शरीर पर 36 जख्म और पोस्टमार्टम में निकली 17 गोलियां, झारखंड के चर्चित नीरज सिंह हत्याकांड को जानिए

Edited by Rajneesh Anand
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नीरज सिंह और पूर्णिमा सिंह

Neeraj Singh Murder Case : 21 मार्च 2017 को झारखंड के धनबाद में एक हाई प्रोफाइल शूट आउट होता है, जिसमें धनबाद के सबसे प्रतिष्ठित राजनीतिक परिवार के बेटे और पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह की हत्या कर दी जाती है. शरीर से 17 गोलियां निकाली जाती है, नीरज सिंह का परिवार यह आरोप लगाता है कि उनके चचेरे भाई और उस वक्त झरिया के विधायक रहे संजीव सिंह ने उनकी हत्या करवाई है. शहर में तनाव फैलता है और समर्थक सड़क पर उतर आते हैं. परिवार का विवाद जो मुखिया सूर्यदेव सिंह के जाने के बाद से बढ़ता ही जा रहा था, वह अब हत्या करवाने के आरोपों तक पहुंच जाता है. संजीव सिंह सरेंडर करते हैं और जेल चले जाते हैं. पूरे 8 साल वे जेल में रहते हैं और इसी महीने यानी 8 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट से उन्हें बेल मिलती है और फिर 27 अगस्त को उन्हें कोर्ट इस मामले में साक्ष्य के अभाव में बरी कर देता है. पत्नी रागिनी सिंह और मां कुंती सिंह ने खुशी जताई है. आइए जानते हैं कि क्या था नीरज सिंह हत्याकांड, जिसने बढ़ा दिया था झारखंड में राजनीति का तापमान.

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Neeraj Singh Murder Case : धनबाद के पूर्व डिप्टी मेयर नीरज सिंह सहित उनके 4 सहयोगियों हत्या के मामले में कोर्ट ने 8 साल बाद अपना फैसला सुनाया है और साक्ष्य के अभाव में सभी 10 आरोपियों को बरी कर दिया. यह शूटआउट 2017 में धनबाद के सरायढेला में हुआ था और हत्याकांड का आरोप नीरज सिंह के चचेरे भाई और बीजेपी के पूर्व विधायक संजीव सिंह पर लगा था. 2017 से 2025 तक इस केस में 408 तारीखों पर सुनवाई हुई और अंतत: 27 को अगस्त एमपी-एमएलए कोर्ट के विशेष न्यायाधीश दुर्गेशचंद्र अवस्थी ने सभी 10 आरोपियों को बरी कर दिया. कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि किसी भी आरोपी के खिलाफ अभियोजन पक्ष कोई सबूत नहीं दे पाया है.

क्या था नीरज सिंह हत्याकांड

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हत्या के आरोप से बरी हुए संजीव सिंह

झारखंड के धनबाद में सिंह मेंशन का खास रसूख था. झरिया के चार बार विधायक रहे सूर्यदेव सिंह ने उस दबदबे को हमेशा कायम रखा. नीरज सिंह और संजीव सिंह दोनों ही इसी ‘सिंह मेंशन’ का हिस्सा थे. संजीव सिंह सूर्यदेव सिंह के बेटे हैं, जबकि नीरज सिंह सूर्यदेव सिंह के भाई राजनारायण सिंह के बेटे थे. 21 मार्च 2017 में नीरज सिंह की जब हत्या हुई थी उस वक्त शाम के 7 बज रहे थे और वे अपने कार्यालय से घर की ओर जा रहे थे. पूर्व डिप्टी मेयर और कांग्रेस नेता नीरज सिंह की फॉर्च्यूनर कार सरायढेला थाना क्षेत्र के स्टील गेट के पास एक स्पीड ब्रेकर पर थोड़ी धीमी हुई, उसी वक्त चारों ओर से मोटरसाइकिल पर सवार अज्ञात हमलावरों ने उन पर चारों ओर से गोलियों की बौछार कर दी. हमला इतना भयंकर था कि गाड़ी में नीरज सिंह के साथ मौजूद सभी चार लोग मौके पर ही मारे गए. पोस्टमार्टम में नीरज के शरीर से 17 गोलियां निकलीं. उनके शरीर पर 36 जख्म के निशान मिले. पोस्टमार्टम करने वाले मेडिकल बोर्ड के अनुसार नीरज ससिंह छाती में 16 व चेहरे पर चार गोलियां मारी गई थीं. हालांकि एक इंटरव्यू में उनकी पत्नी पूर्णिमा सिंह ने यह दावा किया था कि उनके पति को 67 गोलियां मारी गईं थीं. हमलावरों ने लगभग ढाई फीट की दूरी से गोली मारी गयी. उन्होंने गोलियां शरीर की ऐसी जगहों पर मारी जहां गोली लगने पर मौत निश्चित है. नीरज सिंह उनके ड्राइवर चंद्रप्रकाश महतो उर्फ घोलटू , अंगरक्षक प्रदीप उर्फ मुन्ना तिवारी और पीए अशोक यादव को गोली मारी गई थी. घटना के वक्त गाड़ी में एक और व्यक्ति था आदित्य राज, उसी ने घटना की जानकारी नीरज सिंह के भाइयों को दी थी. आदित्य राज को भी हाथ में गोली लगी थी.

