Saraikela: खट्टी इमली लोगों के जीवन में भर रही मिठास, ग्रामीणों को मिल रहा है रोजगार

बेचने के लिए इमली को बोरे में भरते ग्रामीण
Saraikela: इमली का कारोबार कर सरायकेला-खरसावां के ग्रामीण स्वरोजगार से जुड़ रहे हैं. सरायकेला की इमली की मांग देशभर में है. इमली के पैदावार से लोग करीब चार महीनें तक आत्मनिर्भर बन रहे हैं. पूरी रिपोर्ट नीचे पढ़ें...
शचिंद्र कुमार दाश
Saraikela: सरायकेला-खरसावां जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में खट्टी इमली लोगों के जीवन में मिठास घोलने का काम कर रही है. पिछले साल की तुलना में इस साल इमली की बंपर पैदावार हुई है. ग्रामीण और पहाड़ी क्षेत्र के गांवों के लोग इमली चुनकर हाट-बाजारों में बेच रहे हैं, जिससे उन्हें स्वरोजगार मिल रहा है. सरायकेला-खरसावां में हर साल लगभग करीब दो से ढाई हजार मीट्रिक टन इमली की पैदावार होती है. एक पेड़ से तीन से चार क्विंटल इमली निकलती है. कुचाई के हर गांव में इमली के दो-चार इमली के पेड़ मिल जाएंगे. जबकि अन्य प्रखंडों के ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ ही इमली के पेड़ हैं.
सैकड़ों लोग इमली के कारोबार से जुड़े
खरसावां-कुचाई के ग्रामीण क्षेत्रों में फरवरी माह से लेकर मई माह तक इमली का कारोबार काफी ज्यादा होता है. इस वनोत्पाद के जरिए साल के चार महीने लोगों को रोजगार मिल पाता है. इमली का कारोबार यहां की अर्थव्यवस्था के लिए काफी महत्वपूर्ण है. इमली तोड़ने से लेकर उसकी कुटाई और बिक्री तक में कई परिवारों को रोजगार मिल रहा है. कई परिवार तो ऐसे हैं, जो इमली बेचकर ही अपनी जरूरतों को पूरा कर रहे हैं. सरकारी स्तर पर इमली का प्रोसेसिंग प्लांट लगाने की आवश्यकता है.
खुले बाजार में 43 से 46 रुपये प्रति किलो की दर
बाजार में इमली की बिक्री 43 से 46 रुपये प्रतिकिलो के दर से हो रही है. दक्षिण भारत में इस वर्ष इमली की पैदावार कम होने के कारण सरायकेला-खरसावां जिले में उत्पादित इमली की मांग बढ़ गयी है. हालांकि केंद्र सरकार की ओर से अब लघु वन उपज इमली का न्यूनतम समर्थन मूल्य (Minimum Support Price- MSP) 36 रुपये ही रखा गया है. परंतु एमएसपी से बाजार भाव अधिक है.
देशभर में भेजी जाती है खरसावां-कुचाई की इमली
यहां इमली के कारोबार के माध्यम से आत्मनिर्भर झारखंड को एक पहचान सकती है. खासकर ऐसे उद्योगों की स्थापना करनी होगी, जिससे इमली से जुड़े उत्पाद तैयार किए जा सकें. जिसमें सॉस, जैम, चटनी, सहित कई उत्पाद तैयार हो सकते हैं. खरसावां-कुचाई क्षेत्र से आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु आदि क्षेत्रों में इमली भेजी जाती है. इमली प्रसंस्करण केंद्र खोलने की स्थिति में यहां की अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है.
इमली का उपयोग
इमली का उपयोग सॉस, जैम, चटनी समेत कई उत्पाद, गोल चप्पे का पानी तैयार करने, खाद्य पदार्थों को खट्टा करने समेत दक्षित भारत में मसालों के रुप में इस्तेमाल होता है. इमली में विटामिन ‘ए’ और ‘सी’ के साथ-साथ और भी पोषक तत्व होते है. इमली में कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, पोटैशियम, मैगनीज, फाइबर जैसे खनिज तत्व होते हैं.
इमली की खेती को बढ़ावा मिला, तो लोगों का रोजगार बढ़ेगा
सामुदायिक वन पालन संस्थान के सोहन लाल कुम्हार ने बताया कि सरायकेला-खरसावां जिले में सालाना दो से ढाई हजार मीट्रिक टन इमली की पैदावार होती है. इसमें करीब 12 सौ मीट्रिक टन इमली की उपज सिर्फ कुचाई में होती है. इमली के एक पेड़ से तीन से चार क्विंटल इमली निकलती है. इमली तोड़ने से लेकर उसकी कुटाई और बिक्री तक में कई परिवारों को रोजगार मिलता है. इमली की खेती को बढ़ावा मिला, तो लोगों का रोजगार भी बढ़ेगा. सरकार को चाहिये कि इस लघु वनोपज को बढ़ावा दे.
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By AmleshNandan Sinha
अमलेश नंदन सिन्हा प्रभात खबर डिजिटल में वरिष्ठ पत्रकार के रूप में कार्यरत हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता में 20 से अधिक वर्षों का अनुभव है. रांची विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद से इन्होंने कई समाचार पत्रों के साथ काम किया. इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत रांची एक्सप्रेस से की, जो अपने समय में झारखंड के विश्वसनीय अखबारों में से एक था. एक दशक से ज्यादा समय से ये डिजिटल के लिए काम कर रहे हैं. झारखंड की खबरों के अलावा, समसामयिक विषयों के बारे में भी लिखने में रुचि रखते हैं. विज्ञान और आधुनिक चिकित्सा के बारे में देखना, पढ़ना और नई जानकारियां प्राप्त करना इन्हें पसंद है.
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