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सुंदरबन में बाघ से जंग जारी : 5 साल में 21 मौतें, आंकड़े घटे लेकिन खतरा बरकरार

Updated at : 09 Mar 2026 2:41 PM (IST)
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Sundarbans Tiger Attack West Bengal News

Sundarbans Tiger Attack Deaths: सुंदरबन में पिछले पांच वर्षों में बाघ के हमलों में 21 लोगों की मौत हो चुकी है. आंकड़ों में कमी आयी है, लेकिन मानव-बाघ संघर्ष अब भी गंभीर चिंता का विषय है. जानिए, विशेषज्ञ क्या कहते हैं और क्यों बना हुआ है खतरा.

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Sundarbans Tiger Attack Deaths: पश्चिम बंगाल के सुंदरबन क्षेत्र में मानव और बाघ के बीच संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहा है. पिछले 5 वर्षों में बाघ के हमलों में 21 लोगों की जान जा चुकी है. हालांकि, हाल के वर्षों में मौत के आंकड़ों में थोड़ी कमी आयी है, लेकिन खतरा बरकरार है.

2022 में हुई सबसे ज्यादा मौतें

वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से 2025 के बीच बाघ के हमलों में 21 लोगों की मौत हुई है. वर्ष 2022 में सबसे ज्यादा मौतें हुईं. इसके बाद 2023 और 2024 में मामलों में कुछ गिरावट आयी, लेकिन बाघ के हमले पूरी तरह से बंद नहीं हुए हैं.

रोजी-रोटी के लिए जोखिम उठाते हैं लोग

सुंदरबन के कई लोग आज भी जंगल और नदी पर निर्भर हैं. मछली पकड़ना, शहद इकट्ठा करना और लकड़ी लाना यहां के लोगों की आजीविका का प्रमुख साधन है. यही वजह है कि जोखिम जानते हुए भी लोग जंगल में जाते हैं और कई बार बाघ का शिकार बन जाते हैं.

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क्यों बढ़ता है संघर्ष?

विशेषज्ञों का कहना है कि प्राकृतिक आपदाओं, चक्रवात और पर्यावरणीय बदलावों के कारण बाघों का प्राकृतिक आवास प्रभावित हुआ है. इससे वे अक्सर गांवों की ओर रुख करते हैं. वहीं, जंगल पर बढ़ती लोगों की निर्भरता भी संघर्ष का बड़ा कारण है.

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क्या कह रहे हैं विशेषज्ञ?

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि मानव-बाघ संघर्ष को कम करने के लिए बेहतर निगरानी, जागरूकता अभियान और वैकल्पिक आजीविका के साधन उपलब्ध कराना जरूरी है. साथ ही, जंगल में प्रवेश करने वालों के लिए सख्त नियमों का पालन और सुरक्षा उपाय अनिवार्य होने चाहिए.

खत्म नहीं हुआ है खतरा

पिछले 2 वर्षों में मौतों की संख्या कुछ कम हुई है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसे स्थायी सुधार नहीं माना जा सकता. सुंदरबन का संवेदनशील पारिस्थितिकी तंत्र अभी भी मानव-बाघ संघर्ष की चुनौती से जूझ रहा है.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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