सिख समुदाय ने सबसे पहले किया था रावण दहन

गुमला: शांति, सद्भाव व सर्वधर्म के बीच गुमला में रावण दहन की 58 वर्ष पुरानी अद्भुत परंपरा रही है. रंग-बिरंगी गगनचुंबी आतिशबाजी के बीच असत्य पर सत्य की अनूठी झलक पेश की जाती है. इसको देखने के लिए गुमला जिले के शहर समेत सुदूरवर्ती क्षेत्रों के हजारों की संख्या में लोगों का जनसैलाब उमड़ता है. […]
परमवीर अलबर्ट एक्का स्टेडियम में 50 फीट ऊंचे रावण का दहन शाम साढ़े छह बजे किया जायेगा. प्रबुद्ध लोग बताते है कि बाजारटांड़ निवासी स्व भाल सिंह व पंजाबी बंधुओं के प्रयास से रावण व कुंभकरण के पुतला दहन की नींव रखी गयी. उस समय एक लकड़ी के ठेले में रावण का पुतला रख कर शहर का भ्रमण कराया जाता था. प्रत्येक व्यवसायी समिति को 25 पैसे की सहयोग राशि देते थे. 40 से 50 रुपये में धूमधाम से रावण दहन किया जाता था.
इसके बाद बैद्यनाथ साहू, वीरेंद्र झा व अन्य लोगों ने रावण दहन की कमान संभाली. बाजारटांड़ की जमीन का अतिक्रमण हो गया. इसके बाद दो जगहों पर रावण दहन होने लगा. महावीर चौक स्थित पुराना बस पड़ाव (वर्तमान में पटेल चौक) के समीप रावण दहन किया जाने लगा. इसके बाद सर्वसम्मति से कचहरी परिसर में एक ही जगह पर रावण दहन की परंपरा शुरू हुई. 1984 में तत्कालीन डीसी द्वारिका प्रसाद सिन्हा ने स्टेडियम में रावण दहन की अनुमति दी. तब से निरंतर रावण दहन की परंपरा कायम है.
चैनपुर प्रखंड में मंदिर परिसर के समीप रावण दहन रात 7.30 बजे होता है. मेला जैसा माहौल रहता है.10 हजार लोगों की भीड़ उमड़ती है. डुमरी प्रखंड के लोग यहां रावण दहन देखने आते है.
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