पुल के अभाव में नाव का ही अब सहारा

Updated at : 28 Jun 2018 12:53 AM (IST)
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पुल के अभाव में नाव का ही अब सहारा

नागराकाटा : भारी बारिश में उफनाती डायना नदी को पार करने के लिए आज भी वामनडांगा चाय बागान के छह हजार लोगों को नाव का ही सहारा है. ये लोग जिंदगी को जोखिम में डालकर नदी पार करने पर मजबूर हैं. यहां नदी पर पुल बनाने की मांग पुरानी है, पर कोई सुननेवाला नहीं है. […]

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नागराकाटा : भारी बारिश में उफनाती डायना नदी को पार करने के लिए आज भी वामनडांगा चाय बागान के छह हजार लोगों को नाव का ही सहारा है. ये लोग जिंदगी को जोखिम में डालकर नदी पार करने पर मजबूर हैं. यहां नदी पर पुल बनाने की मांग पुरानी है, पर कोई सुननेवाला नहीं है. इसे लेकर स्थानीय लोगों में गुस्सा बढ़ रहा है.
पहाड़ से आनेवाली इस तेज प्रवाह नदी को बड़ी संख्या में स्कूल-कॉलेज के विद्यार्थी भी पार करते हैं. नावों पर साइकिल आदि लादने, अधिक लोगों के सवार होने से कई बार हादसे भी हुए हैं. किस्मत की बात बस इतनी है कि इसमें किसी की जान नहीं गयी.
ब्लॉक सदर से 20 किलोमीटर की दूरी पर है वामनडांगा चाय बागान. इसके एक ओर डायना जंगल व नदी है और दूसरी तरफ गोरूमारा जंगल है. डायना नदी बागान के हाथी लाइन से सटकर बहती है. यहां के लोगों को नाथुआ, माझियाली बस्ती, धूमपाड़ा, गदियारकुठी, धूपगुड़ी, बानरहाट और जलपाईगुड़ी जाने के लिए डायना नदी को पार करना पड़ता है. सोमवार को नाथुआ में हाट लगती है. रोजमर्रा की जरूरत की चीजों की खरीदारी के लिए इस दिन झुंड के झुंड लोग नदी पार करके जाते हैं. जाड़े में नदी में पानी कम हो जाने पर ज्यादा समस्या नहीं होती, लेकिन साल के छह महीने नाव का सहारा लेना पड़ता है.
नाव से बार-बार नदी पार आना-जाना करना महंगा भी पड़ता है. एक बार नदी पार करने के लिए प्रति व्यक्ति 10 रुपये देने होते हैं. साथ में साइकिल होने पर 15 और मोटरसाइकिल होने पर 25 रुपये लगते हैं.नदी पार करके जाने पर नाथुआ की दूरी केवल चार किलोमीटर है और मयनागुड़ी की 15 किलोमीटर. अगर नदी पार नहीं करके नागराकाटा होकर जाया जाये तो दूरी चार गुना तक बढ़ जाती है. अभी बागान के कई लड़के-लड़कियों को नाथुआ स्थित आइटीआइ में पढ़ने का मौका मिला है.
इन सभी को रोज नदी पार करके आना-जाना पड़ता है. स्थानीय लोगों का कहना है कि इस जगह पर पुल बन जाये तो बहुत सुविधा हो जाये. समय कम लगेगा और लोगों का पैसा भी बचेगा. इसके अलावा जान जोखिम में डालने की जरूरत भी नहीं रह जायेगी.
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