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कोलकाता : भाजपा बंगाली विरोधी पार्टी नामक विषय पर हुई परिचर्चा

Updated at : 04 Jan 2019 6:04 AM (IST)
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कोलकाता :  भाजपा बंगाली विरोधी पार्टी नामक विषय पर हुई परिचर्चा

कोलकाता : भाजपा बंगाली विरोधी पार्टी है. यह कहना है राज्य के मंत्री ब्रात्य बसु का. गुरुवार को दमदम पुस्तक मेले में भाजपा एक बंगाली विरोधी दल नामक विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया था.शाम छह बजे इंदिरा मैदान में आयोजित इस परिचर्चा में मंत्री ब्रात्य बसु ने कहा कि बंगाल में भाजपा सिर्फ […]

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कोलकाता : भाजपा बंगाली विरोधी पार्टी है. यह कहना है राज्य के मंत्री ब्रात्य बसु का. गुरुवार को दमदम पुस्तक मेले में भाजपा एक बंगाली विरोधी दल नामक विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया गया था.शाम छह बजे इंदिरा मैदान में आयोजित इस परिचर्चा में मंत्री ब्रात्य बसु ने कहा कि बंगाल में भाजपा सिर्फ बंगाली विरोधी नीति अपनाती है. बंगाल के बंगालियों को देखना नहीं चाहती है. भाजपा केवल बंगाली विरोधी ही नहीं, बल्कि बंगालियों के हित की विरोधी है.
परिचर्चा में सांसद सौगत राय ने कहा कि भाजपा ने कभी भी किसी बंगाली को बड़े पोस्ट पर नहीं रखा है. किसी को ऊंचा पद व स्थान नहीं दिया, केवल श्यामा प्रसाद मुखर्जी के व्यक्तित्व को छोड़कर. परिचर्चा में सांसद ऋतुब्रत बंद्योपाध्याय ने कहा कि स्वाधीनता के बाद से अब तक भारत में बंगालियों का बहुत बड़ा योगदान है.
लेकिन यह पार्टी बंगालियों को आगे बढ़ने से रोकती है. उन्हें आगे जाने का मौका नहीं देती है और भारत के स्वाधीनता संग्राम में बंगालियों के योगदान को भुला कर सिर्फ बंगालियों का दमन करना चाहती है. इस परिचर्चा का आयोजन मानस चट्टोपाध्याय की ओर से किया गया था. परिचर्चा में साहित्यकार जनाब अबुल बशर ने भी अपने विचार रखे.
फूट डालों और राज करो है तृणमूल की नीति: राहुल
कोलकाता : दमदम पुस्तक मेले की परिचर्चा का विषय भाजपा बंगाली विरोधी है पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा के राष्ट्रीय सचिव राहुल सिन्हा ने कहा कि तृणमूल कांग्रेस सत्ता में बने रहने के लिए अंग्रेजों और माकपा की नीति अपना ली है. इनका मकसद है किसी भी प्रकार से सत्ता में बने रहना है. इन लोगों के लिए देश और लोगों की जान की कोई कीमत नहीं है.
इनके लिए कीमती है तो बस सत्ता. जैसे अंग्रेज और माकपाई लोगों के बीच सांप्रदायिकता, जातिवाद और भाषावाद के साथ प्रांतियतावाद की आग लगा कर लोगों को बांटते थे, वही नीति ममता बनर्जी ने भी अपना ली है.
ममता बनर्जी सत्ता के लिए कभी मतुआ तो कभी आदिवासी तो कभी हिंदीभाषी कार्ड खेलती हैं. अगर ऐसा नहीं होता, तो वह बलरामपुर में हिंदीभाषियों को आकर्षित करने के लिए लुभावने वादे नहीं करतीं.
इसके पहले उनका चरित्र मुसलमानों के तुष्टीकरण के मामले में इस प्रदेश और देश की जनता देख चुकी हैं और तो और किसी राजनीतिक पार्टी को उसके कार्यक्रम करने से रोककर यह सरकार खुद को लोकतांत्रिक सरकार होने का दंभ भरती हैं. लिहाजा लोगों को इनसे सावधान रहने की जरूरत है और इनके बहकावे में आने से बचना चाहिए.
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