Jharkhand: दो साल में लंग कैंसर मरीजों की मुस्कान की वजह बना लंग कनेक्ट

ravi-prakash-cancer/ Ravi Prakash Passed Away
टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल मुंबई के डॉक्टर कुमार प्रभाष ने लंग कनेक्ट की शुरुआत की. इसका मकसद फेफड़ों अर्थात लंग कैंसर के मरीजों को संवाद और इलाज का एक सहज और सरल प्लेटफार्म उपलब्ध कराना. जहां, वे वर्चुअली जुड़ सकें और अपने तमाम सवालों के जवाब निःशुल्क पा सकें.
Jharkhand News: साल 2020 में जब कोविड-19 का संक्रमण अपने चरम पर था और इस वैश्विक महामारी से दुनिया परेशान थी, तभी मुंबई (भारत) स्थित कैंसर के सबसे बड़े अस्पताल टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल (टीएमएच) के एक डॉक्टर ने लंग कनेक्ट की शुरुआत की, ताकि फेफड़ों अर्थात लंग कैंसर के मरीजों को संवाद और इलाज का एक सहज और सरल प्लेटफार्म उपलब्ध कराया जा सके. जहां, वे वर्चुअली जुड़ सकें और अपने तमाम सवालों के जवाब निःशुल्क पा सकें. वह डॉक्टर थे डॉ कुमार प्रभाष, जो टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल में मेडिकल अंकोलॉजी के विभागाध्यक्ष (एचओडी) व प्रोफेसर हैं. मूलतः बिहार के रहने वाले और झारखंड के झुमरी तिलैया में पले-बढ़े डॉ कुमार प्रभाष भारत के प्रमुख कैंसर विशेषज्ञों में शामिल हैं. वह पिछले कई साल से टीएमएच में कार्यरत हैं और लंग कैंसर के मुझ जैसे हजारों मरीजों के लिए जिंदगी की उम्मीद की एक बड़ी वजह बने हैं.
उनके द्वारा संचालित लंग कनेक्ट अपनी यात्रा के दो साल पूरे कर चुका है. इससे अब तक 5000 लंग कैंसर मरीज जुड़े हैं और इसके 49 आयोजन हो चुके हैं. 24 जून को इसका 50 वां आयोजन है. लिहाजा, लंग कनेक्ट से जुड़े तमाम लोगों के लिए यह तारीख खास है. इस प्लेटफार्म के संचालन में उनका साथ दे रहे हैं बिहार के ही बड़हिया के रहने वाले संजीव शर्मा और उनकी टीम के तमाम लोग. बड़हिया यूं तो छोटा-सा कस्बा है लेकिन वहां के रसगुल्ले काफी प्रसिद्ध हैं. किउल-पटना रेलखंड पर बसे बड़हिया स्टेशन पर ट्रेनों के रुकते ही ऐसे कई विक्रेता ट्रेनों में आकर रसगुल्ले बेचते हैं और आपके साथ मिठास का सौदा कर उतर जाते हैं. डॉ कुमार प्रभाष, संजीव शर्मा और उनकी टीम इन्हीं लोगों की तरह कैंसर के मरीजों के मन में मिठास घोलने का काम कर रही है. इसका जरिया बना है लंग कनेक्ट.
