1948 में शुरू हुई रांची में रावण दहन की परंपरा, पाकिस्तान के बन्नू से आये शरणार्थियों ने शुरू की थी परंपरा
रांची में रावण दहन की शुरुआत करने वाली टीम. फोटो : प्रभात खबर
Ranchi Me Ravan Dahan History: आज की झारखंड की राजधानी रांची में दशहरा के दिन रावण, कुंभकर्ण और मेघदान के पुतला के दहन की शुरुआत वर्ष 1948 में हो चुकी थी. पाकिस्तान के बन्नू से आये 10-12 शरणार्थियों ने इसकी शुरुआत की थी. पहले 10-12 फीट के पुतले जलाये जाते थे. धीरे-धीरे पुतले का आकार बढ़ता गया और आयोजन का पैमाना भी बड़ा और भव्य होता गया. रांची में रावण दहन का क्या है इतिहास, यहां पढ़ें.
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Ranchi Me Ravan Dahan History: रांची में रावण दहन की शुरुआत 1948 में हुई थी. उस समय बन्नू (पाकिस्तान) से आये 10-12 शरणार्थी परिवारों ने पहली बार दशहरा पर 12 फीट के रावण का पुतला बनाया था. डिग्री कॉलेज (वर्तमान रांची कॉलेज) के प्रांगण में लाला मनोहर लाल नागपाल, कृष्ण लाल नागपाल, अमीर चंद सतीजा (तीनों अब स्वर्गीय) आदि ने अपने हाथों से रावण का निर्माण किया. गाजे-बाजे और पंजाबी ढोल-नगाड़ों के बीच लगभग 300-400 लोगों की मौजूदगी में पुतले का दहन हुआ था.
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- पहले रावण का पुतला 12 फीट का बनाया गया था
- आयोजन की जिम्मेदारी पंजाबी हिंदू बिरादरी को सौंपी गयी
- 1960 से मोरहाबादी मैदान बना रावण दहन का स्थायी स्थल

रावण के पुतले की लंबाई बढ़ी, बारी पार्क में होने लगा रावण दहन
वर्ष 1950 से 1955 के बीच पुतले का आकार 25 से 35 फीट तक बढ़ा और बारी पार्क में रावण दहन होने लगा, जहां 25-40 हजार लोग जुटते थे. धीरे-धीरे खर्च बढ़ने पर आयोजन की जिम्मेदारी पंजाबी हिंदू बिरादरी को सौंपी गयी. लाला देशराज, लाला केएल खन्ना और अन्य समाजसेवियों ने इसे आगे बढ़ाया.
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1960 से मोरहाबादी में हो रहा है रावण दहन
कुछ वर्षों तक आयोजन राजभवन के सामने हुआ, लेकिन बढ़ती भीड़ को देखते हुए 1960 से इसे मोरहाबादी मैदान में स्थायी रूप से आयोजित किया जाने लगा. आज यह परंपरा सिर्फ रावण नहीं, बल्कि मेघनाथ और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन के साथ भव्य उत्सव का रूप ले चुकी है. एक छोटे से प्रयास से शुरू हुई यह परंपरा अब रांची का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आकर्षण बन चुकी है.
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