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छोटे मंदिरों से ऊंची इमारतों की उड़ान

Updated at : 05 Sep 2019 2:24 AM (IST)
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छोटे मंदिरों से ऊंची इमारतों की उड़ान

कामयाबी : तमलुक गणपतिनगर के दामोदर धाड़ा अपने हुनर से बने उद्यमी छोटी दुकान से बिहार, झारखंड और ओडिशा तक फैला व्यवसाय पत्थरों के मंदिर से लेकर पत्थरों से सजावट के हर सामान बनाते हैं दामोदर हल्दिया : हिंदू समुदाय के लोगों के घरों में प्रवेश द्वार पर ही होता है हरि मंदिर, जिसकी बड़ी […]

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कामयाबी : तमलुक गणपतिनगर के दामोदर धाड़ा अपने हुनर से बने उद्यमी

छोटी दुकान से बिहार, झारखंड और ओडिशा तक फैला व्यवसाय
पत्थरों के मंदिर से लेकर पत्थरों से सजावट के हर सामान बनाते हैं दामोदर
हल्दिया : हिंदू समुदाय के लोगों के घरों में प्रवेश द्वार पर ही होता है हरि मंदिर, जिसकी बड़ी श्रद्धा से वे पूजा करते हैं. पहले लोग खुद से घरों में ही इस हरि मंदिर को तैयार करते थे, क्योंकि बाजारों में ये नहीं मिलते थे, लेकिन 1997 में तमलुक के गणपतिनगर के कारीगर दामोदर धाड़ा ने सबसे पहले हाथों से पत्थरों का एक हरि मंदिर तैयार किया और फिर उसे बाजार में बेचना शुरू किया. आज देखते ही देखते खुद का एक बड़ा संस्थान हो गया है और जहां के बने पत्थरों के सामानों की मांग आज केवल तमलुक जिले तक ही नहीं बल्कि बिहार, झारखंड और ओडिशा तक फैल गया है.
पिताजी से सीखी मूर्तियां बनाने की कला
दामोदर ने बताया कि पिता हरेराम धाड़ा एक कारीगर थे. उनके साथ छोटे समय से ही पत्थर की मूर्ति बनाने का काम सीखे. उसी समय ध्यान में आया कि पत्थर से ही विभिन्न तरह के हरि मंदिर बनाने की सोच आया. पहले 10 पीस पत्थर के हरि मंदिर तैयार किया करता था, जो तमलुक, हल्दिया और महिषादल में ही बेचा करता था. धीरे-धीरे मांग इस कदर बढ़ते गयी कि 25, 50 और फिर सौ पीस तैयार करने के बाद आज खुद के कारखाने खोल दिये. वर्तमान में बंगाल टाइल्स नामक एक संस्थान, जहां हरि मंदिर के साथ ही पत्थरों के हर तरह के सामान तैयार होते हैं, जिसमें स्थायी दो सौ और अस्थायी पांच सौ श्रमिक काम कार्य करते हैं. इधर उनके हाथों से बनाये सामान अब केवल जिले और राज्य तक ही नहीं सीमित हैं, बल्कि अन्य राज्यों तक फैल गये हैं, जिनमें बिहार, झारखंड और ओडिशा तक पत्थरों के मंदिर से लेकर सजावट के हर सामान बनते हैं और सप्लाई होते हैं.
जब कोलकाता के व्यवसायी से हुआ परिचय
इस हरि मंदिर की मांग बढ़ने के साथ ही टाइल्स की भी मांग बढ़ी. फिर उनका कोलकाता के एक व्यवसायी रमेश कुमार मित्तल से परिचय हुआ. वे पत्थर और टाइल्स सप्लाई शुरू किये. इसके बाद हरि मंदिर की मांग के साथ-साथ घर में सजाने के सारे सामानों की मांग भी बढ़ती गयी. इसके बाद वह सारे सामान पत्थरों से बनाना शुरू किये.
आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने से पढ़ नहीं पाये
दामोदर बाबू के परिवार की आर्थिक अवस्था ठीक नहीं होने के कारण अधिक पढ़ाई नहीं कर सके. केवल आठवीं तक पढ़ाई करके संसार चलाने के लिए पिता के साथ काम में लग गये. गरीबी में ही पले. इसलिए वे गरीबों के हित में हमेशा काम करते हैं. बेरोजगार युवक-युवतियों के लिए रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रयास उनका लक्ष्य है.
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