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तिलपाड़ा बैराज को पहुंची है क्षति, 30 हजार हेक्टेयर में फसलों पर मंडरा रहा संकट

Updated at : 13 Aug 2025 12:58 AM (IST)
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तिलपाड़ा बैराज को पहुंची है क्षति, 30 हजार हेक्टेयर में फसलों पर मंडरा रहा संकट

मयूराक्षी नदी पर मौजूद तिलपाड़ा बैराज 1974 में निर्मित हुआ था.

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मरम्मत कार्य युद्धस्तर पर, वाहनों का आवागमन प्रभावित बीरभूम. जिले के सिउड़ी के मयूराक्षी नदी पर मौजूद तिलपाड़ा बैराज के टूटने के कारण इस बैराज के पानी से सिंचाई होने वाले करीब तीस हजार हेक्टेयर खेतिहर भूमि पर फसलों के नुकसान की आशंका बढ़ती जा रही है. तिलपाड़ा बैराज का वाटर डिवाइडर टूटने के कारण ही यह समस्या उत्पन्न हुई है. हालांकि सिंचाई विभाग द्वारा युद्ध स्तर पर मरम्मत कार्य शुरू किया गया है, लेकिन सिंचाई का पानी समय पर नहीं मिलने से फसलों के नुकसान की आशंका भी बढ़ती जा रही है. मयूराक्षी नदी पर मौजूद तिलपाड़ा बैराज 1974 में निर्मित हुआ था. इसके निर्माण का मुख्य उद्देश्य था इस क्षेत्र के करीब तीस हजार हेक्टेयर खेती की भूमि को उपयुक्त सिंचाई का पानी इस बैराज से मिल सके.

बैराज का इतिहास और महत्व

तिलपाड़ा बैराज के क्षतिग्रस्त होने के कारण फिलहाल मरम्मत कार्य आरंभ किया गया है. केंद्रीय जल आयोग के तीन प्रतिनिधियों ने तिलपाड़ा बैराज का मुआयना कर स्थिति का जायजा लिया है. तीनों अधिकारियों के साथ ही बैराज विशेषज्ञ जुल्फिकार अहमद के नेतृत्व में मरम्मत कार्य चल रहा है. राज्य सिंचाई कार्यालय के मुख्य अभियंता देवाशीष सेन गुप्ता का कहना है कि केंद्रीय जल आयोग से तीन अधिकारी, इंजीनियर आये हैं. वहीं बैराज विशेषज्ञ भी मौजूद हैं. काम युद्ध स्तर पर शुरू हो गया है. इस काम की गति बढ़ जाएगी. मालूम हो कि वर्ष 1951 में तिलपाड़ा बैराज का निर्माण बीरभूम के सिउड़ी के मयूरक्षी नदी पर सिंचाई के काम के लिए किया गया था. उस समय इसके निर्माण की लागत 1 करोड़ 10 लाख से कम थी. बाद में पुल का निर्माण जलाशय पर यातायात के लिए किया गया. यह पुल राष्ट्रीय सड़क 14 पर है. मूल रूप से उत्तर बंगाल के साथ दक्षिण बंगाल के मध्य आवागमन का मुख्य साधन यह सेतु बना. इसकी लंबाई 309 मीटर है, 19 मीटर की चौड़ाई और जलाशय की गहराई लगभग 63 मीटर है. तिलपाड़ा जलाशय से पानी छोड़ने के लिए कुल 15 गेट हैं, वर्तमान में 10 गेट के जल विभक्त में बड़ी दरारें आयीं हैं. इसके अलावा जलाशय से दो नहरें करीब 40 किमी तक लंबी सिंचाई नहरें हैं. इस बैराज से जिले में कम से कम तीस हजार हेक्टेयर भूमि की खेती इस जलाशय पर निर्भर करती है. धान, मौसमी सब्जियां, दाल, सरसों आदि सिंचाई नहर पर निर्भर हैं. इसी दो नहरों से उप-सिंचाई नहरें भी बनी हैं.

मरम्मत कार्य और चुनौतियां

यदि जलाशय को जल्दी से सुधार नहीं किया जाता है, तो दूसरी ओर कृषि पर भारी प्रभाव पड़ेगा. जल विभक्त का भी गिरावट पर प्रभाव पड़ा है. इस पुल के माध्यम से हजारों वाहनों का आवागमन होता है जो कि बिल्कुल बंद है. फिलहाल वाहनों को सिउड़ी-सैंथिया के माध्यम से भेजा जा रहा है. परिणामस्वरूप परिवहन लागत बढ़ रही है. गौरतलब है कि इसके पूर्व यह बैराज 1978 और 2000 की बाढ़ में क्षतिग्रस्त हुआ था. स्थानीय लोगों ने शिकायत की थी कि बैराज और सेतु का पिछले 25 वर्षों में कोई मरम्मत कार्य नहीं हुआ है, जिसके कारण इस वर्ष यह स्थिति उत्पन्न हुई. जलाशय के नीचे बहुत सारी रेत जमी हुई है. इसकी पानी रखने की क्षमता भी घटी है. वहीं अवैध बालू खनन के कारण नदी का मार्ग और दिशा भी बदला है. जलाधार में बालू के जमने और उसके निवारण हेतु 30 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, हालांकि यह पैसा क्या हुआ, कोई भी जनता. जलाशय के मरम्मत कार्य हेतु विशेषज्ञ जुल्फिकार अहमद ने सिंचाई कार्यालय के अधिकारियों को कई टिप्स दिये हैं. 3-सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल, जिसमें शिव कुमार शर्मा, केंद्रीय जल आयोग और राघवेंद्र तिलपाड़ा बैराज की स्थिति का जायजा ले रहे हैं. उनके साथ राज्य सिंचाई कार्यालय के मुख्य अभियंता देवाशीष सेन गुप्ता भी स्थिति की जांच कर रहे हैं. वाटर डिवाइडर की मरम्मत का काम बोल्डर द्वारा शुरू किया जा रहा है. इधर विशेषज्ञों का मानना है कि तिलपाड़ा सेतु पर हैवी वाहनों के आवागमन पर भी कुछ हद तक नियंत्रण रखने की जरूरत है ताकि इस सेतु का भविष्य बना रहे.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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GANESH MAHTO

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By GANESH MAHTO

GANESH MAHTO is a contributor at Prabhat Khabar.

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