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गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल का हुआ शुभारंभ, केरल के राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्‍मद खान ने कही ये बड़ी बात

Updated at : 07 Jan 2023 9:03 PM (IST)
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गोरखपुर लिटरेरी फेस्टिवल का हुआ शुभारंभ, केरल के राज्यपाल डॉ. आरिफ मोहम्‍मद खान ने कही ये बड़ी बात

Gorakhpur News: गोरखपुर के विवेक होटल के उत्‍सव लॉन में शनिवार को आयोजित दो दिवसीय दिवसीय लिटरेरी फेस्टिवल का शुभारंभ हुआ. साहित्‍य, रंगकर्म, मीडिया, संस्‍कृति और फिल्‍म जगत की हस्तियों से लोग दो दिनों तक रूबरू होकर उनके विचार सुनेंगे.

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Gorakhpur News: गोरखपुर के विवेक होटल के उत्‍सव लॉन में शनिवार को आयोजित दो दिवसीय दिवसीय लिटरेरी फेस्टिवल का शुभारंभ हुआ. साहित्‍य, रंगकर्म, मीडिया, संस्‍कृति और फिल्‍म जगत की हस्तियों से लोग दो दिनों तक रूबरू होकर उनके विचार सुनेंगे. मुख्‍य अतिथि केरल के राज्‍यपाल आरिफ मोहम्‍मद खान, मुख्‍य वक्‍ता के रूप में प्रख्‍यात साहित्‍यकार मृदुला गर्ग, विशिष्‍ट अतिथि के रूप में वरिष्‍ठ पत्रकार अजय कुमार सिंह और कार्यक्रम की अध्‍यक्षता कर रहे साहित्‍य अकादमी के पूर्व अध्‍यक्ष प्रो. विश्‍वनाथ प्रसाद तिवारी ने कार्यक्रम का शुभारंभ किया.

केरल के राज्‍यपाल डॉ. आरिफ मोहम्‍मद खान ने कहा कि हमारे यहां इस संसार की तुलना एक विषवृक्ष से की गई है. इस संसार से विष उत्पन्न होता है, लेकिन इसमें दो अमृत से भरे हुए फल लगते हैं. इनमें से पहला है काव्य और दूसरे हैं सत्पुरुष. काव्य हमें रस देता है और सत्पुरुष हमें मार्गदर्शन देते हैं. जो लोग सार्वजनिक जीवन में होते हैं, उनकी व्यस्तता इतनी ज्यादा होती है कि उनको किताबें पढ़ने का समय नहीं मिल पाता है.

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एक दार्शनिक ने कहा कि जो लोग किताबें नहीं पढ़ते हैं उन्हें इसका अधिकार ही नहीं है कि वह सार्वजनिक जीवन के अंदर आएं.  उन्होंने कहा कि मनुष्य एक अकेला जीव नहीं है. लेकिन बाकी जीवों और इंसान में फर्क क्या है. इसका अर्थ सदैव बदलता रहता है. इतिहास का बोध रखने वाले ही साहित्य पैदा कर सकते हैं. वास्तविक लोकतंत्र में साहित्य का मूल मंत्र यही है कि इतिहास से सबक लेकर वर्तमान तक खड़ा होने का हुनर आ जाए. संवेदनशीलता मनुष्य को औरों से अलग करती है. संवेदनशीलता ही साहित्य की जननी है.

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मुख्‍य अतिथि के रूप में उपस्थित केरल के राज्‍यपाल ने कहा कि पहले यह माना जाता था कि जो सत्ता के खिलाफ लिखेगा, वही विश्वसनीय है. लेकिन अब हमें यह फर्क करना पड़ेगा कि यह धारणा उस समय की बात है, जब सत्ता राजा रानी की कोख से पैदा होती थी. उस समय सत्ताधारी आज की तरह लोकतंत्र से पैदा नहीं होता था. भारत में भले ही राजशाहियों का अस्तित्व रहा हो. पर यहां आध्यात्मिक लोकतंत्र शाश्वत बना रहा है. इस कारण से इसे विश्व में लोकतंत्र की मां का दर्जा हासिल है. मानव समाज में जितनी भी शासन व्यवस्थाएं विकसित की गईं हैं, उसमें लोकतंत्र से बेहतर व्यवस्था कोई नहीं है. 

