झारखंड के 90% बच्चों को नहीं मिलता पोषक आहार, 3.3 करोड़ में 1.3 करोड़ लोग गरीब, कैसे खत्म हो पीढ़ियों से चला आ रहा कुपोषण?
Author : Prabhat Khabar Digital Desk Published by : Prabhat Khabar Updated At : 06 Oct 2020 2:08 PM
Malnutrition in Jharkhand: खनिज संपदा से समृद्ध राज्य झारखंड में गरीबी और कुपोषण की समस्या पीढ़ियों से चली आ रही है. बिहार और मध्यप्रदेश के बाद सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे झारखंड में ही हैं. राज्य की 3.3 करोड़ की आबादी में 1.3 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2014-15 (NHFS-4) की बताती है कि राज्य के 45.3 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. झारखंड के 10 में 9 बच्चों को पोषक आहार नहीं मिलता. ऐसे में बड़ा सवाल है कि पीढ़ियों से और सदियों से चले आ रहे कुपोषण के अभिशाप से झारखंड को मुक्ति कैसे मिलेगी?
रांची : खनिज संपदा से समृद्ध राज्य झारखंड में गरीबी और कुपोषण की समस्या पीढ़ियों से चली आ रही है. बिहार और मध्यप्रदेश के बाद सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे झारखंड में ही हैं. राज्य की 3.3 करोड़ की आबादी में 1.3 करोड़ की आबादी गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर करती है. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण- 2014-15 (NHFS-4) की बताती है कि राज्य के 45.3 फीसदी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं. झारखंड के 10 में 9 बच्चों को पोषक आहार नहीं मिलता. ऐसे में बड़ा सवाल है कि पीढ़ियों से और सदियों से चले आ रहे कुपोषण के अभिशाप से झारखंड को मुक्ति कैसे मिलेगी?
‘भूख की कीमत’ पर अध्ययन कर रहे अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संस्था (एनजीओ) सेव द चिल्ड्रेन का कहना है कि झारखंड प्रदेश को पीढ़ियों से चले आ रहे कुपोषण के अभिशाप से मुक्त कराने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है. एनजीओ के डिप्टी डायरेक्टर चित्तप्रिय साधू एवं इस संस्था की मैनेजर सुमी हल्दर ने इस विषय पर एक विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है. इसमें उन्होंने बताया है कि कुछ उपायों के जरिये कैसे इस अभिशाप से झारखंड को मुक्ति मिल सकती है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि झारखंड कुपोषण से सबसे ज्यादा जूझ रहे शीर्ष 5 राज्यों में शुमार है. कुपोषण की वजह से ही पांच साल से कम उम्र के बच्चों का वजन सामान्य से कम है. काफी संख्या में बच्चे बौने रह गये हैं, जबकि 45.3 फीसदी बच्चों का वजन उनकी लंबाई के अनुपात में कम है. राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे बच्चों का औसत 38.4 फीसदी है. इतना ही नहीं, झारखंड के 47.8 फीसदी बच्चों का वजन उनकी उम्र के हिसाब से सामान्य से काफी कम है.
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कुपोषण चिकित्सा केंद्रों पर कुपोषित बच्चों की पहचान की जा रही है. ऐसे बच्चे, जिनमें कुपोषण के गंभीर लक्षण दिख रहे हैं, उन्हें जिला अस्पतालों में कार्यरत कुपोषण चिकित्सा केंद्रों पर रेफर किया जाता है. हालांकि, बहुत से ऐसे बच्चे हैं, जिनके माता-पिता इन केंद्रों पर जाने से पहले कई बार सोचते हैं. जब कोई विकल्प नहीं होता, तभी वे वहां जाते हैं.

इसकी वजह यह है कि जिला मुख्यालय जाने के लिए उन्हें अपनी दिहाड़ी छोड़नी पड़ती है, जिससे उनके परिवार के लिए भोजन की व्यवस्था होती है. काफी संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें जिला मुख्यालय जाने के लिए 40 किलोमीटर तक की यात्रा करनी पड़ती है. बुवाई के सीजन में कृषि श्रमिकों की मांग काफी अधिक हो जाती है. ऐसे में भले बच्चा कुपोषित हो, कोई भी मां-बाप अपना काम छोड़कर अस्पताल जाने की जहमत नहीं उठाना चाहता. वह कमाई नहीं छोड़ना चाहता.
