बंगाल में हिंदी को पुनर्जीवित करने का किया काम : राज्यपाल

Updated at : 22 Jul 2019 2:16 AM (IST)
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बंगाल में हिंदी को पुनर्जीवित करने का किया काम : राज्यपाल

कोलकाता : प्रख्यात कवि, चिंतक, विचारक, आलोचक, जाने-माने साहित्यकार, कानूनविद, राजनेता व पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने अपने पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान न केवल पश्चिम बंगाल व राज्य के लोगों के हितों की रक्षा के लिए अभिभा‍वक रूप में कार्य किया, बल्कि उन्होंने हिंदी साहित्य, हिंदी समाज और सामाजिक संस्थाओं को […]

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कोलकाता : प्रख्यात कवि, चिंतक, विचारक, आलोचक, जाने-माने साहित्यकार, कानूनविद, राजनेता व पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी ने अपने पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान न केवल पश्चिम बंगाल व राज्य के लोगों के हितों की रक्षा के लिए अभिभा‍वक रूप में कार्य किया, बल्कि उन्होंने हिंदी साहित्य, हिंदी समाज और सामाजिक संस्थाओं को पुनर्जीवित भी करने का काम किया. हिंदी भाषी समाज और हिंदी साहित्य और संस्कृति को नवजीवन प्रदान किया.

