कोलकाता : दुर्लभ बीमारियों के मरीजों में 50 प्रतिशत बच्चे
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :18 Feb 2019 9:17 AM (IST)
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बीमार बच्चों के समर्थन में कोलकाता ने लगायी दौड़ 7,000 है ज्ञात दुर्लभ बीमारियों की संख्या भारत में दुर्लभ बीमारियों के 7 करोड़ मरीज हर 20 में से 1 भारतीय मरीज है दुर्लभ बीमारी का शिकार कोलकाता : कोलकाता में आज दुर्लभ बीमारी के मरीजों, जिनमें 50 प्रतिशत बच्चे हैं, के लिए ऑर्गनाइजेशन फॉर रेयर […]
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- बीमार बच्चों के समर्थन में कोलकाता ने लगायी दौड़
- 7,000 है ज्ञात दुर्लभ बीमारियों की संख्या
- भारत में दुर्लभ बीमारियों के 7 करोड़ मरीज
- हर 20 में से 1 भारतीय मरीज है दुर्लभ बीमारी का शिकार
कोलकाता : कोलकाता में आज दुर्लभ बीमारी के मरीजों, जिनमें 50 प्रतिशत बच्चे हैं, के लिए ऑर्गनाइजेशन फॉर रेयर डिजीज इंडिया (ओआरडीआई) की पहल पर ‘रेस फॉर 7’ का आयोजन किया गया. ऊषा उथुप, अनिंद्य चटर्जी और रोमी दत्ता ने इस दौड़ को हरी झंडी दिखाई और दुर्लभ बीमारी के मरीजों के समर्थन में एकत्र हुए और दौड़ लगाने वाले कोलकाता वासियों का साथ दिया. 7000 तरह की दुर्लभ बीमारियों की संख्या को दर्शाने के लिए सांकेतिक रूप से 7000 लोगों ने दौड़ लगायी.
इन बीमारियों का पता चलने में औसतन सात साल का वक्त लग जाता है, इसे सांकेतिक रूप से दर्शाने के लिए प्रतिभागियों ने सात किलोमीटर की दौड़ लगायी. एक अनुमान के मुताबिक हर 20 में से 1 भारतीय किसी ना किसी दुर्लभ बीमारी का शिकार है, लेकिन जागरूकता और जानकारी की कमी के कारण मरीजों और उनके परिजनों के सामने कई चुनौतियां हैं. ओआरडीआई के संस्थापक निदेशक और दुर्लभ बीमारी से ग्रसित एक मरीज के पिता प्रसन्ना शिरोल ने कहा : दुर्लभ बीमारियों के 50 प्रतिशत मरीज बच्चे हैं.
यह सच है कि ज्यादा तर लोग इस बारे में जागरूक नहीं है और दुर्लभ बीमारियों के बारे में जागरूकता फैलाने की आवश्यकता का समर्थन नहीं करते हैं. गायिका ऊषा उथुप ने कहा, “रेस फॉर 7” का हिस्सा बनना मेरे लिए सम्मान की बात है. बेहद जरूरी है कि दुर्लभ बीमारी के मरीजों के सामने रोजाना आने वाली चुनौतियों के बारे में हम जागरूक हों. सबसे पीड़ादायक बात यह है कि दुर्लभ बीमारियों के ज्यादातर मरीज बच्चे होते हैं.
मॉलीक्यूलर जेनेटिक्स में पीएचडी और ओआरडीआई, पश्चिम बंगाल की जेनेटिक काउंसलर व को-ऑर्डिनेटर डॉ. दीपांजना दत्ता ने कहा : यद्यपि इस समय अन्य राज्यों में दुर्लभ बीमारियों के लिए कई अच्छी पहल और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है, लेकिन पश्चिम बंगाल में अब भी जांच की व्यवस्था, जेनेटिक काउंसलिंग, टार्गेटेड मैनेजमेंट आदि की दिशा में काम किए जाने की जरूरत है. यहां तक कि स्थानीय स्तर पर हमें अब स्पेशियलिटी केयर सेंअर बनाने की जरूरत है. इस अवसर पर आईक्यूवीआईए के प्रबंध निदेशक अमित मुकीम ने भी अपने वक्तव्य रखें.
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