दांपत्य जीवन में प्रेम के उल्लास का पर्व है हरितालिका तीज, जानें पूजा की विशेष विधि

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 31 Aug 2019 4:46 AM

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श्रीपति त्रिपाठी, ज्योतिषाचार्य sripatitripathi@gmail.com अखंड सौभाग्यवती भव:। इस श्लोक का अर्थ है- हमेशा सौभाग्यवती का सितारा चमकता रहे. महाभारत युद्ध में पितामह भीष्म ने द्रौपदी को यह आशीर्वाद दिया था, जिससे युद्ध में उसके पतियों की रक्षा सुनिश्चित हुई और पांडवों की जीत हुई. मौजूदा समय में पारिवारिक मतभेद बढ़ने और रिश्तों में सामंजस्य की […]

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श्रीपति त्रिपाठी, ज्योतिषाचार्य
sripatitripathi@gmail.com
अखंड सौभाग्यवती भव:। इस श्लोक का अर्थ है- हमेशा सौभाग्यवती का सितारा चमकता रहे. महाभारत युद्ध में पितामह भीष्म ने द्रौपदी को यह आशीर्वाद दिया था, जिससे युद्ध में उसके पतियों की रक्षा सुनिश्चित हुई और पांडवों की जीत हुई.
मौजूदा समय में पारिवारिक मतभेद बढ़ने और रिश्तों में सामंजस्य की कमी आम है. ऐसे में हमारे पर्व-त्योहार संबंधों की उष्मा को जीवंत बनाये रखने में अहम भूमिका निभाते हैं. हरितालिका ऐसा ही एक मुख्य पर्व है, जो पति-पत्नी के रिश्तों को सामजंस्य और समर्पण के भाव से जोड़ता है. यह पर्व मौजूदा समय में और भी प्रासंगिक हो जाता है, जब परिवार बिखर रहे हैं और अपनों के बीच दूरियां पैदा हो रही हैं.
रिश्तों के बदलते समीकरणों के दौर में यह पर्व जुड़ाव की सीख देता है. सांझी खुशियां सहेजने का भाव पैदा करता है. तभी तो जीवन की आपाधापी को भूल महिलाएं पूरे मान-मनुहार के साथ अपने प्रिय जीवनसाथी के आयुष्य और मंगल की कामना करती हैं.
बेशक पति-पत्नी जीवन रूपी गाड़ी के दो पहिये हैं, जिनका संतुलित रहना और एक साथ चलना जिंदगी को गति देता है. वैवाहिक जीवन में इसी संतुलन और साथ के मायने रेखांकित करते हुए हरितालिका का त्योहार एक सुंदर संयोग बनाता है.
कहा जा सकता है परंपरा के निर्वहन और दांपत्य जीवन में प्रेम के उल्लास का पर्व है- हरितालिका तीज. सुहागिनें अपने सुहाग की लंबी उम्र, संबंधों में प्रगाढ़ता, उनके स्वास्थ्य एवं परिवार के सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगती हैं. चूकि मां गौरी ने भी कुंआरेपन में यह कठिन व्रत किया था, तब जाकर उन्हें योग्य वर के रूप में शिव प्राप्त हुए. इसलिए मनचाहा वर पाने और जीवन में मिलने वाले सुखद संसार की कामना लिये कुंआरी कन्याएं भी इस व्रत को करती हैं. इस व्रत को ‘हरितालिका तीज‘ इसलिए कहते हैं, क्योंकि पार्वती की सखी उन्हें पिता के घर से ‘हर‘ कर घनघोर जंगल में ले गयी थीं. ‘हरत‘ अर्थात हरण करना और ‘आलिका‘ अर्थात सखी, सहेली. मान्यता है कि इस व्रत को करने वाली सुहागिन स्त्रियों का सौभाग्य अखंड बना रहता है और उन्हें सात जन्मों तक पति का साथ मिलता है. यही वजह है कि तीज के पर्व का अनुष्ठान हर तरह से दांपत्य जीवन को सुखी बनाने के भावों से जुड़ा है. मां गौरी ने इसी व्रत से भगवान शिव को पति रूप में पाया था.
