बंगाल में डॉक्टरों की हड़ताल : बहन ने रोते हुए कहा- मेरे भाई का इलाज नहीं कर सकते तो मार दें, श्मशान ले जाऊंगी

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 14 Jun 2019 7:27 AM

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विकास गुप्ताकोलकाता : राज्यभर में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के बीच तड़पते भाई के लिए एक बहन की कड़ी मेहनत रंग लायी. हुगली से कोलकाता तक तीन अस्पतालों का चक्कर काटने के बाद उसे मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काफी मशक्कत के बाद इलाज नसीब हुआ. हुगली के रवींद्रनगर के कालीतल्ला की रहनेवाली सुमी दे […]

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विकास गुप्ता
कोलकाता :
राज्यभर में जारी जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के बीच तड़पते भाई के लिए एक बहन की कड़ी मेहनत रंग लायी. हुगली से कोलकाता तक तीन अस्पतालों का चक्कर काटने के बाद उसे मेडिकल कॉलेज अस्पताल में काफी मशक्कत के बाद इलाज नसीब हुआ. हुगली के रवींद्रनगर के कालीतल्ला की रहनेवाली सुमी दे (28) ने बताया : मेरा भाई निखिल घोष एक गंभीर बीमारी से ग्रसित है.

सात महीने पहले ही उसे इस बीमारी के बारे में पता चला. तब से उसका उपचार करवा रही हूं. गुरुवार को अचानक भाई की तबीयत बिगड़ गयी. उसे वहां से हुगली के एक स्थानीय अस्पताल में ले गयी, वहां से उसे चुचुड़ा सदर इमामबाड़ा अस्पताल भेज दिया गया. वहां गयी तो वहां से कल्याणी में जवाहर लाल नेहरू मेमोरियल अस्पताल जाने को कहा गया. तीनों अस्पतालों से ठोकर खाकर भाई को साढ़े पांच हजार रुपये खर्च कर कोलकाता के मेडिकल कॉलेज अस्पताल में लायी हूं. चिकित्सकों की हड़ताल के कारण यहां भी डॉक्टर भर्ती लेने से मना कर दिये. अब मेरे पास हिम्मत और रुपये दोनों नहीं हैं, जिससे भाई को प्राइवेट अस्पताल ले जाऊं. मेरे तड़पते भाई का इलाज नहीं कर सकते तो डॉक्टर अपने हाथ से ही उसे मार दे. यहीं से अब उसे श्मशान ले जाऊंगी.

इलाज पर आपस में उलझे जूनियर डॉक्टर
एक बहन की बेबसी व भाई के तड़पते चेहरे को देख कर हड़ताल कर रहे जूनियर डॉक्टरों का मन दो भागों में विभक्त हो गया. एक उसका इलाज करने पर जोर देने लगा तो दूसरा उसे वहां से दूसरे अस्पताल में भेजने की बात कह रहा था. करीब 40 मिनट की मशक्कत के बाद मेडिकल कॉलेज अस्पताल में उसका इलाज शुरू हुआ. सुबह से अस्पतालों का चक्कर काट कर परेशान सुमी दे को भाई का इलाज शुरू होने से राहत मिली.

मरीजों का सहारा बने बड़ाबाजार के अस्पताल

सरकारी अस्पतालों में जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के बीच बड़ाबाजार स्थित चैरिटेबल संस्थाओं द्वारा संचालित मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी, श्री विशुद्धानंद हॉस्पिटल, मातृ मंगल आदि अस्पताल मरीजों का सहारा बने. दुर्घटना सहित गंभीर मामले में सरकारी अस्पतालों में जानेवाले मरीजों ने बड़ाबाजार इलाके स्थित इन अस्पतालों की ओर रुख किया और यहां इलाज के लिए लाये गये. श्री विशुद्धानंद हॉस्पिटल के सहायक प्रबंधक विनय प्रसाद ने बताया कि गुरुवार को उनके अस्पताल की चिकित्सा व्यवस्था सामान्य रही. सामान्य ढंग से ओपीडी में रोगियों की चिकित्सा की गयी. हड़ताल का अस्पताल पर प्रभाव नहीं पड़ा. मारवाड़ी रिलीफ सोसाइटी के कार्यवाहक प्रधान व्यवस्थापक प्रदीप शर्मा ने बताया कि अस्पताल की व्यवस्था सामान्य रूप से संचालित हुईं तथा कामकाज भी सामान्य ढंग से हुआ. मातृ मंगल में भी स्थिति लगभग सामान्य रही. अस्पताल के अधिकारियों का कहना है कि बुधवार को हालांकि ओपीडी व्यवस्था प्रभावित थी, क्योंकि डॉक्टर नहीं पहुंचे थे. लेकिन गुरुवार को सेवाएं सामान्य रहीं. गुरुवार को अस्पताल में कई ऐसे गंभीर रूप से घायल मरीज भी पहुंचे, जो दुर्घटना के शिकार हुए थे.

