ePaper

GDP: 6 साल में सबसे ख़राब 4.5% कैसे हो गई- नज़रिया

Updated at : 29 Nov 2019 10:55 PM (IST)
विज्ञापन
GDP: 6 साल में सबसे ख़राब 4.5% कैसे हो गई- नज़रिया

<figure> <img alt="ग्रामीण" src="https://c.files.bbci.co.uk/136F2/production/_109720697_f2e623da-b96d-4469-b1af-b121a9e22515.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p> पिछली तिमाही की जीडीपी ग्रोथ का आंकड़ा आ गया है. </p><p>आशंकाएं सच साबित हुई हैं. जीडीपी ग्रोथ की दर गिरकर साढ़े चार परसेंट पर आ गई है. कुछ ही समय पहले समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अर्थशास्त्रियों का सर्वेक्षण किया था जिसमें ये दर गिरकर पांच […]

विज्ञापन

<figure> <img alt="ग्रामीण" src="https://c.files.bbci.co.uk/136F2/production/_109720697_f2e623da-b96d-4469-b1af-b121a9e22515.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p> पिछली तिमाही की जीडीपी ग्रोथ का आंकड़ा आ गया है. </p><p>आशंकाएं सच साबित हुई हैं. जीडीपी ग्रोथ की दर गिरकर साढ़े चार परसेंट पर आ गई है. कुछ ही समय पहले समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अर्थशास्त्रियों का सर्वेक्षण किया था जिसमें ये दर गिरकर पांच परसेंट से नीचे आने की आशंका जताई गई थी. लेकिन उन्होंने भी आंकड़ा 4.7 परसेंट तक ही रहने की आशंका जताई थी. </p><figure> <img alt="जीडीपी दर" src="https://c.files.bbci.co.uk/124CA/production/_109945947_gdp.png" height="816" width="947" /> <footer>BBC</footer> <figcaption>जीडीपी दर</figcaption> </figure><p>अब जो आंकड़ा आया है वो इस आशंका से भी ख़राब है. पिछले छह साल में सबसे ख़राब आंकड़ा है ये, इससे पहले 2013 में जनवरी से मार्च के बीच ये दर 4.3% पर थी. </p><p>चिंता की बात ये है कि ये लगातार छठी तिमाही है जब जीडीपी के बढ़ने की दर में गिरावट आई है. सबसे चिंताजनक ख़बर ये है कि इंडस्ट्री की ग्रोथ रेट 6.7% से गिरकर सिर्फ़ आधा परसेंट रह गई है. </p><p>इसमें भी मैन्युफ़ैक्चरिंग यानी कारख़ानों में बनने वाले सामान में बढ़ोत्तरी की जगह आधे परसेंचट की गिरावट दर्ज हुई है. उधर खेतीबाड़ी या कृषि क्षेत्र में बढ़ोत्तरी की दर 4.9 से गिरकर 2.1% और सर्विसेज़ की दर भी 7.3% से गिरकर 6.8 ही रह गई है. </p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-49525189?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भारतीय अर्थव्यवस्था में मंदी या सुस्ती का दौर?</a></li> </ul> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-48481291?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">बेरोज़गारी दर 45 साल में सबसे ज़्यादा</a></li> </ul><figure> <img alt="मज़दूर" src="https://c.files.bbci.co.uk/77EE/production/_109720703_ec1886ad-f61e-454f-b5e1-c646e3a68fe6.