हत्याकांड के बाद पूरे इलाके में तनाव फैल गया था

नीरज सिंह का पूरा परिवार राजनीतिक पृष्ठभूमि का था, जिसकी वजह से इस हत्याकांड की खबर फैलते ही पूरे इलाके में तनाव का माहौल कायम हो गया. समर्थक सड़क पर उतर आए और कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ गई. सड़क पर प्रदर्शन, पथराव और सड़कजाम किए जा रहे थे. उस वक्त नीरज सिंह के चचेरे भाई संजीव सिंह झरिया के विधायक थे और नीरज सिंह के परिवार ने उनपर ही हत्या का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज कराया था. प्रशासन ने मौके की नजाकत को समझते हुए अविलंब पूरे क्षेत्र में धारा 144 लागू कर दिया और सुरक्षा की चाक चौबंद व्यवस्था कर दी. नीरज सिंह के भाई अभिषेक सिंह ने हत्या की प्राथमिकी दर्ज कराई और उन्होंने प्राथमिकी में यह दावा किया था कि जब उन्हें अपने भाई नीरज सिंह की हत्या की खबर मिली तो वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने संजीव सिंह को बाइक पर सवार जाते हुए देखा. उस वक्त संजीव सिंह ने उनसे कहा था कि तुम्हारे भाई को मार दिया है, तुमलोगों का भी यही हश्र होगा.

नीरज सिंह की हत्या की वजह क्या थी?

जैसा कि जगजाहिर है, सूर्यदेव सिंह की मौत के बाद सिंह मेंशन में तनाव बढ़ने लगा था और अंतत: यह तनाव परिवार में विभाजन के रूप में सामने आया. नीरज सिंह का परिवार सिंह मेंशन से बाहर आ गया और वे रघुकुल में रहने लगे.

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नीरज का राजनीतिक कद बढ़ना

नीरज सिंह एक कुशल राजनीतिज्ञ के रूप में उभर रहे थे. मजदूरों खासकर असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के बीच वे काफी लोकप्रिय हो चुके थे. आउटसोर्सिंग के मजदूरों की मजदूरी बढ़वाने में उनकी मुख्य भूमिका थी. इसके चलते झरिया विधायक संजीव सिंह और उनके बीच प्रतिद्वंद्विता बढ़ती जा रही थी. मजदूरों का नीरज सिंह के प्रति झुकाव बढ़ गया था, जबकि संजीव सिंह से वे किनारा करने लगे थे. आम जनता में उनकी लोकप्रियता इतनी बढ़ चुकी थी कि उम्मीद की जा रही थी कि वे अगला चुनाव झरिया से जीत सकते हैं, जिसकी वजह से उनकी हत्या की साजिश रची गई.

संपत्ति को लेकर संजीव सिंह और नीरज सिंह में विवाद

सूर्यदेव सिंह का परिवार

पूर्वजसंतानपोते/पोतियाँ
चंडी प्रसाद सिंह1. सूर्यदेव सिंह– किरण सिंह (पुत्री)- राजीव रंजन सिंह (पुत्र)🔴 संजीव सिंह (पुत्र)– मनीष सिंह (पुत्र)- ज्योति सिंह (पुत्री)
2. विक्रमा प्रसाद सिंह– मीरा सिंह (पुत्री)- धर्मशीला (पुत्री)- पुष्पा (पुत्री)- विमल (पुत्री)- मंजू (पुत्री)- सत्येंद्र सिंह (पुत्र)- माधुरी (पुत्री)- नूतन (पुत्री)- राकेश सिंह (पुत्र)- बलवंत (पुत्र)- यशवंत (पुत्र)- रवि (पुत्र)
3. बच्चा सिंह❌ संतान नहीं
4. राजनारायण (राजन) सिंह🔵 नीरज सिंह (पुत्र)– अभिषेक सिंह उर्फ गुड्डू (पुत्र)- मुकेश सिंह (पुत्र)- एकलव्य सिंह उर्फ छोटे (पुत्र)
5. रामधीर सिंह– शशि सिंह (पुत्र)- संध्या (पुत्री)- छाया (पुत्री)- श्वेत शिखा (पुत्री)

संपत्ति बंटवारे के लिए नीरज सिंह एवं संजीव सिंह के परिवार में विवाद चल रहा था. मामला कोर्ट में लंबित था. धनबाद में कुंती निवास व सिंह मेंशन में हिस्से को ले कर विवाद गहरा गया था. बलिया (यूपी) में भी संपत्ति बंटवारा का विवाद चल रहा था. बलिया में खेती लायक 25 फीसदी भूमि का ही बंटवारा हो पाया था. इस वजह से दोनों परिवार आमने-सामने था.

बच्चा सिंह के उत्तराधिकार को लेकर भी था विवाद

नीरज सिंह और संजीव सिं के चाचा बच्चा सिंह के उत्तराधिकार को लेकर भी दोनों परिवारों में ठनी हुई थी. बच्चा सिंह पूर्व मंत्री रहे थे और उनका झुकाव नीरज सिंह की ओर दिखता था, चूंकि बच्चा सिंह की कोई संतान नहीं थी इसलिए संजीव या नीरज ही उनके उत्तराधिकारी हो सकते थे.

जमानत पर रिहा हो चुके थे संजीव सिंह

संजीव सिंह ने हत्या के कुछ दिनों बाद सरेंडर कर दिया था, हालांकि पुलिस उसकी तलाश में थी. उसके बाद से संजीव सिंह जेल में बंद थे. इसी वर्ष अगस्त माह में सुप्रीम कोर्ट से संजीव सिंह को जमानत मिली थी. कोर्ट ने उन्हें यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि किसी भी स्वतंत्र गवाह ने यह स्वीकार नहीं किया था कि उसने घटनास्थल पर संजीव सिंह को देखा था. संजीव सिंह का स्वास्थ्य अच्छा नहीं है और वे सुनवाई के दौरान भी स्ट्रेचर पर कोर्ट पहुंचे थे.

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लेखक के बारे में

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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