Saraikela: मोती की खेती कर लाखों कमा रहे हैं सुभाष महतो, बन गई है अलग पहचान

Updated at : 22 Mar 2026 5:25 PM (IST)
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Pearl Farming

मोती उत्पादन करने वाले किसान सुभाष महतो

Saraikela: सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया के निवासी सुभाष महतो इंटरनेट के सहायता से मोती उत्पादन कर के अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. सुभाष महतो अपने छोटे से डोभा में करीब 20 हजार मोतियों का उत्पादन कर रहे हैं. इसमें करीब पांच लाख की लागत आयी है, जिससे करीब 45-50 लाख की मुनाफे की उम्मीद है.

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शचिंद्र कुमार दाश
Saraikela: सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया के निवासी सुभाष महतो मोती की खेती कर अपनी अलग पहचान बना रहे हैं. चामारू पंचायत के रंगामटिया गांव के सुभाष महतो द्वारा उत्पादित मोती की मांग कोलकाता से लेकर हैदराबाद के बाजारों तक है. उन्होंने अपने छोटे से डोभा में करीब 20 हजार सीप डाले हैं. अगले कुछ माह में सीप के भीतर मोती तैयार हो जाएगा. इसमें करीब पांच लाख की लागत आयी है, जिससे करीब 40-45 लाख की मुनाफे की उम्मीद है. सुभाष महतो के मोती की खेती से जुड़ने का किस्सा भी काफी रोचक है. करीब नौ साल पहले मोबाईल पर वीडियो देखने के दौरान उनकी नजर मोती की खेती पर पड़ी. तभी युट्यूब पर मोती की खेती के अलग-अलग वीडियो देख सुभाष महतो के मन में भी मोती की खेती करने की इच्छा हुई. सुभाष बताते हैं कि इंटरनेट के माध्यम से उन्हें सीप मोती उत्पादन किये जाने की जानकारी मिली. इसके बाद इंटरनेट के माध्यम से उन्होंने मोती उत्पादन की ट्रेनिंग की. उसी साल उन्होंने कोलकाता के पास स्थित मेचोदा नामक जगह पर मोती की खेती पर 15 दिनों की ऑफलाइन ट्रेनिंग ली और अगले ही साल मोती की खेती शुरू कर दी.

12 से 14 माह में तैयार हो जाता है मोती

सुभाष महतो ने बताया कि वर्ष 2017 में उन्होंने पहली बार मोती की खेती शुरू की. उस वक्त करीब 1.30 लाख रुपये खर्च कर सुभाष ने आठ हजार सीप मोती का उत्पादन किया था. मोती की खेती में मिली सफलता से लवरेज सुभाष ने मोती की खेती के दायरों को बढ़ाया. इस साल तालाब में 20 हजार सीप छोड़ कर मोती की खेती कर रहे है. उन्होंने बताया कि मोती तैयार होने में 12 से 14 माह का समय लगता है. जिला मत्स्य विभाग भी मोती की खेती को बढ़ावा देने के लिये सुभाष महतो को तकनीकी सहयोग कर रही है.

कोलकाता से लाते हैं सीप और अन्य सामग्री

मोती सामान्यत समुद्र में रहने वाले घोंघा प्रजाति के एक छोटे से प्राणी सीप (झिनुक) के पेट में बनते हैं. मोती उत्पादन के लिए सीप (झिनुक) समेत आवश्यक कच्चा पाउडर व अन्य सामग्री कोलकाता से ही लाते हैं. सुभाष महतो ने बताया कि कोलकाता से सीप लाने के बाद उसे एक सप्ताह तक डोभा में पानी सूट करने के लिए छोड़ते है. इसके बाद उसे बाहर निकालकर सर्जरी कर मोती के बीज को सीप में डाला जाता है. सीप से गोल आकार की मोती के साथ-साथ गणेश जी, शंकर जी, मां दुर्गा के सेप में मोती उत्पादित करते हैं. इसके लिए कच्चा पाउडर को लॉकेट रूप देकर सांचा से मोती का बीज तैयार कर मोती बनने के लिए सीप में डाला जाता है. उसके बाद कुछ दिन तक एंटी बायोटिक पानी में रखा जाता है, फिर उसे डोभा के पानी में छोड़ दिया जाता है. ऐसी अवस्था में सीप में डाले गये बीज में एक विशेष पदार्थ की परत चढ़ती रहती है. यह विशेष पदार्थ कैल्शियम कार्बोनेट होता है, जोकि उस जीव के अंदर पैदा होता है. धीरे-धीरे यह एक सफेद रंग के चमकीले गोल आकार का पत्थर जैसा पदार्थ बन जाता है, जिसे मोती कहते हैं.

कोलकाता से लेकर हैदराबाद तक है सुभाष के मोतियों की मांग

सुभाष महतो द्वारा उत्पादित मोती की मांग कोलकाता से लेकर हैदराबाद तक है. कोलकाता व हैदराबाद से व्यापारी उनके गांव आकर मोती की खरीदारी करते हैं. साथ जमशेदपुर के व्यापारी भी इसकी खरीदारी करते हैं. गोल मोती 50 से सौ रुपये में बिक जाती है, वहीं अलग-अलग भगवान के शेप वाली मोती 500 से 600 रुपये प्रति पीस की दर से बिक जाती है.

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अमलेश नंदन सिन्हा प्रभात खबर डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद से इन्होंने कई समाचार पत्रों के साथ काम किया. इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत रांची एक्सप्रेस से की, जो अपने समय में झारखंड के विश्वसनीय अखबारों में से एक था. एक दशक से ज्यादा समय से ये डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. झारखंड की खबरों के अलावा, समसामयिक विषयों के बारे में भी लिखने में रुचि रखते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बारे में देखना, पढ़ना और नई जानकारियां प्राप्त करना इन्हें पसंद है.

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