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शारदीय नवरात्र नौवां दिन : ऐसे करें मां सिद्धिदायिनी दुर्गा की पूजा

Updated at : 29 Sep 2017 6:55 AM (IST)
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शारदीय नवरात्र नौवां दिन : ऐसे करें मां सिद्धिदायिनी दुर्गा की पूजा

‘सिद्धों, गंधर्वो, यक्षों, असुरों और देवों द्वारा भी सदा सेवित होनेवाली सिद्धिदायिनी दुर्गा सिद्धि प्रदान करनेवाली हों.’ दस महाविद्याओं की महिमा-9 दस महाविद्याओं का दसवां स्वरूप कमला वैष्णवी शक्ति हैं. महाविष्णु की लीला-विलास-सहचरी कमला की उपासना वास्तव में जगाधार-शक्ति की उपासना है. इनकी कृपा के अभाव में जीव में सम्पत शक्ति का अभाव हो जाता […]

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‘सिद्धों, गंधर्वो, यक्षों, असुरों और देवों द्वारा भी सदा सेवित होनेवाली सिद्धिदायिनी दुर्गा सिद्धि प्रदान करनेवाली हों.’
दस महाविद्याओं की महिमा-9
दस महाविद्याओं का दसवां स्वरूप कमला वैष्णवी शक्ति हैं. महाविष्णु की लीला-विलास-सहचरी कमला की उपासना वास्तव में जगाधार-शक्ति की उपासना है. इनकी कृपा के अभाव में जीव में सम्पत शक्ति का अभाव हो जाता है. मानव, दानव, देव-सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं. विश्व भर की इन आदिशक्ति की उपासना आगम-निगम दोनों में समान रूप से प्रचलित है.
भगवती कमला दस महाविद्याओं में एक हैं. जो क्रम-परंपरा मिलती है, उसमें इनका स्थान दसवां है. अर्थात इनमें-इनकी महिमा में प्रवेश कर जीव पूर्ण और कृतार्थ हो जाता है. सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, सिद्ध, गंधर्व इनकी कृपा के प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं. ये परमवैष्णवी, सात्विक और शुद्धाचारा, विचार-धर्मचेतना और भक्त्यैकगम्या हैं. इनका आसन कमल पर है. ये सुवर्णतुल्य कांतिमयी है.
ये देवी चार भुजाओं में वर, अभय और कमलद्वय धारण किये हुए तथा किरीट धारण किये हुए और क्षौम्य-वस्त्र का परिधान किये हुए हैं.इस तरह काली, तारा, छिन्नमस्ता, बगलामुखी, मातंगी, धूमावती- ये रूप और विग्रह में कठोर तथा भुवनेश्वरी, षोड़शी, कमला और भैरवी अपेक्षाकृत माधुर्यमयी रूपों की अधिष्ठात्री विद्याएं हैं. करूणा और भक्तानुग्रहाकांक्षा तो सबमें समान हैं. दुष्टों के दलन-हेतु एक ही महाशक्ति कभी रौद्र, तो कभी सौम्य रूपों में विराजित होकर नाना
प्रकार की सिद्धियां प्रदान करती हैं.
महाविद्याओं का स्वरूप वास्तव में एक ही है. आद्याशक्ति के विभिन्न स्वरूपों का विस्तार है. भगवती अपने संपूर्ण ऐश्वर्य और माधुर्य में विद्या और अविद्या दोनों हैं- विद्याहमविद्याहम् (देव्यथर्वशीर्ष). पर विद्याओं के रूप में उनकी उपासना का तात्पर्य शुद्ध विद्या की उपासना है.
विद्या युक्ति का विषय है, अतः पारमार्थिक स्तर पर विद्याओं की उपासना का आशय अंततः मोक्ष की साधना है. इच्छा से अधिक वितरण करने में समर्थ इन महाविद्याओं का स्वरूप अचिन्त्य और शब्दातीत है, पर भक्तों और साधकों के लिए इनकी कृपा हमेशा मिलता रहता है. (समाप्त).
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