झारखंड में 37.9 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं, जिनका विवाह 18 साल की उम्र से पहले हो जाता है. यहां तक कि 14 साल में ही लड़कियों का विवाह कर दिया जाता है. बेटियों की शिक्षा को कोई प्राथमिकता नहीं देता. राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि सबसे ज्यादा बाल विवाह वाले राज्यों में झारखंड देश में तीसरे नंबर पर है. स्वच्छता का अभाव झारखंड में कुपोषण की बड़ी समस्या है. अनचाही स्थितियों की वजह से बीमारियां फैलती हैं और बच्चे कुपोषण का शिकार हो जाते हैं. बावजूद इसके झारखंड के गांवों में स्वच्छता की चिंता किसी को नहीं है. आज भी लोग शैवाल से भरे तालाबों से पानी लाकर पीते हैं.
झारखंड में कुपोषण के इतने मामले सरकार की पोषण योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर सवाल खड़े करता है. राज्य सरकार के समाज कल्याण विभाग की ओर से संचालित आंगनबाड़ी केंद्रों, जो अधिकतर बच्चों के आइसीडीएस तक पहुंचने का केंद्रबिंदु है, मानव संसाधन के घोर अभाव का सामना कर रहा है. इसलिए सरकार के सभी विभागों और समाज के हर तबके एवं संगठनों को मिलकर इस दोषपूर्ण चक्र को तोड़ना होगा. तभी कुपोषण मिटाने के लिए सितंबर, 2019 में नीति आयोग द्वारा शुरू किये गये पोषण अभियान की सार्थकता सिद्ध हो पायेगी.
रिपोर्ट में कहा गया है कि इस अभियान के सार्थक परिणाम तभी सामने आ पायेंगे, जब बच्चे के पहले 1000 दिन में उनके स्वास्थ्य और पोषण का पूरा-पूरा ख्याल रखा जायेगा. यदि यह बदलाव हो गया, तो न केवल पोषण विशेष बल्कि पोषण सेंसिटिव कार्यक्रमों का रास्ता भी साफ हो जायेगा, जिससे झारखंड के शिशुओं को जरूरत के अनुरूप पर्याप्त पोषण युक्त भोजन मिल पायेगा. इसके बाद ही कुपोषण के अभिशाप से राज्य को मुक्ति मिलेगी.
Also Read: VIDEO: मूसलाधार बारिश के बीच रात भर उफनायी नदी में फंसा रहा मछुआरा, सुबह पहुंची एनडीआरएफ की टीमरिपोर्ट में कहा गया है कि पोषण के प्रति संवेदनशील पहल के लिए रणनीतिक, आहार विविधता को बढ़ावा देने और घरेलू स्तर पर पोषण सुरक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता है. इसके लिए कृषि और पोषण (खेत से प्लेट तक) का समायोजन अहम भूमिका निभा सकता है. स्वयं सहायता समूहों को पोषण सहायता-संवेदनशील कार्यक्रमों से जोड़ना होगा. ये समूह ही व्यावहारिक रूप से सामुदायिक स्तर पर परिवर्तन सुनिश्चित कर सकते हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि एनएफएचएस राज्य के शिशुओं एवं मां बनने वाली महिलाओं के स्वास्थ्य और पोषण को ही प्रतिबिंबित नहीं करता, बल्कि इसमें सुधार के उपायों के बारे में भी बताता है. यह बताता है कि सरकार की नीतियों और कार्यक्रमों में किस तरह के बदलाव की जरूरत है, ताकि बच्चों की सेहत में सुधार हो और कुपोषण का खात्मा. रिपोर्ट में लेखक द्वय कहते हैं कि बाल कुपोषण को मिटाने के लिए आंगनबाड़ी केंद्रों का सार्वभौमीकरण और अभिसरण तंत्र की मजबूत प्रणाली ऐसे मुद्दों का स्थायी समाधान दे सकता है.
Posted By : Mithilesh Jha
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