साहित्य की धरती प्रयागराज से आकर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के रूप में कार्यकाल के दौरान उन्होंने बंगाल में अपनी अमिट छाप छोड़ी है. केंद्र सरकार ने उनकी जगह शनिवार को सुप्रीम कोर्ट के प्रख्यात वकील और पूर्व सांसद जगदीप धनखड़ को पश्चिम बंगाल के नये राज्यपाल नियुक्त करने की घोषणा की है. श्री त्रिपाठी का कार्यकाल अगले सप्ताह के अंत में समाप्त हो रहा है.
उनके कोलकाता से जाने के समाचार से बृहत्तर हिंदी समाज बेचैन है और हिंदी जगत रिक्तता महसूस कर रहा है, लेकिन मानवीय संवेदनाओं से भरपूर कवि और साहित्यकार राज्यपाल श्री त्रिपाठी कहते हैं ,कि उन्हें ऐसा नहीं लगता है कि उनके कोलकाता से जाने पर बंगाल के साहित्य जगत में कोई रिक्तता आयेगी, क्योंकि यहां पद्मश्री डॉ कृष्ण बिहारी मिश्र और प्रेमशंकर त्रिपाठी जैसे साहित्यकार हैं, जो हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए सदैव तत्पर हैं.
प्रभात खबर के अजय विद्यार्थी और नम्रता पांडेय ने राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी से साहित्य, समाज, राजनीति जैसे विभिन्न समसामयिक मुद्दों पर बातचीत की. प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश :
सवाल : आपको कविता लिखने की प्रेरणा कहां से मिलती है ?
जवाब : कविता अपने आप निकलती है. कविता एक प्रतिक्रिया है. किसी घटना को देखने, सुनने और महसूस करने के बाद जो तड़पन होती है, उसे एक कवि अपने शब्द देकर कविता का रूप दे देता है और मेरी कविता उन्हीं अनुभवों की अभिव्यक्ति है.
सवाल : आप वर्षों से काव्य रचना कर रहे हैं. पहले और अब की रचनाओं में आप क्या अंतर महसूस करते हैं ?
जवाब : पहले कविताओं में लोग लय और छंद का ध्यान रखते थे. वह कविताएं भाव प्रधान होती थीं. उनमें समाज की कुरीतियों का जिक्र कर उन्हें दूर करने की कामना होती थी. समाज के लिए एक संदेश होता था. शब्दों में माधुर्य होता था. आज की कविताएं समस्या प्रधान हैं. छंदमुक्त कविताओं का प्रचलन बढ़ रहा है. आज की कविताओं में छंद और लय नहीं हैं. कविता का स्वरूप बदल रहा है. फिर से श्रोताओं के द्वारा छंदबद्ध कविताओं की प्रशंसा की जाती रही है.
सवाल : अब अपने गृहनगर प्रयागराज लौट जायेंगे. आप राजनीति में सक्रिय रहते हुए भी साहित्य के प्रति समर्पित रहे थे. भविष्य में साहित्य को लेकर आपकी क्या योजनाएं हैं?
जवाब : कविता के रूप में मैंने वह लिखा है, जो मेरे मन में विचार आया है. जैसे-जैसे विचार आते हैं, वैसे-वैसे शब्दों का संयोजन होते जाता है. लेखनी चलती रहती है, यह या तो कविता बन जाती है या गद्य का रूप ले लेती है. किसी निश्चित विचार को लेकर मैं कविता नहीं लिखता और इसलिए मेरी कविताओं में विविधता है. लय है, गति है. मेरी कविताएं छंदयुक्त और छंदमुक्त भी हैं. मेरी कविताएं मेरी अनु‍भव की अभिव्यक्ति हैं. एक ही घटना को, एक ही दृश्य को कवि अपनी-अपनी दृष्टि से देखता है और उसी एक घटना को अलग-अलग दृष्टिकोण से कविताएं रची जाती हैं.
सवाल : आप लंबे समय से राजनीति में हैं और लगातार साहित्य और काव्य रचना से भी जुड़े रहे हैं. क्या राजनीति का आपकी कविताओं पर प्रभाव पड़ा है?
जवाब : राजनीति कभी-कभी कविता का विषय बन जाती है. राजनीति भी समाज से जुड़ी है. कविता भी समाज से अलग नहीं हो सकती है. समाज के सामने जितने आयाम हैं, राजनीति भी उसका हिस्सा है और कविता भी उससे अलग नहीं है.
सवाल : आप राज्यपाल के रूप में बंगाल के हिंदी समाज के पुरोधा के रूप में उभरे हैं? आपके कोलकाता से जाने की सूचना से बंगाल का हिंदी समाज शून्यता महसूस कर रहा है?
जवाब : आपने, मुझे हिंदी समाज का पुरोधा कहा, हिंदी समाज मेरे जाने के बाद रिक्तता महसूस करेगा. मुझे ऐसा नहीं लगता. बंगाल में अभी भी हिंदी के अच्छे से अच्छे साहित्यकार हैं. पद्मश्री पंडित कृष्ण बिहारी मिश्र, डॉ प्रेमशंकर त्रिपाठी जैसे साहित्यकार हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए तत्पर हैं. मैंने तो हिंदी को बंगाल में पुनर्जीवित करने का, हिंदी संस्थाओं को जाग्रत करने का काम किया है. मुझे प्रसन्नता है कि इस कार्य में मैं पर्याप्त सीमा तक सफल रहा हूं.
सवाल : प्राय: हिंदी भाषा और बांग्ला भाषा में विवाद का मुद्दा उठता रहा है. आपकी इस विषय पर क्या राय है ?
जवाब : हिंदी और बांग्ला में कोई विवाद नहीं है. दोनों के मूल में संस्कृत भाषा है. दोनों ही भाषाएं संस्कृत पर आधारित हैं. कोई विवाद की गुंजाइश नहीं है. व्यावहारिक रूप से किस भाषा का प्रयोग अधिक होता है. कभी इसमें कोई मतभेद था ही नहीं. इनमें व्यावहारिक कठिनाइयां अधिक हैं. कहीं और कभी विरोधाभास नहीं हैं.
सवाल : आपकी पत्नी स्वर्गीय सुधा त्रिपाठी को आपने अपनी प्रेरणा और आलोचक भी कहा है?
जवाब : मेरी स्वर्गीय पत्नी सुधा मेरी कविताओं की प्रथम श्रोता रही हैं. कभी-कभी उन्होंने सुधार के लिए सुझाव भी दिये हैं, लेकिन मेरी कविताएं भावनात्मक हैं. इसलिए स्वाभाविक रूप से मेरी और उनकी भावनाओं में जहां-जहां समानता मिली, उनकी भी अभिव्यक्ति कविताओं में रहीं.
वैसे मैंने स्वतंत्र रूप से कविता लिखी. कुछ कविताएं तो उन्होंने सुनी भी नहीं थीं और प्रकाशित होने के बाद पढ़ीं, लेकिन मेरी रचनाधर्मिता में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है.
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