झारखंड के चतरा जिले में 5 साल तक के 60.6 फीसदी बच्चों को एनीमिया, 49.6 फीसदी बौने

Updated at : 25 Nov 2022 8:34 PM (IST)
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झारखंड के चतरा जिले में 5 साल तक के 60.6 फीसदी बच्चों को एनीमिया, 49.6 फीसदी बौने

झारखंड स्टेट फूड कमीशन की न्यूट्रिशन रिपोर्ट्स पर गौर करेंगे, तो पायेंगे कि उचित पोषण के अभाव में 49.6 फीसदी बच्चे बौने रह गये हैं, जबकि 30.6 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. 51.3 फीसदी का वजन कम रह गया है, जबकि 60.6 फीसदी बच्चों में खून की कमी है. 10 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं.

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झारखंड के चतरा जिला (Chatra District) में बच्चों में कुपोषण की स्थिति गंभीर है. जिला में 5 साल तक की उम्र के 60 फीसदी से ज्यादा बच्चे एनीमिया (Anaemia) के शिकार हैं. वहीं, करीब 50 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जो बौने रह गये हैं. 30 फीसदी से ज्यादा बच्चे कुपोषित हैं. वहीं 51 फीसदी से ज्यादा बच्चों का वजन कम है.

60.6 फीसदी बच्चों में खून की कमी

झारखंड स्टेट फूड कमीशन (Jharkhand State Food Commission) की न्यूट्रिशन रिपोर्ट्स (Nutrition Reports) पर गौर करेंगे, तो पायेंगे कि उचित पोषण के अभाव में 49.6 फीसदी बच्चे बौने (Stunted) रह गये हैं, जबकि 30.6 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. 51.3 फीसदी का वजन कम (Wasted) रह गया है, जबकि 60.6 फीसदी बच्चों में खून की कमी है. 10 फीसदी बच्चे गंभीर रूप से कुपोषण के शिकार हैं.

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चतरा में 1124 आंगनबाड़ी केंद्र हो रहे हैं संचालित

गर्भवती महिलाओं और बच्चों की सेहत दुरुस्त करने के लिए सरकार की ओर से कई योजनाएं चलायी जा रही हैं. गांवों की स्थिति सबसे खराब है. महिला एवं बाल विकास विभाग की ओर से आईसीडीएस के तहत जिले में 1,124 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित किये जा रहे हैं. वहीं, स्कूली बच्चों को कुपोषण से बचाने के लिए 1,570 स्कूलों में मध्याह्न भोजन (मिड डे मील) दिया जाता है.

4 कुपोषण उपचार केंद्र हो रहे हैं संचालित

चतरा जिला में बच्चों का कुपोषण दूर करने के लिए 4 कुपोषण उपचार केंद्र चलाये जा रहे हैं. ये केंद्र जिला मुख्यालय चतरा के अलावा हंटरगंज, टंडवा और सिमरिया में चल रहे हैं. हालांकि, इन अस्पतालों में सभी बच्चे नहीं पहुंच पाते हैं. वर्ष 2022 में चतरा के कुपोषण उपचार केंद्र में 128 बच्चों का इलाज हो पाया है, जबकि टंडवा में 79, हंटरंगज में 48 और सिमरिया में 69 बच्चों का इलाज हुआ है.

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बड़े भी हैं बीमार

चतरा में बड़े लोगों की भी सेहत ठीक नहीं है. 15 से 49 साल की 7.1 फीसदी महिलाएं हाई ब्लड प्रेशर की शिकार हैं, जबकि इसी उम्र के 16.9 फीसदी पुरुषों में उच्च रक्तचाप की समस्या देखी गयी है. इस उम्र की 3.6 फीसदी महिलाओं को मधुमेह (ब्लड शुगर) है, जबकि 6.2 फीसदी पुरुष इस बीमारी के शिकार हैं.

दुनिया में सबसे ज्यादा बौने बच्चे भारत में

ग्लोबर हंगर इंडेक्स के मुताबिक, तीन देशों में सबसे ज्यादा बौने बच्चे हैं. इसमें भारत का नाम सबसे ऊपर है. दुनिया में कुपोषण की वजह से जितने बच्चे बौने रह गये हैं, उनमें एक तिहाई बच्चे भारत में हैं. भारत के बाद नाईजीरिया और पाकिस्तान का नंबर आता है. भारत में सबसे ज्यादा 30 फीसदी बौने बच्चे उत्तरी भारत में हैं. 40 फीसदी मध्य भारत में और 20 फीसदी दक्षिण भारत में हैं.

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कुपोषण से जूझ रहे टॉप-5 राज्यों में शुमार है झारखंड

बता दें कि कुपोषण से सबसे ज्यादा जूझ रहे शीर्ष 5 राज्यों में झारखंड भी शुमार है. खनिज संपदा से समृद्ध इस राज्य में गरीबी और कुपोषण की समस्या पीढ़ियों से है. बिहार और मध्यप्रदेश के बाद सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे झारखंड में ही हैं. राज्य की 3.3 करोड़ की आबादी में 1.3 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है.

NFHS-5 के आंकड़ों में झारखंड

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएसएच-5) में बताया गया है कि भारत में 59 महीने तक के 36 फीसदी बच्चों की लंबाई उनकी आयु की तुलना में कम है. यह गंभीर कुपोषण का संकेत है. 19 फीसदी बच्चे ऐसे हैं, जो अपनी लंबाई के अनुपात में कुछ ज्यादा ही दुबले हैं. वहीं, 32 फीसदी बच्चों का वजन बहुतम है, जबकि 3 फीसदी बच्चों का वजन ज्यादा है.

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झारखंड में कम हुआ कुपोषण

हालांकि, मामले में कुछ सुधार हुआ है. वर्ष 2015-16 में 38 फीसदी बच्चे बौने और कम वजन के थे, जबकि वर्ष 2019-21 में यह आंकड़ा घटकर 36 फीसदी रह गया. इसी समयावधि में दुबले और कमजोर बच्चों का आंकड़ा 21 फीसदी से घटकर 19 फीसदी रह गया है. झारखंड में अभी भी 5 साल तक के 40 फीसदी बच्चे बौने हैं.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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