रंग ला रही आर्किड के एक शिक्षक की पहल

Published at :05 Mar 2018 4:31 AM (IST)
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रंग ला रही आर्किड के एक शिक्षक की पहल

शिक्षक आशीष राय 17 सालों से इस काम में लगे हैं एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पेश किया संरक्षण मॉडल नागराकाटा : डुआर्स में जंगल लगातार सिमटते जा रहे हैं. जंगल के पेड़ों पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे आर्किड उगते हैं. आर्किड परजीवी पौधे होते हैं. इनके खूबसूरत फूलों की मांग पूरी दुनिया में है. लेकिन समय […]

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शिक्षक आशीष राय 17 सालों से इस काम में लगे हैं
एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में पेश किया संरक्षण मॉडल
नागराकाटा : डुआर्स में जंगल लगातार सिमटते जा रहे हैं. जंगल के पेड़ों पर तरह-तरह के रंग-बिरंगे आर्किड उगते हैं. आर्किड परजीवी पौधे होते हैं. इनके खूबसूरत फूलों की मांग पूरी दुनिया में है. लेकिन समय के साथ डुआर्स के जंगलों में आर्किड दुर्लभ होते जा रहे हैं. आर्किड के संरक्षण के लिए तराई के एक स्कूल शिक्षक ने एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में देश-विदेश के वनस्पति विज्ञानियों का ध्यान आकर्षित किया है.
खोरीबाड़ी के बुड़ागंज कालकूट सिंह हाइस्कूल में जीव विज्ञान के शिक्षक आशीष कुमार राय के अनुरोध पर लुप्त हो रही आर्किड प्रजातियों को चिह्नित कर टिश्यू कल्चर के माध्यम से उनके संरक्षण की पहल की गयी है. इस काम में आगे आने का वादा तमिलनाडु के भारती दर्शन विश्वविद्यालय के वनस्पति विभाग ने किया है. उल्लेखनीय है कि हाल ही में आंध्रप्रदेश के गुंटूर के नागार्जुन विश्वविद्यालय में आर्किड एवं औषधीय पौधों पर एक अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित हुआ था. इसमें भारत के अलावा पांच देशों के जाने-माने वनस्पतिविज्ञानियों ने हिस्सा लिया.
आशीष कुमार राय ने बताया कि डुआर्स के जंगल में उनकी जानकारी में अभी करीब 115 किस्म के आर्किड हैं. इनमें से कई किस्में अपने पर्यावास के सिकुड़ने के चलते विलुप्त हो रही हैं. डेंड्रोरियम फिमब्रियेटाम और डेंड्रोरियम नोबाइल नामक दो औषधीय प्रजातियों के आर्किड लगभग खत्म हो गये हैं. श्री राय ने कहा कि कोई प्रजाति इस धरती से हमेशा के लिए खत्म हो जाये, इसे स्वीकार कर पाना बहुत कठिन है.
इसी कारण वह अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का बुलावा मिलने पर उन्होंने वहां डुवार्स के आर्किड प्रजातियों के बारे में अपनी चिंता को सबके सामने रखा. सबसे अच्छी बात यह रही कि मेरी बात से अन्य लोगों ने सहमति जताते हुए इस दिशा में पहल करने का फैसला लिया.
आशीष राय पहले कोलाबाड़ी हाइस्कूल में शिक्षक थे और अभी खोरीबाड़ी स्कूल में शिक्षक हैं. बीते 17 सालों से वह चुपचाप आर्किड पर लगातार काम में जुटे हैं. कई विलुप्तप्राय आर्किडों को खोजकर उन्होंने दूसरे पौधों पर भी स्थानांतरित करने का काम किया है. हाल ही में गोरूमारा जंगल में फ्लाइओवर तैयार करने के समय हजारों पेड़ काटे गये. इन पेड़ों पर उगे आर्किडों को उन्होंने दूसरे जगहों पर स्थानांतरित किया. बानरहाट रेलवे स्टेशन के सामने एक पेड़ आर्किडों से भरा नजर आता है. यह काम आशीष राय ने ही किया है. हाल के सम्मेलन में भागीदारी से पहले उन्होंने आर्किड सोसायटी ऑफ इंडिया के सम्मेलन में भी हिस्सा लिया था.
अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उनके 12 मिनट के भाषण से और आर्किड को बचाने के उनके संरक्षण मॉडल से तमिलनाडु का भारती दर्शन विश्वविद्यालय का वनस्पति विज्ञान विभाग काफी प्रभावित हुआ है. उसने विलुप्तप्राय आर्किडों के संरक्षण के लिए टिश्यू कल्चर पद्धति के साथ आगे आने का वादा किया है.
आशीष राय ने कहा कि वह ऐसे आर्किडों को खोजकर विश्वविद्यालय को भेजेंगे. वहां की प्रयोगशाला में टिश्यू कल्चर के माध्यम से इन आर्किडों के नये पौधे को तैयार कर विभिन्न वृक्षों पर रोपा जायेगा.
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