कम हुई पतंगबाजी, थम गया ''वो काटा'' का शोर

Updated at : 15 Jan 2020 1:18 AM (IST)
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कम हुई पतंगबाजी, थम गया ''वो काटा'' का शोर

न पहले जैसे पतंगबाज, न रहा पतंगबाजी का शौक फोन पर गेम, वाट्सएप, फेसबुक आदि पर लोग रहते हैं व्यस्त दुर्गापुर : शिल्पांचल व इसके आसपास के इलाके मे मकर संक्रांति हो, 26 जनवरी या फिर 15 अगस्त. यहां के लोगों पर पतंगबाजी का खुमार रहता था. एक तरफ से लंबे कन्नों से बंधी तिरंगा, […]

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न पहले जैसे पतंगबाज, न रहा पतंगबाजी का शौक

फोन पर गेम, वाट्सएप, फेसबुक आदि पर लोग रहते हैं व्यस्त

दुर्गापुर : शिल्पांचल व इसके आसपास के इलाके मे मकर संक्रांति हो, 26 जनवरी या फिर 15 अगस्त. यहां के लोगों पर पतंगबाजी का खुमार रहता था. एक तरफ से लंबे कन्नों से बंधी तिरंगा, चांद-तारा जैसी तरह तरह की पतंगे आसमान से बातें किया करती थीं. सामने वाले की पतंग काटना और बाजू वाले की पतंग कटकर अपनी छत पर आ जाना बच्चों को खूब मनोरंजित करता था.

यह एक ऐसा खेल हुआ करता था जिसका खुमार हर उम्र पर चढ़ा रहा करता था. लेकिन बदलते समय के संग बच्चे हो या बड़े सबकी उंगलिया मोबाइल के टच पर चल रही है. हाईटेक हुए युग में अब पतंगबाजी का शौक लगातार कम होता जा रहा है.जबकि कुछ समय पूर्व बच्चों में पतंग उड़ाने का काफी शौक था,छतों पर बच्चे न दोपहर देखते न सुबह.

बच्चे जमकर पतंगबाजी का लुफ्त उठाते थे. यदि किसी की पतंग कट जाती तो उसे पकड़ने के लिए हर कोशिश की जाती है. मोहल्लों के बच्चों में रंग बिरंगी पतंगों को इकट्ठा करने की होड़ रहती थी. खास कर मकर संक्रांति मे पतंगबाजी का लोगों में क्रेज रहता था, जिसे लेकर मकर संक्रांति के सप्ताह भर पहले से ही शहर के बेनाचिती सहित विभिन्न बाजारों में नई नई किस्मों की पतंग बिकनी शुरू हो जाती थी.

लेकिन अब यह सब बातें भूली बिसरी सी लगती थी, क्योंकि बदलते समय के संग अब न तो बच्चों में पतंगबाजी का क्रेज रहा न बड़ों में. आज बच्चों में मोबाइल फोन में गेम व सोशल मीडिया में व्यस्त रहते हैं. जब बच्चों की रूचि कम हो गई तो बड़े लोग अब अपने कामों में व्यस्त हो गये. अब न तो पतंगों के मैच होते हैं और न ही आसमान में पतंगों का झुंड दिखाई देता हैं.

लगातार कम हो रहे क्रेज की वजह से शहर में दुकानें भी कम हो गई हैं. शहर के लोग बताते हैं कि पतंग की बात छिड़ती है तो बचपन याद आ जाता है. इस छत से उस छत पूरी दोपहरी गुजर जाती थी पतंग उड़ाने के लिए ठिकाने ढूंढते थे. छुट्टी का दिन हुआ तो पहुंच जाते थे. अब तो गिनती की पतंगें उड़ती हैं, वे भी मकर संक्रांति के दिन.

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