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आधुनिक भारतीय कलाओं का सम्राट

Updated at : 01 Dec 2019 7:52 AM (IST)
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आधुनिक भारतीय कलाओं का सम्राट

मनीष पुष्कले पेंटर कुछ लोग बिरले होते हैं. वे एक साथ अनेक क्षेत्रों में गहरी दिलचस्पी भी रखते हैं और उनमें अपना बहुमूल्य योगदान भी देते हैं. मूर्धन्यों के साथ अक्सर ऐसा भी होता है कि हमारे द्वारा उनके रचनाशील उपक्रमों को संपूर्णता से नहीं आंका जाता. विभिन्न क्षेत्रों में उनके अप्रतिम योगदान को या […]

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मनीष पुष्कले

पेंटर

कुछ लोग बिरले होते हैं. वे एक साथ अनेक क्षेत्रों में गहरी दिलचस्पी भी रखते हैं और उनमें अपना बहुमूल्य योगदान भी देते हैं. मूर्धन्यों के साथ अक्सर ऐसा भी होता है कि हमारे द्वारा उनके रचनाशील उपक्रमों को संपूर्णता से नहीं आंका जाता.

विभिन्न क्षेत्रों में उनके अप्रतिम योगदान को या तो टुकड़ों-टुकड़ों में देखा जाता है, या फिर उनके किसी पक्ष-विशेष को उसकी समग्र रचनाशीलता के अन्य पार्श्वों से अलग करके ही लोक स्वीकृति मिलती है. लगभग यही नियति इब्राहीम अलकाजी (जन्म- 1925) की भी रही है. उन्हें आधुनिक भारतीय कलाओं का सम्राट कहा जा सकता है. रंगमंच के बेजोड़ निर्देशक होने के साथ ही वे अनेक महत्वपूर्ण कला प्रदर्शनियों के स्वतंत्र संयोजक भी रहे हैं. वे बेमिसाल संस्था निर्माता हैं और अद्भुत शिक्षक हैं. उनके अभिलेखागार में भारतीय आधुनिक कलाओं के चरित्र और उसके उत्थान को ठीक से समझने के लिए महत्वपूर्ण दस्तावेजों का अद्भुत संग्रह है.

हाल ही में दिल्ली की आर्ट हेरिटेज गैलरी में इब्राहीम अलकाजी की एक अद्भुत प्रदर्शनी का आयोजन हुआ. प्रदर्शनी का शीर्षक था ‘ओपनिंग लाइंस’.

यह प्रदर्शनी हमें एक ओर भारत की स्वतंत्रता के तत्काल बाद के समय के शेड्स से एक अलग नजरिये से अवगत कराती है, तो दूसरी ओर यह एक ऐसा दस्तावेज भी प्रस्तुत करती है, जिसे देखकर हम उनकी दूरदृष्टि से अवगत होते हैं. उसके साथ ही, यह भारतीय आधुनिक कला के उत्थान को समझ सकने में भी सहायक है.

प्रदर्शनी के पहले हिस्से में अलकाजी के विद्यार्थी काल (1948-1951) के उन कामों को प्रदर्शित किये गये थे, जिन्हें उन्होंने लंदन में रहते हुए बनाया था.

यह वही समय था, जब अलकाजी के मानस पर कला के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मानकों और स्थापनाओं की पहली छाप पड़ी थी. उनके इस समय के कामों में, पूर्व और पश्चिम, दो प्रकार के सौंदर्यबोधों की मुठभेड़ दिखती है. इस काल में उनका संघर्ष का केंद्र साहित्य (कविता व नाटक) में है, जिसमे वे शब्द की निर्मलता को रूप देने के चेष्ठा रखते हैं. इसी काल से उनमें चित्रकला, साहित्य और रंगमंच, तीनों विधाओं के प्रति निष्ठा दिखती है. उनके द्वारा भविष्य में किये जानेवाले नाटकों का सौंदर्यबोध और तीव्रता का बीज इसी काल में फूटा.

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय को दिशा और गति देने के लिए अलकाजी को 1961 में दिल्ली आमंत्रित किया गया था. दिल्ली आने के बाद अलकाजी की फिरोजशाह कोटला, पुराना किला, लाल किला, तुगलकाबाद, लोदी गार्डन, कुतुब मीनार जैसे प्राचीन स्मारकों के प्रति आसक्ति उनमें एक नये चिंतन का कारण बनती है. उनके मानस में साहित्य की केंद्रीयता को अब इतिहास की महत्ता ने नयी चुनौतियां दे दी थीं. नाटक के वे तमाम पात्र, जो अब तक मिथक जैसे थे, अलकाजी उन्हें इतिहास में लानेवाले थे. इन स्मारकों में उनका मंचन करके वे उन्हें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि देने जा रहे थे.

प्रदर्शनी का तीसरा हिस्सा मुख्यतः कला और जीवन के परस्पर संवाद पर आधारित रहा. इस हिस्से को जुलेखा चौधरी ने संयोजित किया था. इस हिस्से में अलकाजी रंगमंच अभिलेखागार से अलकाजी के द्वारा लिये गये ‘यूरिपिड’ के कुछ छाया चित्रों और एक वीडियो को भी शामिल किया गया.

अलकाजी की तीन कलाकारों के साथ सहभागिता के रूप में मशहूर पेंटर मकबूल फिदा हुसैन द्वारा लिखित ‘द थियेटर ऑफ अब्सर्ड’, नलिनी मालानी और अलकनंदा सामर्थ द्वारा हेइनेर मुएलर के ‘नोट्स ओन परफॉर्मिंग मेडेया’ को प्रदर्शित किया गया था. प्रदर्शनी के इस हिस्से में, कला और जीवन के मध्य होते संवाद में, विभिन्न कलाओं की आपसी निर्भरता से उनकी वास्तविकता, छंद और राजनीति पर पड़ती छायाओं को प्रदर्शित किया गया. निश्चित रूप से यह प्रदर्शनी, इब्राहीम अलकाजी की मेधा-प्रदर्शन थी.

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