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Seraikela Kharsawan : धान खरीद में लक्ष्य से पिछड़ा सरायकेला-खरसावां

Updated at : 14 May 2025 11:11 PM (IST)
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Seraikela Kharsawan : धान खरीद में लक्ष्य से पिछड़ा सरायकेला-खरसावां

धान खरीद में लक्ष्य से पिछड़ा सरायकेला-खरसावां

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खरसावां. सरायकेला-खरसावां जिला में खरीफ विपणन मौसम 2024-25 के लिए निर्धारित लक्ष्य का केवल 43.14 प्रतिशत धान ही खरीदा जा सका है. पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो एक बार भी लक्ष्य के अनुरूप धान की खरीद नहीं हो सकी है. शुरुआत में जिले को तीन लाख क्विंटल धान खरीदने का लक्ष्य दिया गया था, जिसे बाद में घटाकर 1.95 लाख क्विंटल कर दिया गया. हालांकि, संशोधित लक्ष्य को भी पूरा नहीं किया जा सका है. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, अब तक केवल 81,133.3 क्विंटल धान की ही खरीद हो पायी है. 4321 निबंधित किसानों में से सिर्फ 1443 ने लैंपस में धान बेची खरीफ विपणन मौसम 2024-25 के तहत जिले में धान की खरीद 15 दिसंबर से शुरू हुई थी, जो 30 अप्रैल 2025 तक जारी रही. इस अवधि में जिले की 18 लैंपस समितियों के माध्यम से सरकारी स्तर पर धान खरीदी गयी. सरायकेला-खरसावां जिले में कुल 4321 पंजीकृत किसान हैं, जिन्हें धान बिक्री के लिए एसएमएस भेजा गया था. हालांकि, इनमें से केवल 1443 किसानों ने ही लैंपस जाकर धान बेची. धान बेचने वाले किसानों में से 1319 को पहली किस्त का और 899 किसानों को दोनों किस्तों का भुगतान किया जा चुका है. तिरुलडीह में सर्वाधिक, दलभंगा में सबसे कम धान की खरीद: किसानों को बिचौलियों से बचाने और उनकी उपज का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) सुनिश्चित करने के उद्देश्य से सरकार द्वारा लैंपस समितियों के माध्यम से धान की खरीद की गयी थी. हालांकि, अब भी सरकारी स्तर पर निर्धारित लक्ष्य से खरीद काफी पीछे है. जिले में सबसे अधिक धान की खरीद तिरुलडीह लैंपस में हुई है. जबकि सबसे कम दलभंगा लैंपस में केवल 9 किसान व मुरुम लैंपस में 18 किसानों ने ही धान की बिक्री की है.

भुगतान में देरी होने से किसान लैंपस से मुंह मोड़ रहे

किसानों के अनुसार, जिले में किसानों से निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप धान की खरीद न हो पाने के पीछे कई कारण हैं. प्रमुख कारणों में से एक है धान बिक्री के बाद भुगतान में होने वाली देरी, जिसके चलते किसान लैंपस समितियों से मुंह मोड़ रहे हैं. लैंपस के माध्यम से धान बेचने पर किसानों को भुगतान की प्रक्रिया धीमी रहती है. आमतौर पर धान के मूल्य का आधा हिस्सा एक-दो सप्ताह में मिलता है, जबकि शेष राशि के भुगतान में काफी समय लग जाता है. इसके अतिरिक्त, लैंपस केंद्रों में धान की गुणवत्ता (विशेषकर नमी) के आधार पर 5 से 7 प्रतिशत तक कटौती की जाती है. साथ ही, खेतों से लैंपस तक धान पहुंचाने में होने वाला परिवहन खर्च भी किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालता है. वहीं दूसरी ओर, बाहरी व्यापारी धान खरीदते समय तत्काल नकद भुगतान करते हैं, जिससे किसानों को अगली फसल के लिए आर्थिक संकट का सामना नहीं करना पड़ता है. हालांकि, व्यापारी किसानों को सरकार द्वारा तय न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम कीमत पर ही धान खरीदते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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ATUL PATHAK

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By ATUL PATHAK

ATUL PATHAK is a contributor at Prabhat Khabar.

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