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> <figcaption>निर्यात में भी भारी कमी आई है</figcaption> </figure><h1>जीडीपी को कैसे समझें</h1><p>जीडीपी यानी ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट. हिंदी में इसे सकल घरेलू उत्पाद कहते हैं. </p><p>लेकिन इसका मतलब होता है देशभर में जहां कहीं भी जो कुछ भी बन रहा है, जो कोई भी जितनी भी कमाई कर रहा है उस सबका कुल जोड़. और कमाई का हिसाब तो आसानी से लगता नहीं है, इसलिए यहां हिसाब लगाने का आसान तरीक़ा है, ख़र्च का हिसाब लगाना. कुछ भी ख़रीदने पर हुआ कुल ख़र्च ही देश की जीडीपी होती है. </p><p>इसमें होने वाली बढ़ोत्तरी को ही जीडीपी ग्रोथ रेट कहते हैं और उसी से हिसाब लगता है कि देश किस रफ़्तार से तरक़्क़ी कर रहा है. यहां साथ में ही पर कैपिटा जीडीपी यानी देश में एक इंसान के ऊपर कितनी जीडीपी बनी इसका आंकड़ा भी जारी होता है. और अगर ये प्रति व्यक्ति या पर कैपिटा आँकड़ा नीचे रहा तो इसका सीधा मतलब ये होता है कि देश के नागरिक परेशानी में हैं, उनकी ज़रूरतें पूरी होने में मुश्किल हो रही है या ज़रूरतें पूरी नहीं हो पा रही हैं. </p><p>जबकि ये आंकड़ा ऊंचा होने का अर्थ नागरिकों की ज़िंदगी बेहतर होना है. ज़रूरी नहीं कि इसका मतलब देश में ग़रीबी या भुखमरी नहीं है, क्योंकि ये औसत होता है. अमरीका का औसत पर कैपिटा जीडीपी 55 हज़ार डॉलर के आसपास है, लेकिन वहां भी लगभग दस परसेंट लोग पेट भरने का इंतज़ाम नहीं कर पाते हैं. </p><p>ये पिछले साल का सरकारी आंकड़ा है. पिछली तिमाही की जीडीपी ग्रोथ का आंकड़ा आ गया है. आशंकाएं सच साबित हुई हैं. जीडीपी ग्रोथ की दर गिरकर साढ़े चार परसेंट पर आ गई है. कुछ ही समय पहले समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने अर्थशास्त्रियों का सर्वेक्षण किया था जिसमें ये दर गिरकर पांच परसेंट से नीचे आने की आशंका जताई गई थी. </p><p>लेकिन उन्होंने भी आंकड़ा 4.7 परसेंट तक ही रहने की आशंका जताई थी. अब जो आंकड़ा आया है वो इस आशंका से भी ख़राब है. ये पिछले छह साल में सबसे ख़राब आंकड़ा है. इससे पहले 2013 में जनवरी से मार्च के बीच ये दर 4.3% पर थी. </p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-50342521?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">मूडीज़ ने भारत की रेटिंग ‘नकारात्मक’ क्यों की?</a></li> </ul> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-50093074?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">भारतीय अर्थव्यवस्था में अब भी गड़बड़ी – IMF प्रमुख</a></li> </ul><figure> <img alt="मज़दूर" src="https://c.files.bbci.co.uk/18512/production/_109720699_fd179760-2529-4bfb-a474-2ded78a7a56f.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><h1>कितना परेशान करने वाले आंकड़े</h1><p>भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी इस साल मार्च में 2041 डॉलर यानी क़रीब एक लाख छियालीस हज़ार रुपए थी. इतनी सालाना कमाई पर बहुत से लोग मुंबई जैसे शहर में आज भी परिवार पाल रहे हैं. </p><p>लेकिन ये औसत है. इसका अर्थ ये भी है कि मु्ट्ठी भर लोग इससे हज़ारों या लाखों गुना कमा रहे हैं, और देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा इसका दसवां या सौवां हिस्सा भी हासिल नहीं कर पा रहा है. लेकिन वो ग़ैर-बराबरी की बहस है, वो एक अलग विषय भी है.