इस दौरान मां पार्वती के तप से न सिर्फ भगवान शिव का आसन डोल गया, बल्कि धरती, आकाश और पाताल तक कंपन करने लगे थे. भगवान शिव को स्वयं पार्वती जी को वरदान देने आना पड़ा. मां पार्वती ने वर स्वरूप भगवान शिव को पति रूप में मांगा. बाद में उनका विवाह शिव के साथ संपन्न हुआ. इसलिए महिलाएं मनोवांछित पति, सुखद दांपत्य जीवन एवं पति की दीर्घायु के लिए इस व्रत को करती आ रही हैं.
कहा गया है –
यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमंते तत्र देवताः।
यत्र तास्तु न पूज्यंते तत्र सर्वाफलक्रियाः॥
अर्थात- जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं. जहां इनकी पूजा नहीं होती, वहां सबकुछ व्यर्थ है.
02 सितंबर को मनायी जायेगी तीज
हिंदू पंचांग के अनुसार, हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज का व्रत रखा जाता है. इस वर्ष तीज सोमवार, 02 सितंबर को ही मान्य है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार, चतुर्थी युक्त तृतीया का सौभाग्य वृद्धि में विशिष्ट महत्व है. सोमवार को तृतीया का पूर्ण मान, हस्त नक्षत्र का उदयातिथि योग तथा सायंकाल चतुर्थी तिथि की पूर्णता तीज पर्व की महत्ता को बढ़ाती है. इसका प्रमाण ‘पर्व मुहूर्त निर्णय ग्रंथ’ में है- चतुर्थी हस्त नक्षत्र सहिताया तु सा तृतीया फलप्रदा।
हस्त नक्षत्र में तीज का पारण वर्जित : प्रमाण यह भी मिलता है कि हस्त नक्षत्र में तीज का पारण वर्जित है, जबकि रविवार, 01 सितंबर को व्रत रखनेवाली महिलाओं को पारण सोमवार, 02 सितंबर के भोर में हस्त नक्षत्र में ही करना पड़ेगा, जो शास्त्र सम्मत नहीं.
चित्रा नक्षत्र में पारण से सौभाग्य वृद्धि : यदि 02 सितंबर को व्रत रखेंगे, तो 03 सितंबर, मंगलवार के भोर में चित्रा नक्षत्र का पारण सौभाग्य वृद्धि में सहायक माना गया है. अतः सर्वसिद्ध हरितालिका तीज व्रत चतुर्थी युक्त तृतीया एवं हस्त नक्षत्र के कारण 02 सितंबर, सोमवार को मान्य है. अद्भुत संयोग है कि सोमवार को ही भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि है, जिस दिन से गणेशोत्सव प्रारंभ हो रहा है. चतुर्थी आरंभ- 04:20 (2 सितंबर), समाप्त- 03:08 (3 सितंबर).
पूजा की विशेष विधि
हरे रंग का वस्त्र बिछाकर विधिवत शिव, माता गौरी, गणेश की पूजा करें. मिश्री के जल से अभिषेक करें. घी का दीया जलाएं व गणेश जी की मूर्ति के समक्ष दूर्वा चढ़ाएं. गणेश जी को लड्डुओं का भोग लगाएं. शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाएं. गौरी के सामने सावा सत्तू के साथ 3 सुपारी रखें. फिर सुपारी को बायें हाथ में लें व दायें हाथ में रुद्राक्ष की माला ले तीन बार मंत्र जाप करें-
गण गौरी शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया।
मां कुरु कल्याणी कांत कांता सुदुर्लभाम्।।
सुपारी को पूरे साल संभाल कर रखें. इससे सभी समस्याएं समाप्त होंगी. संध्या में मां गौरी को शृंगार सामग्री चढ़ाएं व पूजा करें.
करें ये विशेष उपाय
पूजा के बाद अपने हाथ से खीर बनाकर माता पार्वती को भोग लगाएं एवं प्रसाद रूप में वह खीर पति को खिलाएं. दांपत्य जीवन में खुशहाली आयेगी.
पांच बुजुर्ग सुहागिनों को साड़ी और बिछिया दें. जोड़े से उनके पैर छुएं.
मंदिर में शिव-पार्वती को लाल गुलाब चढ़ाएं. शिव और नंदी को शहद चढ़ाएं.
पूजा में माता पार्वती को चुनरी चढ़ाएं और अपने हाथों से नथ पहनाएं. पति से मांग भरवाएं. बिछिया-पायल पहनें.
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