लंबे समय तक शारीरिक संबंध दुष्कर्म नहीं सहमतिपूर्ण रिश्ते का संकेत है : हाइकोर्ट

न्यायमूर्ति प्रसेनजीत विश्वास ने पाया कि घटना के समय शिकायतकर्ता 20 वर्ष से अधिक आयु की एक बालिग महिला थी.
कलकत्ता हाइकोर्ट ने आरोपी की दोषसिद्धि रद्द की
कोलकाता. कलकत्ता हाइकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में, दुष्कर्म (धारा 376 आइपीसी) और धोखाधड़ी (धारा 415 आइपीसी) के लिए एक शख्स को दोषी ठहराने वाले निचली अदालत के फैसले को रद्द कर दिया है. अपील को स्वीकार करते हुए, हाइकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष दुष्कर्म का आरोप स्थापित करने में विफल रहा और निष्कर्ष निकाला कि अपीलकर्ता और शिकायतकर्ता के बीच संबंध जबरदस्ती नहीं, बल्कि सहमतिपूर्ण थे. न्यायमूर्ति प्रसेनजीत विश्वास ने पाया कि घटना के समय शिकायतकर्ता 20 वर्ष से अधिक आयु की एक बालिग महिला थी. इसके अलावा, जिरह के दौरान शिकायतकर्ता द्वारा लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाये रखने की बात स्वीकार करना, जबरन यौन संबंध के सिद्धांत को नकारता है. कोर्ट ने मामले में मेडिकल सबूतों की पूर्ण कमी और प्रमुख गवाहों से पूछताछ करने में अभियोजन पक्ष की विफलता को गंभीर खामियां माना.
अपीलकर्ता ने यह अपील इस्लामपुर के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा सात जुलाई 2000 को पारित एक फैसले के खिलाफ दायर की थी. निचली अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 376 और 415 के तहत दोषी पाया था और दो साल के कठोर कारावास और 7,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनायी थी. अपीलकर्ता की ओर से पेश हुए दीपांजन चटर्जी ने तर्क दिया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री सजा को सही ठहराने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त थी. उन्होंने गवाहों के बयानों में पर्याप्त विसंगतियों और अंतर्विरोधों की ओर इशारा किया.
कोर्ट ने पीड़िता की उम्र को काफी महत्व दिया. उसके ट्रांसफर सर्टिफिकेट (प्रदर्श-3) के आधार पर, उसकी जन्म तिथि दो जनवरी 1974 थी. कोर्ट ने गणना की कि 13 मार्च 1994 को हुई घटना के समय, पीड़िता 20 वर्ष से अधिक आयु की थी. न्यायमूर्ति विश्वास ने टिप्पणी की : इस प्रकार, वह एक बालिग और एक परिपक्व महिला थी, जो अपने स्वयं के कृत्यों और निर्णयों की प्रकृति और परिणामों को समझने में सक्षम थी.
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