</p><p>जीडीपी का तिमाही आंकड़ा इसलिए भी चिंता का विषय है कि पिछले डेढ़ साल में ही ये गिरते-गिरते वहां पहुंच चुका है, जो पिछले छह साल का सबसे कमज़ोर आंकड़ा है. इसके साथ ही दूसरी बड़ी चिंता यह है कि हाल फ़िलहाल स्थिति सुधरने के आसार भी नहीं दिखते. </p><p>ज़्यादातर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि इस बार गिरावट बढ़ने का अर्थ है कि पूरा साल सुधरना मुश्किल है. यानी वो पूरे वित्त वर्ष के लिए ही अब तरक़्क़ी की रफ़्तार में गिरावट देख रहे हैं. ये भी तब जब सरकार इसमें सुधार के लिए एक नहीं अनेक क़दम उठा चुकी है.</p><p>सरकार पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यस्था बनाने का लक्ष्य लेकर बैठी है. कैलकुलेटर से हिसाब लगाने से ही पता चलता है कि उसके लिए जीडीपी ग्रोथ रेट 12 परसेंट से ऊपर होना चाहिए. पिछले दस साल से तो भारत 10 परसेंट ग्रोथ का ही सपना देखता रहा है, और आमतौर पर सालाना सात से आठ परसेंट के बीच बढ़ता भी रहा. </p><p>पिछले साल रेट गिरकर भी क़रीब-क़रीब सात परसेंट रहा है. लेकिन अब अगर इसमें और गिरावट आती है तो ये गंभीर परेशानी का लक्षण है.</p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-50064055?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">सारी दुनिया के साथ भारत में भी मुश्किल दौर में अर्थव्यवस्था, IMF का अनुमान</a></li> </ul> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/social-50041810?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">अर्थव्यवस्था की सुस्ती पर वित्त मंत्री के पति की सलाह </a></li> </ul><figure> <img alt="प्रतीकात्मक तस्वीर" src="https://c.files.bbci.co.uk/C60E/production/_109720705_6d94be29-0c86-467f-bc58-dceb92f9f8f6.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> </figure><p>परेशानी का लक्षण इसलिए भी है कि सबसे तेज़ गिरावट ख़र्चों में दिख रही है. वो भी आम आदमी के ख़र्चों में जिसे कंज्यूमर स्पेंडिंग कहा जाता है. यानी लोग सामान नहीं ख़रीद रहे हैं, लोग ख़र्च में कटौती कर रहे हैं और जो पैसा उनके पास है उसे सोच समझकर ख़र्च कर रहे हैं या ज़्यादा बचा रहे हैं.</p><p>इसका असर यह है कि ख़र्च नहीं होगा तो सामान बिकेगा नहीं. बिकेगा नहीं तो बनाने वाले व्यापारी और कंपनियां मुश्किल में. वो मुश्किल में तो उनके कर्मचारी मुश्किल में. लोगों की तनख़्वाह नहीं बढ़ेंगी. हो सकता है, मिलें भी नहीं, और नौकरी जाने का डर भी बना हुआ है. बहुत से लोगों की नौकरियां जा भी चुकी हैं. चारों ओर से ऐसी ख़बरें आती जा रही हैं. इसका अर्थ है कि लोगों को ख़ुद की तरक़्क़ी का भरोसा नहीं है.</p><p>अभी तक सरकार ने जो किया है वो सब इस रास्ते पर हैं कि बैंकों से क़र्ज़ उठे, पैसा सिस्टम में आए, कारोबार तेज़ हो और तरक़्क़ी बढ़े. </p><p>मगर क़र्ज़ सस्ता हो जाना ही इस समस्या का इलाज नहीं है. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का कहना है कि देश में मंदी नहीं आ रही है. अर्थशास्त्र के सिद्धांत से उनकी बात सही हो सकती है, कि परिभाषा के हिसाब से ये मंदी या संकुचन की स्थिति नहीं है जिसे अंग्रेज़ी में रिसेशन कहते हैं. लेकिन जिसे अंग्रेज़ी में स्लो डाउन कहते हैं उसे भी तो हिंदी में मंदी ही कहा जाएगा. और वित्तमंत्री ने ख़ुद माना है कि शायद स्लोडाउन तो है. </p> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-50449583?