मेरा क्या कसूर: महिला मरीज की एसएसकेएम में मौत

जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के बीच गुरुवार को बिना इलाज के ही एसएसकेएम में महिला मरीज प्रतिमा मंडल (28) की मौत हो गयी. यूटेरस में बीमारी से पीड़ित प्रतिमा को परिजन पूर्व मेदिनीपुर के तमलुक अस्पताल से कोलकाता के एसएसकेएम अस्पताल लाये थे. तमलुक अस्पताल के डॉक्टरों ने कोलकाता रेफर कर दिया था. प्रतिमा मंडल के देवर प्रशांत मंडल ने बताया कि उनकी भाभी गंभीर रूप से बीमार थी. पहले वे तमलुक स्थित अस्पताल ले गये, लेकिन वहां के डॉक्टरों ने कोलकाता रेफर कर दिया. वे उन्हें मंगलवार को लेकर कोलकाता आये और यहां के एसएसकेएम में भर्ती कर दिया. लेकिन दुर्भाग्यवश मंगलवार से ही जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल शुरू हो गयी. उसके बाद उनकी भाभी का कोई इलाज नहीं हो पाया. गुरुवार को बिना इलाज के ही दोपहर 12.50 बजे उसे दम तोड़ दिया. प्रशांत मंडल ने कहा कि यदि मुख्यमंत्री गुरुवार के बजाय एक दिन पहले अस्पताल आतीं और उनकी भाभी का इलाज शुरू हो जाता, तो शायद उनकी भाभी बच जाती. उन्होंने जूनियर डॉक्टरों द्वारा हड़ताल किये जाने पर भी चिंता जताते हुए कहा कि डॉक्टर तो भगवान होते हैं, लेकिन जब भगवान ही रूठ जायेंगे, तो फिर किसका सहारा बचेगा. उन्होंने डॉक्टरों से अपील की कि वे ड्यूटी ज्वाइन करें और दूसरे मरीजों को बचायें.

सागरदत्ता अस्पताल में नवजात की मौत

उत्तर 24 परगना जिले के कमरहट्टी स्थित सागरदत्ता मेडिकल कॉलेज अस्पताल में गुरुवार की सुबह एक नवजात की मौत हो गयी. नवजात के पिता अभिजीत मल्लिक ने बताया कि 11 जून उन्होंने अपनी पत्नी को अस्पताल में प्रसव के लिए भर्ती कराया था. उसके बाद उसकी पत्नी ने एक बच्ची को जन्म दिया था. नवजात को श्वांस कष्ट की शिकायत हुई. उसे लेकर कई सरकारी अस्पतालों में घूमे, लेकिन चिकित्सा नहीं हो पायी और गुरुवार सुबह नौ बजे उसने दम तोड़ दिया.

मासूम के गले में अटका था सिक्का, इलाज को बिलखता रहा परिवार

डॉक्टरों की हड़ताल के दौरान गुरुवार को महानगर के कई प्रमुख अस्पतालों में इलाज के लिए मरीजों और उनके परिजनों को परेशानियों का सामना करना पड़ा. पार्क सर्कस स्थित कलकत्ता नेशनल मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल (सीएनएमसीएच) में भी कुछ ऐसा ही नजारा दिखा, जहां सुबह से कई मरीजों को बिना चिकित्सा के ही लौटना पड़ा. सिर्फ इमरजेंसी विभाग में मरीजों को भर्ती किया गया. दोपहर तीन बजे के करीब एक परिवार सात साल के बच्चा के साथ पहुंचा. बच्चे के गले में पांच रुपये का सिक्का अटक गया था. जूनियर डॉक्टरों की हड़ताल के कारण पीड़ित बच्चा मइबुल लस्कर और उसके परिवारवालों को काफी परेशान होना पड़ा. पहले तो उस परिवार को गेट पर ही रोक दिया गया. इस दौरान बच्चे के इलाज के लिए परिवार बिलखता रहा. करीब दो घंटे बाद एक्सरे रिपोर्ट दिखाने पर उस परिवार को अंदर जाने दिया गया.

बच्चे के चाचा अलिनुल लस्कर का कहना है कि गेट पर ही दो घंटे तक परेशान रहने के बाद करीब पांच बजे बच्चे को दाखिला लिया गया. इतना देर तक बच्चा परेशान था. बच्चे का पिता हफिजुल लश्कर पेशे से लकड़ी मिस्त्री है. जानकारी के अनुसार जीवनतल्ला निवासी मइबुल अपने घर में गुरुवार को सुबह दस बजे खेल रहा था. परिवारवालों का कहना है कि बच्चा खेलते-खेलते ही अपने मुंह में एक पांच रुपये का सिक्का डाल लिया. वह सिक्का उसके गले में अटक गया. इसके बाद से बच्चा उल्टी करते-करते परेशान हो गया.

घटना के बाद परेशान घरवाले इलाज के लिए दौड़ भाग करने लगे थे. स्थानीय एक चिकित्सा केंद्र से एक्सरे करवाने पर पता चला कि सिक्का बच्चे के गले में फंसा है. फिर बच्चे की दादी बी. लस्कर, चाचा और मामा तुरंत उसे लेकर सीएनएमसीएच पहुंचे. वहां काफी देर तक गेट पर ही रोक कर रखा गया. फिर अंत में दो घंटे बाद उसे भर्ती लिया गया. सात घंटे तक परिवारवालों को परेशानी झेलनी पड़ी. रात आठ बजे बच्चे के गले से सिक्का निकाल दिया गया.

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