स्त्री प्रकृति है जो निर्माण कार्य की परिचायक है

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 12 Jul 2019 5:58 AM

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मैं एक बलुआ प्रस्तर – उषा किरण खान जैसी आपकी इच्छा”- राजन्य अपने कर्तव्य कर चले गये. कुटीर के पार्श्व मे एक बड़ी बछड़े वाली गाय बंधी, हरी घास खा रही थी. वहां खड़े युवक को बुलाकर पूछा- ”यह क्या तुम्हारी गाय है?” ”प्रभु, आपकी है. महामात्य ने भेजा है, मैं गोपाल हूं.” बहुत आश्चर्य […]

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मैं एक बलुआ प्रस्तर – उषा किरण खान
जैसी आपकी इच्छा”- राजन्य अपने कर्तव्य कर चले गये. कुटीर के पार्श्व मे एक बड़ी बछड़े वाली गाय बंधी, हरी घास खा रही थी. वहां खड़े युवक को बुलाकर पूछा- ”यह क्या तुम्हारी गाय है?”
”प्रभु, आपकी है. महामात्य ने भेजा है, मैं गोपाल हूं.” बहुत आश्चर्य नहीं लगा शिल्पी को. क्योंकि पहले भी महामात्य की कृपा इन पर थी. शिल्प गढ़ने और ओपे तैयार करने में किसी प्रकार का व्यतिरेक न हो यह अभिष्ट था उनका. एक लंबी उसांस खींची शिल्पी ने. चलकर फिर वह प्रस्तर खंडों के बीच बैठ गया और उस विशेष श्लाका पर हाथ फेरने लगा. किसकी आकृति गढ़ूं?
”आदरणीय प्रधान शिल्पी को सादर नमस्कार करता हूं.”-शिला शलाका पर पड़ती छाया हाथ में पगड़ी पकड़े झुकी पड़ी. उन्होंने सर उठाया और खड़े हो गये.
”नमस्कार करता हूं आमात्य.”-सामने खड़े विद्वान आमात्य को शिल्पी ने प्रति नमस्कार किया.
”आपको देख कर प्रसन्नता हुई. प्रभो आप हाथ लगा देंगे. नये सौध के सभागार में मूर्ति लगेगी.”
”यह आप कहां लगायेंगे श्रीमान ?”
”आपकी मूर्ति सम्राट के सिंहासन के दोनों ओर लगेगी प्रधान शिल्पी.”
”ओह, किस भाव की बनाऊं?”
”मैं नहीं निर्देश देने योग्य प्रभु, आप स्वयं इतने बड़े विद्वान विचारक हैं. शिल्प गढ़ने में स्वयं ब्रह्मा भी आपसे ऊपर नहीं ठहरेंगे. वे जान देने के मात्र अधिकारी हैं आप प्रस्तर में जान डाल देते हैं.”
”यह अतिश्योक्ति है श्रीमान.”
”आप स्वयं विचार कर गढ़ें, नारी सौंदर्य का उपमान एक सी दो, जो सिंहासन के दोनों कोनों पर खड़ी हों.”
”जैसी आज्ञा.”
”नहीं प्रभु, अनुरोध मात्र.”-शिल्पी सोचता खड़ा रहा आमात्य चले गये.
घोषा वनवासियों को शिक्षित कर रही थी और विचार रही थी कि क्या गांव और ग्रामीण संस्था रूप में चिह्नित हुआ यह ठीक रहा ? उषा तथा इला जिनके पास गायों का विशाल संग्रह था जो वेदकाल की प्रच्छन्न-ऋत् की द्रष्टा थी.
उनके जीवन में ऐसी कुंठा, ऐसा विपर्यय था ? नहीं था. उन्हें गृह त्याग करने को कभी किसी ने नहीं कहा. अपनी गायें लेकर वे जिस दिशा में चाहती चली जाती. ऋतुस्नान के पश्चात पुरुष संसर्ग से संतान उत्पन्न करती. उन्मुक्त जीवन था. किसी गोत्र और घर का बंधन नहीं. वे स्वयं गोत्र नियामक रही. शंडिला का सबसे बड़ा कुनबा था. संतानें भी बहुत बड़े क्षेत्रफल में बिखरी थी.
वर्णाश्रम बन जाने, ग्राम-ग्रामीणी की विधिवत स्थापना हो जाने के बाद, ऐसा लगा शनै: शनै: स्थितियां बदलने लगीं. उसे याद आ रहा था कि हवन में थोड़े बड़े ‘श्रव’ से घृत समिधा में पुरुष के कल्याणर्थ अर्पित हो रहा है, पर स्त्री के लिए छोटे ”श्रुक” का व्यवहार होता है. विवाह नामक संस्था द्वारा स्त्री बांध तो दी गयी पुरुष नहीं बंधे. स्त्री प्रकृति है जो निर्माण कार्य की परिचायक है, नियंता बनने की राह पर पुरुष है.
क्या है यह विवाह संस्था. यदि मात्र यौनिक शुचिता को लेकर है, उच्छृंख्लता को समाप्त करने को लेकर है तब संपत्ति विवाद का प्रकरण क्यों उठा. घोषा को जान पड़ता है कि गायों की तरह भावी उषा और इला भी संपत्ति गिनी जाने वाली है. हमें क्या यूं ही सब कुछ छोड़ कर जंगल भाग आना चाहिए ? नहीं, द्रदयू और असंग जैसे पुरुषों पर ज्ञान का केंद्र नहीं छोड़ना चाहिए परंतु क्या वनवासियों के मन में ज्ञानपिपासा जगा कर इन्हें छोड़ कर जाना उचित होगा ? घोषा विचारती है, ज्ञान की गरिमा रखने को तत्पर अन्य ब्रह्मवादिनियां वह विवाद अवश्य सुलझा लेंगी पर यह काम मैं ही कर सकती हूं.
शिल्पी क्या बुद्धि से जगमग, संवेदना से लबरेज घोषा को सांगोपांग उकेर पायेगा ? यदि संभव हो तो वह महाराज के सुधी सभागार वाले सिंहासन के लिए सार्थक होगा.
एक बार उस प्रस्तर खंड के बीते से मापा, फिर उसी नाप का दूसरा प्रस्तर खंड ढूंढने लगा कि भुवन नामक उसका प्रशिक्षु युवक माप वाली रस्सी लेकर पहुंच गया. चरणों में झुक कर प्रणाम किया और रस्सी आगे कर दिया.
”अच्छा किया तुम आ गये.” दोनों की आंखें नम थीं…
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