कोलकाता : ‘आमरा सोबाई राजा’ की थीम पर उपेक्षित बच्चों का जीवन संवार रहा ‘अंकुर’ विद्यालय
Author Prabhat khabar digital desk
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भारती जैनानी, कोलकाता : आमरा सोबाई राजा, अमादेरी राजार राजत्ते, नोइले मोदेर राजार साथे, मिलबो कि साथे, आमरा सोबाई राजा. रवींद्रनाथ टैगोर की इन्हीं पंक्तियों के भावार्थ को चरितार्थ कर रहा है, दक्षिण कोलकाता में पाटुली घोषपाड़ा स्थित स्कूल ‘अंकुर’. शहर से दूर ग्रामीण इलाके में चल रहा अंकुर स्कूल, ज्ञान का एक ऐसा अनोखा […]
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भारती जैनानी, कोलकाता : आमरा सोबाई राजा, अमादेरी राजार राजत्ते, नोइले मोदेर राजार साथे, मिलबो कि साथे, आमरा सोबाई राजा. रवींद्रनाथ टैगोर की इन्हीं पंक्तियों के भावार्थ को चरितार्थ कर रहा है, दक्षिण कोलकाता में पाटुली घोषपाड़ा स्थित स्कूल ‘अंकुर’.
शहर से दूर ग्रामीण इलाके में चल रहा अंकुर स्कूल, ज्ञान का एक ऐसा अनोखा केन्द्र है, जहां घरों में काम करने वाली महिलाओं, रिक्शा व ऑटो चालकों के बच्चे पढ़ रहे हैं. ये वो बच्चे हैं, जिनका बचपन बिना स्कूल के ही बीत रहा था. इनमें कई बच्चे ऐसे भी हैं जो बाघाजातिन व पाटुली इलाके में रेल लाइन के किनारे बैठे रहते थे.
स्कूल या शिक्षा से दूर-दूर तक इनका कोई सरोकार नहीं था. इन बच्चों को शिक्षित कर उनका जीवन संवारने में जुटी हैं राजश्री हल्दर. स्कूल की संस्थापक राजश्री हल्दर ने बताया कि वह खुद बचपन में अपनी मां को खो चुकी हैं, इस दर्द को वह अच्छी तरह समझती हैं. घरों में काम करने वाली महिलाओं को देखकर वह काफी भावुक हो जाती थीं.
इनमें कई महिलाएं ऐसी हैं, जो अकेले ही घर-संसार चला रही हैं. उनकी व उनके बच्चों की दयनीय स्थिति देखकर ही मन में यह संकल्प आया कि इनको सचमुच शिक्षा की जरूरत है, वरना ये पीढ़ी भी अज्ञान व गरीबी के अंधकार में अपना अस्तित्व खो देगी. इसी संकल्प के साथ 2005 में स्कूल की स्थापना की.
आज इस स्कूल में ऐसे 80 बच्चे निःशुल्क पढ़ रहे हैं. उनके स्कूल का स्लोगन ही है, आमरा सोबाई राजा…. यहां आकर हर बच्चा अपने को राजा समझे, गर्व महसूस करे, यही इस स्कूल का लक्ष्य है. इनकी पढ़ाई, किताबें, कॉपी व खिलाैनों की व्यवस्था स्कूल से ही की जाती है. श्रीमती हल्दर ने बताया कि मोन्टेसरी ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने चिल्ड्रेन एलडोराडो स्कूल में पहले पढ़ाना शुरु किया.
बाद में इन बच्चों को लेकर स्कूल खोला. हालांकि शुरु-शुरू में कई समस्याएं झेलनी पड़ीं लेकिन बाद में कई मित्रों ने इस नेक काम में मदद की. हालांकि अभी इस स्कूल में नर्सरी से कक्षा तीसरी (3-6 साल) तक के बच्चे पढ़ रहे हैं लेकिन इस स्कूल को वह सीबीएसइ अथवा आइसीएसइ बोर्ड के एफिलियेशन के साथ 10वीं तक विस्तारित करना चाहती है.
ये बच्चे अभी इंगलिश के साथ हिंदी, बंगला भी पढ़ रहे हैं. इस नेक काम में उनकी कुछ करीबी मित्र व उनकी बेटी श्रेया काफी सहयोग करती हैं. पढ़ाने वाली शिक्षिकाएं भी पूरे समर्पण के साथ इन बच्चों की देखभाल करती हैं. इस उत्कृष्ट कार्य के लिए उन्हें कई संस्थाओं द्वारा भी सम्मानित किया गया है.
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