जमीन तो गयी ही, बैंकों का कर्ज भी चढ़ा

Published at :16 Mar 2018 9:13 AM (IST)
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जमीन तो गयी ही, बैंकों का कर्ज भी चढ़ा

करीब दो दर्जन परिवार परेशान ग्राम पंचायन ने साधी चुप्पी बालुरघाट : दक्षिण दिनाजपुर जिले के बालुरघाट ब्लॉक अंतर्गत कुछ किसान इन दिनों काफी परेशान हैं. पारंपरिक खेती छोड़कर विकल्प खेती करना ही इनके लिए जी का जंजाल बन गया और अब आलम यह है कि उस जमीन पर किसी प्रकार की कोई खेती नहीं […]

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करीब दो दर्जन परिवार परेशान
ग्राम पंचायन ने साधी चुप्पी
बालुरघाट : दक्षिण दिनाजपुर जिले के बालुरघाट ब्लॉक अंतर्गत कुछ किसान इन दिनों काफी परेशान हैं. पारंपरिक खेती छोड़कर विकल्प खेती करना ही इनके लिए जी का जंजाल बन गया और अब आलम यह है कि उस जमीन पर किसी प्रकार की कोई खेती नहीं हो रही है. जमीन पर उनका कब्जा भी नहीं है. जिसके कारण चकभृगु ग्राम पंचायत के अधीन मुस्तफापुर मौजा के किसान काफी परेशान हैं. इस इलाके के अधिकांश किसान आदिवासी हैं. इनके पास पहले से ही जमीन काफी कम है.
जो जमीन है भी उसमें पारंपरिक खेती कर किसी तरह से अपने तथा अपने परिवार का पेट पालते हैं. यहां के आदिवासी किसान घर-परिवार चलाने के लिए अपनी जमीन पर खेती करने के साथ ही बालुरघाट शहर जाकर मेहनत मजदूरी का भी काम करते हैं. वर्ष 2010 में इन किसानों ने विकल्प खेती कर सरकार की सहायता से अधिक मुनाफा कमाने का सपना देखा था. अब करीब छह-सात साल बाद इनका सपना पूरी तरह से चकनाचूर हो गया है. ऊपर से जमीन खेती के लायक भी नहीं रही है.
मिली जानकारी के अनुसार, आरएसपी संचालिति तत्कालीन ग्राम पंचायत ने किसानों का मुनाफा बढ़ाने के लिए विकल्प खेती की योजना बनायी. तब प्रशासनिक मध्यस्थता से कुछ किसानों की जमीन भी ली गई. चकभृगु ग्राम पंचायत की पहल पर मुस्तफापुर मौजा के करीब दो दर्जन परिवार अपनी जमीन ग्राम पंचायत के साथ मिलकर विकल्प खेती के लिए तैयार हो गये. तब 100 दिन रोजगार योजना के तहत एक कलस्टर बनाकर विकल्प खेती शुरू की गई. इसी बीच राज्य में चुनाव हुआ और सत्ता बदलने के साथ ही इस ग्राम पंचायत का समीकरण ही बदल गया. वर्ष 2013 के पंचायत चुनाव में वाममोर्चा धराशाही हो गई. तृणमूल कांग्रेस ने इस ग्राम पंचायत पर कब्जा कर लिया. नये बोर्ड ने विकल्प खेती को आगे बढ़ाने के लिए कुछ भी नहीं किया. परिणामस्वरूप तब से यह जमीन पड़ती है और इसकी उर्वरा शक्ति एक तरह से खत्म हो गई है. प्रशासनिक जटिलता के कारण आदिवासी अपनी जमीन भी नहीं ले पा रहे हैं.
तब इस जमीन पर सेमियालाटा के पेड़ लगाये गये थे. इसके अलावा कुछ जमीन को खोदकर उसे तालाब में परिणत कर दिया गया था. किसान इसमें मछली पालन करते थे. इससे आसपास के भी कुछ लोगों को रोजी-रोटी मिलने लगी थी. नये पंचायत की उदासीनता की वजह से यह परियोजना पूरी तरह से बंद है. जमीन मालिक सुनीति सोरेन, सियानुस तिरकी आदि ने बताया कि अब वह लोग काफी परेशान हैं.
क्या कहते हैं पंचायत समिति के अध्यक्ष
इस संबंध में बालुरघाट पंचायत समिति के अध्यक्ष प्रवीण राय से बात की गई तो उन्होंने माना कि एक अच्छी परियोजना बंद हो गई है. इसे बंद नहीं होना चाहिए था. 100 दिन रोजगार योजना को चालू रखना चाहिए था.
योजना के बंद होने से जहां किसान एक ओर अपनी जमीन खो रहे हैं, वहीं दूसरी ओर उन पर बैंकों का कर्जा बढ़ गया है. इस मुसीबत से बचाने के लिए किसानों के लिए नयी परियोजना शुरू की जायेगी. ग्राम पंचायत को नयी योजना बनाने के लिए कहा गया है. वह जिलाधिकारी से भी इस मामले में बात करेंगे.
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