इसके साथ सिर्फ टाटा मेमोरियल हॉस्पिटल, मुंबई के ही डॉक्टर नहीं जुड़े हैं, बल्कि इस प्लेटफार्म पर देश भर के लंग कैंसर विशेषज्ञ डॉक्टर, डायटिशियन, योग के शिक्षक, काउंसलर, कैंसर के मरीज और सर्वाइवर्स की पूरी टीम है. अपने मरीजों की सेवा करने वाले उनके तीमारदार (केयरगीवर्स) भी हैं, जो अपने अनुभवों को साझा कर एक-दूसरे की हौसला आफजायी करते हैं. लंग कैंसर के चौथे अर्थात अंतिम स्टेज का मरीज होने के कारण मैं इसके फायदे से वाकिफ हूं. मुझे पता है कि मेटास्टैटिक होने के कारण मैं लंग कैंसर से कभी मुक्त नहीं हो पाउंगा, लेकिन डॉक्टर कुमार प्रभाष और उनकी टीम मेरा पैलियेटिव केयर ट्रीटमेंट कर रही है. यह इलाज का वह प्रोटोकाल है, जब फैले हुए कैंसर के कारण मुझ जैसे मरीजों की बीमारी ठीक नहीं की जा सकती लेकिन इस कारण कम से कम कष्ट हो और हमारी जिंदगी ज्यादा से ज्यादा बढ़ायी जा सके, इसका प्रबंधन करने की कोशिशें की जाती हैं. Â
लंग कनेक्ट ऐसे लोगों के लिए वरदान सरीखा है. क्योंकि, इसके माध्यम से लंग कैंसर के मरीज रोज-रोज होने वाली परेशानियों का समाधान वर्चुअली पा लेते हैं. इसके लिए उन्हें पैसे नहीं खर्च करने पड़ते और कहीं जाने की जरूरत नहीं होती है. अपनी तरह के दूसरे लोगों से पहचान भी बन जाती है, जो ज्यादा अटूट होती है. डॉ कुमार प्रभाष कहते हैं कि कोविड-19 के संक्रमण के दौरान कैंसर जैसी बीमारी से ग्रसित रोगियों की जिंदगी दांव पर लग गयी थी. परिवहन के साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण ऐसे मरीज मुंबई आ नहीं पा रहे थे और उनका इलाज बीच में ही रुक गया था. उसी दौरान मैंने लंग कनेक्ट के बारे में सोचा और इसकी शुरुआत करायी. ताकि कैंसर मरीजों को घर बैठे सहायता की जा सके. इसका अच्छा फीडबैक मिला, तो हम और उत्साहित हुए. अब यह प्लेटफार्म मरीजों की मुस्कान की जगह बन चुका है. इसकी मुझे खुशी है.
उनके सहयोगी संजीव शर्मा ने बताया कि लंग कनेक्ट का सारा खर्च फिलहाल आपसी सहयोग से उठाया जा रहा है. जो लोग या संस्थाएं हमारी मदद करना चाहते हैं वे उत्साह फाउंडेशन को दान देते हैं. हमें वहीं से खर्च ते लिए आवश्यक पैसे मिल जाते हैं. अगर घटा, तो हम आपसी चंदे से यह काम चला लेते हैं. आने वाले दिनों में लंग कनेक्ट को अलग ट्रस्ट के तौर रजिस्टर्ड कराने की योजना है, जिसके ट्रस्टी लंग कैंसर के मरीज और उनके केयरगीवर्स होंगे. यहां उल्लेखनीय है कि कभी पश्चिमी देशों की बीमारी माना जाने वाला लंग कैंसर अब भारत में महामारी की तरह फैल चुका है.
एक आंकड़े के मुताबिक भारत में होने वाले कुल कैंसर केसेज के 6 फीसदी मरीज अकेले लंग कैंसर के हैं. इनमें से अधिकतर लोगों को इसका पता अंतिम स्टेज में चलता है. तबतक उनकी बीमारी फैल चुकी होती है. उनका क्योरेटिव इलाज नहीं हो पाता. इस कारण लंग कैंसर के मरीजों की मोरटालिटी दर (मरने वालों का प्रतिशत) दूसरे कैंसर मरीजों की तुलना में अधिक है. यह भारत के पुरुषों में होने वाला दूसरा सबसे प्रमुख कैंसर है औक ओवरआल नजरिये से भी देश में इसका स्थान चौथा है. मुंबई में इलाज कराते वक्त मैं कई युवा महिलाओं और बच्चों से भी मिल चुका हूं, जो मेरी तरह लंग कैंसर के मरीज हैं. इनमें से कई लोगों की बीमारी अंतिम स्टेज में है. फिर भी वे चंद महीने या सालों की जिंदगी की आस में अपना इलाज करा रहे हैं.
ईश्वर करें कि ऐसे सभी मरीजों की उम्र में कई साल और जुड़ जाएं और वे स्वस्थ रहें. डा कुमार प्रभाष और लंग कनेक्ट की पूरी टीम का आभार. आपके लिए शुभकामनाएं कि आप आने वाले सालो में 500 वां आयोजन करें और इसी तरह मरीजों की उम्मीदों की वजह बनें. आमीन.
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By Prabhat Khabar News Desk
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