नाटो देशों की अब खैर नहीं, रूस ने उनकी जासूसी के लिए बनाया दुनिया का सबसे बड़ा सिग्नल इंटेलिजेंस व्यूह

Edited by Rajneesh Anand
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रूस ने जासूसी के लिए बनाया दुनिया का सबसे बड़ा सिग्नल इंटेलिजेंस व्यूह

Russia-Ukraine War : रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने के लिए एक ओर जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपना पूरा जोर लगा रहे हैं, वहीं ऐसे समय में एक जानकारी सामने आई है, जो इस बातचीत में बड़ा विवाद खड़ा कर सकती है. दरअसल नाटो और रूस के बिगड़ते रिश्तों के बीच यूक्रेनी शोधकर्ताओं ने जानकारी दी है कि रूस ने नाटो की सीमा पर जासूसी के लिए एक इंटेलिजेंस व्यूह तैयार कर लिया है. इस जानकारी ने नाटो देशों के पैर तले से जमीन खिसका दी है.

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Russia-Ukraine War: रूस और नाटो के बीच टकराव आज के समय में केवल रूस-यूक्रेन युद्ध के रूप में दिखता है, लेकिन इसकी शुरुआत द्वितीय विश्वयुद्ध के वक्त ही हो गई थी. नाटो का गठन ही द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद सोवियत रूस की बढ़ती शक्ति के खिलाफ यूरोप और अन्य पश्चिमी देशों ने अपनी सुरक्षा के लिए किया था. यह एक सैन्य संगठन है और इसके सिद्धांत के अनुसार नाटो के किसी भी देश पर हमला पूरे संगठन पर हमला है. यूक्रेन का झुकाव नाटो की ओर है, इसी वजह से रूस-यूक्रेन युद्ध को रूस-नाटो के विवाद के रूप में भी देखा जाता है. रूस ने नाटो पर नजर रखने के लिए विश्व की सबसे बड़ी सिग्नल इंटेलिजेंस प्रणाली को स्थापित किया है, इसके बारे में यूक्रेनी शोधकर्ताओं ने जानकारी दी है.-

पोलैंड के निकट स्थापित है यह सिग्नल इंटेलिजेंस प्रणाली

यूक्रेन के रिसचर्स का दावा है कि रूस ने नाटो की पूर्वी सीमा यानी पोलैंड से महज 15.5 मील की दूरी पर कैलिनिनग्राद एक्सक्लेव में एक विशाल गोलाकार एंटीना ऐरे (Circularly Disposed Antenna Array – CDAA) का निर्माण किया है. इसका निर्माण लगभग पूरा हो चुका है और विशेषज्ञ इसे दुनिया की सबसे बड़ी सिग्नल इंटेलिजेंस प्रणाली करार दे रहे हैं. रिसचर्स के इस खुलासे ने नाटो की चिंता कई गुना बढ़ा दी है, क्योंकि इसके जरिए रूस पूर्वी यूरोप में होने वाली गतिविधि पर आसानी से नजर रख सकेगा.

सिग्नल इंटेलिजेंस प्रणाली की खासियत

रूस ने साल 2023 में इस जासूसी तंत्र का निर्माण शुरू करवाया था और अब यह लगभग पूरा हो चुका है. इस गोलाकार जासूसी तंत्र का व्यास लगभग 1,600 मीटर बताया जा रहा है. शोध समूह टोचनी के अनुसार, पूरी परिधि में 180 प्वाइंट्‌स ऐसे हैं, जहां एंटीना लगाया जाएगा और फिर उन्हें भूमिगत केबलों से जोड़कर एंटीना के केंद्र से जोड़ा गया है. यह डिजाइन किसी आधुनिक तकनीक की बजाय शीत युद्ध काल की याद दिलाता है, जब अमेरिका और सोवियत संघ दोनों ने इसी तरह के एरे का इस्तेमाल पनडुब्बियों से संपर्क और सिग्नल दिशा निर्धारण के लिए किया था. लेकिन इस बार फर्क यह है कि रूस इस पुरानी तकनीक को नए सैन्य सिद्धांतों के साथ जोड़ रहा है, जहां जमा की गई सूचनाओं का इस्तेमाल हथियार के रूप में होगा.

सिग्नल इंटेलिजेंस प्रणाली की मदद से नाटो पर सीधी नजर पाएगा रूस

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कैलिनिनग्राद की भौगोलिक स्थिति इस तरह की है कि सिग्नल इंटेलिजेंस प्रणाली की मदद से नाटो पर रूस की सीधी नजर रहेगी. रूस का कैलिनिनग्राद पोलैंड और लिथुआनिया की सीमा से सटा हुआ है और बाल्टिक सागर के किनारे बसा है. यानी रूस ने नाटो की पूर्वी सीमा के ‘दिल’ में ही निगरानी तंत्र खड़ा कर दिया है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस निगरानी तंत्र की मदद से रूस पूर्वी यूरोप में नाटो की रेडियो और सैन्य संचार व्यवस्था को पकड़ने में सक्षम होगा. साथ ही वह बाल्टिक सागर और उत्तरी अटलांटिक में तैनात रूसी पनडुब्बियों से सुरक्षित संवाद कर सकेगा और इलेक्ट्रॉनिक जासूसी अभियानों में रूस को निर्णायक बढ़त मिलेगी.

नाटो पर सिर्फ रक्षा नहीं मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश

कैलिनिनग्राद में निगरानी तंत्र स्थापित कर रूस ने ना सिर्फ रक्षा बल्कि मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी नाटो को चुनौती देने वाली प्रणाली विकसित कर ली है. रूस दरअसल यह दिखाना चाहता है कि वह नाटो की गतिविधियों को न केवल देख रहा है, बल्कि हर वक्त उनका संचार पढ़ने की क्षमता रखता है. नाटो की चिंता इस बात को लेकर भी है कि रूस इस व्यूह रचना को आक्रामक क्षमता में बदल सकता है. यानी यह केवल सुनने और पकड़ने वाला यंत्र न रहकर, नाटो के संचार में बाधा डालने या उसे तोड़फोड़ करने का जरिया बन सकता है.

अमेरिका और यूरोप की कूटनीति पर दबाव

रूस द्वारा कैलिनिनग्राद में निगरानी तंत्र स्थापित करने की जानकारी ऐसे समय में आई है जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर शांति वार्ता की कोशिशें जारी हैं. लेकिन रूस की इस नई गतिविधि ने अमेरिका और यूरोप दोनों की कूटनीति को पेचीदा बना दिया है. अमेरिकी खुफिया एजेंसियां पहले ही इस निर्माण की निगरानी कर रही थीं. अब जब यह सार्वजनिक हो गया है, तो नाटो पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है.

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रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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