महिलाओं के हुनर से भी निखर रही मां की मूरत

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कोलकाता : देश के सबसे बड़े मूर्तिकारों के मोहल्ले कुम्हारटोली में महिलाएं भी अपने हुनर का बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं. महिला मूर्तिकारों द्वारा बनायी गयीं मूर्तियों को विदेशों में भी पसंद किया जा रहा है. पिछले नौ वर्षों से कुम्हारटोली में प्रतिमा निर्माण कर रहीं मीनाक्षी पाल का कहना है कि मूर्तियां बनाने का […]

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कोलकाता : देश के सबसे बड़े मूर्तिकारों के मोहल्ले कुम्हारटोली में महिलाएं भी अपने हुनर का बेहतरीन प्रदर्शन कर रही हैं. महिला मूर्तिकारों द्वारा बनायी गयीं मूर्तियों को विदेशों में भी पसंद किया जा रहा है. पिछले नौ वर्षों से कुम्हारटोली में प्रतिमा निर्माण कर रहीं मीनाक्षी पाल का कहना है कि मूर्तियां बनाने का काम सदियों से पुरुषों के ही हाथों में था, लेकिन अब महिलाएं पुरुषों के इस गढ़ में सेंध लगाने लगी हैं.

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मूर्तिकला उनके खून में है. उनके पिता प्रदीप पाल देश के एक प्रसिद्ध मूर्तिकार थे. उन्होंने दिल्ली और अहमदाबाद स्थित अक्षरधाम मंदिर की नक्काशी की थी. 2011 में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने इस कला को जीविका के रूप में अपनाया. उनका परिवार 104 वर्षों से खड़गपुर के रेलवे कारखाने में मूर्ति का निर्माण करता आ रहा है.
तीन पीढ़ी के बाद अब वह मूर्ति निर्माण कर रही हैं. इसके साथ ही महानगर की कई प्रतिष्ठित पूजा समितियों की प्रतिमा का वह निर्माण कर रही हैं. स्काॅटिश चर्च कॉलेज से ग्रेजुएशन करनेवाली मीनाक्षी बताती हैं कि वह चाहतीं तो किसी सरकारी या प्राइवेट प्रतिष्ठान में नौकरी कर सकती थीं, लेकिन उन्होंने मूर्तिकला को ही अपनाया. वह कहती हैं कि जिस काम को करने में संतुष्टि मिले, वही करना चाहिए. जानकार बताते हैं कि कुम्हारटोली में सबसे बुजुर्ग महिला मूर्तिकार चायना पाल हैं.
कुम्हारटोली में इस कला को जीविका के रूप में अपनाने वाली वह पहली महिला हैं. पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने इसे अपनाया. उनसे प्रेरणा लेकर अब कई महिलाएं मूर्तियां बना रही हैं. चायना पाल, मीनाक्षी पाल के अलावा माला पाल, काकुली पाल और कांजी पाल भी मूर्तियां बना कर अपना परिवार चला रही हैं.
काकोली पाल ने भी दो बेटियों की पढ़ाई-लिखाई और घर का खर्च चलाने के लिए रंग और कूची उठाया था. काकोली की दो बेटियां हैं, जिन्हें वह सुबह स्कूल भेजती हैं. उसके बाद घर का काम पूरा करके प्रतिमा गढ़ने में जुट जाती हैं. इस वर्ष मिट्टी का काम तो पूरा हो चुका है. अब प्रतिमाओं को रंगने और सजाने काम चल रहा है. काकोली बताती हैं कि शादी के बाद पति की मौत हो गयी, जिससे बच्चों की पढ़ाई के साथ घर का खर्च चलाना मुश्किल हो रहा था, लिहाजा पति के काम को खुद अपना लिया.
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