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">मोदी सरकार NSO का डेटा क्यों रोकना चाहती है? </a></li> </ul> <ul> <li><a href="https://www.bbc.com/hindi/india-50051445?xtor=AL-73-%5Bpartner%5D-%5Bprabhatkhabar.com%5D-%5Blink%5D-%5Bhindi%5D-%5Bbizdev%5D-%5Bisapi%5D">नोबेल के बाद अभिजीत बोले संकट में है भारत</a></li> </ul><h1>सुस्ती की दवा क्या है</h1><p>अब सवाल ये है कि इस स्लोडाउन का इलाज क्या है. कंज्यूमर के मन में ये भरोसा कैसे आएगा कि वो जेब में हाथ डाले और पैसा निकालकर ख़र्च करे. उसका तो एक ही तरीक़ा है. जॉब मार्केट में तेज़ी. </p><p>जब लोगों को दिखेगा कि उनके हाथ में एक नौकरी और सामने दो ऑफर भी हैं तब उनके मन में ये उत्साह जागता है कि वो कमाने से पहले ही ख़र्च करने की सोचने लगते हैं.</p><p>ये हाल कैसे आएगा, इसके लिए विद्वानों के पास बहुत से सुझाव हैं. लेकिन इस वक़्त सरकार की एक समस्या यह भी दिख रही है कि जो सुझाव सामने आ जाए उसे ही आज़माकर देख लिया जाए. ये रास्ता चलता नहीं है. इससे शेयर बाजार भले ही चल जाए, अर्थव्यवस्था चलना मुश्किल है. </p><p>अभी आर्थिक सलाहकार परिषद में जो नए विद्वान जुड़े हैं उनके पास बहुत अनुभव है और कुछ बहुत कारगर सुझाव भी. सरकार को कम से कम इन लोगों की सलाह पर ध्यान देना पड़ेगा.</p><figure> <img alt="कर्मी" src="https://c.files.bbci.co.uk/29CE/production/_109720701_fd3d88e6-1184-47d3-a04a-90180a7facb0.jpg" height="549" width="976" /> <footer>Getty Images</footer> <figcaption>नई नौकरियां पैदा होने में मुश्किल आ सकती है</figcaption> </figure><p>पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने नोटबंदी के साथ ही आशंका जता दी थी कि जीडीपी ग्रोथ रेट में एक से डेढ़ परसेंट की गिरावट आ सकती है. अब जबकि ये सच होता दिख रहा है कम से कम उनसे बात करके इस बीमारी का इलाज तो पूछा ही जा सकता है.</p><p>लेकिन ताज़ा आंकड़े आने के बाद इतना तो कहा ही जा सकता है कि मंदी की तकनीकी परिभाषा और रिसेशन या स्लोडाउन के फ़र्क वाले शब्दजाल में उलझने के बजाय सरकार को अब गंभीरता से मान लेना चाहिए कि हालात बहुत ख़राब हैं, और इस हाल से उबरने के लिए पार्टियों का भेद भुलाकर सबको साथ लेकर चलने और युद्ध स्तर पर उपाय करने की तरफ़ बढ़ना चाहिए. </p><p><strong>(लेखक सीएनबीसी आवाज़ के पूर्व संपादक हैं. ये उनके निजी विचार हैं )</strong></p><p><strong>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप </strong><a href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi">यहां क्लिक</a><strong> कर सकते हैं. आप हमें </strong><a href="https://www.facebook.com/bbchindi">फ़ेसबुक</a><strong>, </strong><a href="https://twitter.com/BBCHindi">ट्विटर</a><strong>, </strong><a href="https://www.instagram.com/bbchindi/">इंस्टाग्राम </a><strong>और </strong><a href="https://www.youtube.com/user/bbchindi">यूट्यूब</a><strong>पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</strong></p>

विज्ञापन
Prabhat Khabar Digital Desk

लेखक के बारे में

By Prabhat Khabar Digital Desk

यह प्रभात खबर का डिजिटल न्यूज डेस्क है। इसमें प्रभात खबर के डिजिटल टीम के साथियों की रूटीन खबरें प्रकाशित होती हैं।

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola