाएं ही नहीं, मानवीय सरोकार का संगठित प्रयास भी सामाजिक जड़ों को मजबूत करता है. बस जरूरत है उस विचार को स्वच्छता की विचारधारा से जोड़ने की. यह कुछ वैसा ही है, जैसा प्रयास नवजागरण के दौर में समाज सुधारकों ने बंगाल में दुर्गापूजा, महाराष्ट्र में गणेश उत्सव और उत्तर भारत में राममेला का आयोजन करके समाज को संगठित करने के लिए किया था.

परंपरा आधारित नवआधुनिकता की यह सौगात हमारे आज और आनेवाले कल पर सकारात्मक असर डालेगी. साथ ही यह स्वच्छता, सामाजिक प्रगति और स्वस्थ समाज का आधार भी बन सकती है. हम परंपरा के अनुभवों से परेशानियों से जूझने और पार पाने की शक्ति पाते हैं. इससे हमारे जीवन के हर हिस्से में हर मौके पर नवउत्साह बना रहेगा.

पोषित हो नव-आधुनिक परंपरा की नवज्योति
भारत के विभिन्न हिस्सों में दीवाली कई तरीके से मनायी जाती है. होली और दशहरा मनाने के तरीकों में भी विभिन्नता है. इस सांस्कृतिक विविधता में अगर हम स्वच्छता के मूलमंत्र को भी जोड़ लें, तो यही हमारी अनेकता में एकता के भाव को अभिव्यक्त करेगा. स्वच्छता की यह ज्योति मन में एक ज्योतिर्मय उजाला भर सकती है. इससे जो कुछ भी हम-आप इस त्योहार में करते हैं, उसमें भले थोड़ी-बहुत विविधता होगी, लेकिन उसके पीछे निहित भावना और संस्कृति में पर्याप्त समानता होगी.

वर्तमान दौर मानवीय तरक्की और तकनीकी उपलब्धियों के दौर है. इस दौर में अगर हम परंपरा और आधुनिकता की विचारधारा को एक साथ लेकर चलें, तो विकास के उच्च शिखर तक पहुंचना बहुत ही आसान हो जायेगा. इस ज्योति पर्व में परंपरा से मिले स्वच्छता, सामाजिकता और समानता के भाव को अपने जीवन में उतार लें और केवल एक दिन के लिए ही नहीं, हर दिन के लिए जीवन में इस ज्योंति के उजास को फैलाएं रखें. यकीन मानिए स्वच्छता का यह उजास कई जिंदगियों को रोशन कर देगा.

बस ध्यान रखें कि सतत विकास की इस श्रृंखला को बनाये रखने के लिए ‘स्वच्छता के साथ फैले प्रकाश मिटे तम और होवे उजास’ का भाव प्रकाश पर्व के बाद भी हमारे जीवन में विस्तार पाये. हम उस उजास को चुनें, जिसमें इंसानियत का भाव शामिल हो, जो मानवता की समुद्धि के लिए हो और जिसमें स्वहित के बजाय ‘सर्वहित’ को वरीयता मिलें. कारण, रोशनी का यह उत्सव अच्छाई की तरफ ले जानेवाले रास्तों को रोशन करने का उत्सव भी है. अत: इस दीपपर्व में एक दीया हम अपने नाम का, दूसरा दीया अपनों के नाम का जलाने के साथ ही एक दीया समाज और देश के नाम का भी जलाएं, ताकि देश और समाज में गंदगी के राक्षसी बुराई का शमन हो और हर जीवन प्रकाशमय हो सके.

देश के अलावा विदेशों में भी मनायी जाती है दिवाली

दिवाली का त्योहार भारत देश के अलावा विदेशों में भी मनाया जाता है. दुनिया भर में रहनेवाले हिंदू, जैन और सिख समुदाय के लोग दिवाली मनाते हैं. भारत के अलावा श्रीलंका, पाकिस्तान, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, फिजी, मॉरीशस, केन्या, तंजानिया, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका, सूरीनाम, त्रिनिदाद, टोबैगो, नीदरलैंड, कनाडा, ब्रिटेन, संयुक्त अरब अमीरात, संयुक्त राज्य अमेरिका आदि देशों मे दिवाली का त्योहार मनाया जाता है. भारतीय संस्कृति की समझ और भारतीय मूल के वैश्विक प्रवास के कारण दीपावली मनाने वाले देशों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ रही है. कई देशों में इस दिन राष्ट्रीय अवकाश भी रहता है.

क्यों मनायी जाती है दिवाली

खत्म होती है फसल की कटाईभारत के पश्चिमी भाग में यह माना जाता है कि दिवाली की शुरुआत किसानों के फसल की कटाई पूरी होने के बाद की गयी थी. यहां ग्रामीण और शहरी दोनों ही इलाकों में इस दिन पोहे से व्यंजन तैयार करने की भी परंपरा है.

भगवान श्रीराम की अयोध्या वापसी
महाकाव्य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम रावण को हराने के बाद जब माता सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ कार्तिक अमावस्या के दिन ही अयोध्या लौटे थे. उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने शहर को दीयों से सजाया था.

बंगाल में होती है काली पूजा
दिवाली पर बंगाल में मां काली की पूजा होती है. कहा जाता है कि नवदीप के महाराजा कृष्ण चंद्रा ने अपनी प्रजा से मां काली की पूजा करने की विनती की थी. आज बंगाल में दुर्गापूजा के बाद काली पूजा का बहुत महत्व है.

देवी लक्ष्मी का जन्म और विवाह
मान्यता यह भी है कि समुद्र मंथन के दौरान दिवाली के दिन ही संपन्नता की देवी मां लक्ष्मी का अवतरण हुआ था. इसी दिन देवी ने लक्ष्मी ने पति रूप में भगवान विष्णु का वरण किया था. इस खुशी में दीप जलाये गये थे. चूंकि देवों में गणेश प्रथम पूज्य है, इसलिए इस दिन गणेश-लक्ष्मी की पूजा परंपरा है.

भगवान श्रीकृष्ण द्वारा नरकासुर का वध
पूरे भारत में कार्तिक अमवस्या की रात को दिवाली मनायी जाती है, किंतु तमिलनाडु में नरक चतुर्दशी (दिवाली के एक दिन पूर्व) दिवाली मनाने की परंपरा है. मान्यता है कि बहुत समय पहले नरकासुर नामक राक्षस ने करीब 16 हजार महिलाओं को बंदी बना लिया था. उस वक्त भगवान श्रीकृष्ण ने नरकासुर का वध करके उन महिलाओं की रक्षा की थी. इसी खुशी में वहां इस दिन दिवाली मनायी जाती है. गोवा में इस दिन नरकासुर के प्रतीकस्वरूप कागज के पुतले जलाये जाते है. तमिल घरों में इस दिन लक्ष्मी पूजा की जाती है.

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