Ranchi news : पेसा क्षेत्र की परंपरा व संस्कृति का होगा डिजिटलाइजेशन, आज से होगी शुरुआत

Updated at : 25 Jan 2025 11:58 PM (IST)
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Birsa Munda

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हमारी परंपरा, हमारी विरासत के नाम से एक अभियान की शुरुआत राज्य सरकार का पंचायती राज विभाग कर रहा है.

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मनोज सिंह, रांची.

राज्य के पेसा क्षेत्र की परंपरा और संस्कृति का डिजिटलाइजेशन होगा. गणतंत्र दिवस के दिन से इसकी शुरुआत पूरे राज्य में होगी. इसके लिए विशेष ग्रामसभा का आयोजन होगा. हमारी परंपरा, हमारी विरासत के नाम से एक अभियान की शुरुआत राज्य सरकार का पंचायती राज विभाग कर रहा है. देश में इस तरह की शुरुआत करने वाला पहला राज्य झारखंड होगा. अगस्त में यह अभियान मध्य प्रदेश में शुरू करने की योजना है. राज्य सरकार को इस काम में भारत सरकार सहयोग करेगा. इसके लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म लांच किया जायेगा. यह कई भाषाओं में होगा. इसी प्लेटफॉर्म पर परंपरा और संस्कृति को रखा जायेगा.

गीत-संगीत, खान-पान, रहन-सहन होगा रिकाॅर्ड

इस प्लेटफॉर्म पर डिजिटल गीत-संगीत भी रिकाॅर्ड किया जायेगा. शॉर्ट फिल्म, वीडियो, गेम आदि रिकार्ड हो सकेगा. लघुवनोपज, हर्बल मेडिसिन का डोक्यूमेंटेशन किया जायेगा. पेसा क्षेत्र में पड़ने वाले पर्यटन स्थलों की मैपिंग करायी जायेगी. इसके महत्व की जानकारी दी जायेगी. पेसा क्षेत्र में रहने वाले विभिन्न जनजातियों के एग्रीकल्चर प्रैक्टिस, कृषि उपज, स्थानीय उपज, क्राॅपिंग पैर्टन की भी मैपिंग करायी जायेगी. पेसा क्षेत्र के पारंपरिक कथाओं का चित्रण किया जायेगा. जनजातीय के विशेष खान-पान, बनाने के तरीके की रिकार्डिंग भी करायी जायेगी.

ग्रामसभा स्तर पर रखी जायेगी जानकारी

इस तरह की सभी जानकारी ग्राम सभा स्तर पर रखी जायेगी. ग्रामसभा इतिहास के नाम से एक पुस्तक भी तैयार कराया जायेगा. इसमें खान, पान, गीत-संगीत, खेलकूद, सांस्कृतिक महत्व, औषधीय पौधे, वन उत्पाद आदि की जानकारी रहेगी. इसका जियोग्राफिकल इंडिकेशन टैग भी तैयार होगा.

2066 पंचायतों में होगा यह काम

राज्य के 2066 पेसा पंचायतों में परंपरा और संस्कृति के डिजिटिलाइजेशन होगा. इसमें 16 हजार से अधिक गांव आयेंगे. डिजिटिलाइजेशन का काम फेजवाइज कराया जायेगा.

2000 से अधिक गीत हैं खड़िया समुदाय में

यहां के खड़िया समुदाय 2000 से अधिक गाना बताते हैं. इसमें सुबह से लेकर रात तक के लिए अलग-अलग गीत है. हर माह, हर दिन और हर साल के लिए अलग-अलग पूजन विधि है. 12 साल पर जनी शिकार की परंपरा है. तीन से लेकर 12 पड़हा तक का प्रावधान है. सबको अलग-अलग अधिकार है. इसी तरह की परंपरा और संस्कृति को इसमें शामिल कर डिजिटिलाइज किया जायेगा.

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