पूर्व अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कही ये बड़ी बात

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ साहित्यकार व साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष प्रो. विश्वनाथ प्रसाद तिवारी ने कहा कि राजनीतिक विचारकों का यह मत रहा है कि वही व्यवस्था सर्वोत्तम है, जिसमें सबसे कम शासन किया जाय. इस अर्थ में लोकतंत्र विशिष्ट है. राज्य स्वयं में मनुष्य के असभ्य होने का प्रमाण है और सभी मनुष्य सभ्य हो जाएं, तो राज्य और क़ानून की आवश्यकता ही नहीं. महात्मा गांधी ने कहा था नीति का पालन और इंद्रियों को वश में करना ही सभ्यता है.

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हम स्वतन्त्रता के प्रश्न पर अधिकारों की बात तो करते हैं. पर कर्तव्यों की बात नहीं करते. स्वाधीनता में कर्तव्य की भावना समाहित है. शासन व्यवस्था के साहित्य पर पड़ने वाले प्रभाव के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि तानाशाही शासन में अगर साहित्य की दुर्गति के प्रमाण देखना हो तो कम्युनिस्ट शासन से बेहतर उदाहरण और कोई नहीं हो सकता. संबोधन के अंत में उन्होंने कहा कि लोकतंत्र ऑफ द पीपल बाय द पीपल फ़ॉर द पीपल है. 1789 की फ्रेंच क्रांति के बाद जिस लोकतंत्र की कल्पना की गई थी, वह लोक के महत्व तथा अभिव्यक्ति की आजादी की है. यह राज की कल्पना में नहीं है बल्कि लोक अर्थात जनता की कल्पना में है.

साहित्यकार मृदुला गर्ग ने क्या कहा

कार्यक्रम में बतौर मुख्‍य वक्ता साहित्यकार मृदुला गर्ग ने कहा कि हमारी संस्कृति उन खूबसूरत संस्कृतियों में से है, जो सर्व समाहित है. चूंकि हमें धुंधला देखने की आदत है इस कारण से हम रौशनी से घबराते हैं. हमें समझना होगा कि चुनौती को स्वीकार करने के बाद ही चमक आती है. लोकतन्त्र में साहित्य की महत्ता पर बोलते हुए. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र स्वतन्त्र विचार की निर्भीक अभिव्यक्ति है और साहित्य भी वस्तुतः उसी चरित्र का है. लेखक के कथनी नहीं बल्कि उसके पात्रों की करनी का महत्व होता है. 

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प्रख्यात पत्रकार व राष्ट्रपति के प्रेस सचिव अजय कुमार सिंह ने इस अवसर पर कहा कि लोकतंत्र के अस्तित्व की कल्पना साहित्य के बिना अधूरी है. साहित्यिक रचनाएं कालजयी होतीं हैं और भविष्य हमेशा भूत से अच्छा होता है. साहित्य में स्थानीयता के साथ सार्वभौमिकता, दोनों के ही तत्व शामिल होते हैं. आज गीता प्रेस ने साहित्य को व्यापारिक लोकप्रियता दी है.

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प्रेमचंद्र के पात्र वैश्विक स्तर के पात्र बन जाते हैं. लेखक के पात्रों की सार्वभौमिकता कहीं भी पाई जा सकती है. अंचल का साहित्य इस मामले में विशेष है कि वह यहां से निकलकर देश ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनी छाप छोड़ता है. किसी गांव या नगर से निकले हुए लेखक या कवि किस प्रकार वैश्विक स्तर पर अनुकरणीय होते चले जाते हैं. उसका महत्वपूर्ण उदाहरण गोरखपुर है. साहित्य के सौंदर्य का अनुभव करने के लिए भाषा कोई बाध्यता नहीं है, बल्कि भाव महत्वपूर्ण है.

ये लोग रहे मौजूद

साहित्य का लोकतंत्र सही अर्थों में समावेशी है, जो अंत्योदय तथा वसुधैव कुटुंबकम की भावना को बल देता है. उद्घाटन सत्र में सभी आगंतुकों के प्रति आभार ज्ञापन आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. हर्षवर्धन राय ने किया. सत्र का संचालन डॉ. श्रीभगवान सिंह ने किया. अतिथियों का स्वागत करते हुए कार्यक्रम के संयोजक के अचिंत्य लाहिड़ी ने किया. कार्यक्रम के आयोजन सचिव डॉ. संजय कुमार श्रीवास्तव ने कार्यक्रम की भूमिका रखी.

रिपोर्ट – कुमार प्रदीप ,गोरखपुर

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