बचपन के शौक ने दिया हुनर को जन्म, मिट्टी के खिलौने बनाते-बनाते बन गया मूर्तिकार

Updated at : 27 Sep 2018 2:27 AM (IST)
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बचपन के शौक ने दिया हुनर को जन्म, मिट्टी के खिलौने बनाते-बनाते बन गया मूर्तिकार

कोलकाता : कहा जाता है कि छोटा बच्चा छोटे पौधे समान होता है. छोटे पौधे को जिधर मोड़ना चाहों, वह उसी दिशा में आगे बढ़ता है. ठीक इसी तरह बच्चे का बचपन होता है. एक बच्चे का मिट्टी से खिलौने बनाने के शौक ने उसमें हुनर को जन्म दिया. फिर क्या, देखते ही देखते सातवीं […]

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कोलकाता : कहा जाता है कि छोटा बच्चा छोटे पौधे समान होता है. छोटे पौधे को जिधर मोड़ना चाहों, वह उसी दिशा में आगे बढ़ता है. ठीक इसी तरह बच्चे का बचपन होता है. एक बच्चे का मिट्टी से खिलौने बनाने के शौक ने उसमें हुनर को जन्म दिया. फिर क्या, देखते ही देखते सातवीं कक्षा में पहुंचते ही बच्चे ने मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा बना डाली.
यह कोई और नहीं बल्कि दमदम के नागेरबाजार निवासी तनय नाग है. उसके इस हुनर को देखकर उसके घर में ही मां दुर्गा की पूजा आरंभ हुई. तब से लगातार यह दुर्गापूजा होते चली आ रही हैं. यह 10वीं साल पूजा का आयोजन हो रहा है.
पहली बार जब बनायी भव्य मूर्ति
तनय नाग सिटी कॉलेज में कैमिस्ट्री (आनर्स) प्रथम वर्ष का छात्र है. पिछले दस साल से अपने घर की पूजा के लिए खुद ही मां दुर्गा की प्रतिमा बनाते आ रहा है. पहली बार 2008 में उसने पहली साढ़े तीन फीट की मूर्ति बनायी. तब वह सातवीं कक्षा में था. तब से घर में दुर्गापूजा शुरू हो गयी. उसका सपना है कि वह शौक से मूर्ति बनाये लेकिन भविष्य में वह प्रोफेसर बनना चाहता है.
घरवाले करते हैं सारी मदद
तनय के उत्साह व हुनर को देख हर साल उसकी नानी शांतिरानी दास, दादी आर.नाग, पिता तरुण नाग, मां सोमा नाग समेत पूरा परिवार सक्रिय रूप से उसके इस पूजा में सहयोग करता हैं. पिता तरुण नाग ने बताया कि हर साल दुर्गापूजा आने से कुछ माह पहले से ही तनय पढ़ाई के साथ-साथ सप्ताह में दो दिन दुर्गा प्रतिमा बनाने के लिए समय निकालता है. सारे सामान कुम्हार टोली से लाकर दिये जाते हैं. इस साल साढ़े छह फूट की मूर्ति तैयार कर रहा है, जिसका अभी अंतिम रूप देना बाकी है.
दोस्ती का असर, शुभ्रज्योति भी बन गया मूर्तिकार
संगत से गुण होत है संगत से गुण जात. तनय के घर से कुछेक किलोमीटर दूर स्थित दमदम कैन्टोंमेंट में उसके दोस्त शुभ्रज्योति दास पर तनय की दोस्ती का असर पड़ा. बचपन से शुभ्रज्योति का तनय के साथ गहरा दोस्ती रहा है और तनय के इस हुनर को देख धीरे-धीरे शुभ्रज्योति भी भव्य मूर्तियां बनाने लगा लेकिन पेशे के लिए नहीं बल्कि शौक से और ऐसा समय आया कि 2013 में कक्षा आठवीं में ही वह भी पहला तीन फुट की मां दुर्गा की भव्य मूर्ति बना डाला और फिर उसके घर में भी दुर्गापूजा शुरू हो गयी.
उसके पिता शशांक दास ने बताया कि दुर्गापूजा में पूरा घर ही पूजा मंडप की तरह सज जाता है. चार-पांच माह पहले से ही वह मूर्ति बनाने का काम शुरू कर देता है. इस साल हर सप्ताह हल्दिया से यहां हर सप्ताह दो दिन के लिए आकर धीरे-धीरे करके साढ़े छह फीट की मूर्ति बनाने के अंतिम चरण में है. बचपन में वह कागज से प्रतिमा बनाया करता था. अब मिट्टी से भव्य प्रतिमा बनाने लगा. इस पूरे पूजा में पिता शशांक दास, मां डालिया दास समेत पूरे परिवार का सक्रिय सहयोग रहता है.
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