Hindi Diwas 2022: हिंदी के विकास में कई लोग दे रहे अपना योगदान, जानें यहां
Published by : Prabhat Khabar News Desk Updated At : 14 Sep 2022 9:04 AM
14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जा रहा है. हिंदी भारत की 'राष्ट्रभाषा' है. तकनीकी और आर्थिक विकास के कारण बेशक अंग्रेजी पूरे देश पर हावी होती जा रही है, लेकिन हिंदी का वजूद आज भी कायम है. तमाम चुनौतियों के बावजूद बहुत से लोग हिंदी के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं.
Hindi Diwas 2022: ‘हिंदी’ जनमानस की भाषा है, इसलिए शुरू से ही इसे वरियता मिली है. यह न सिर्फ भारत की पहचान है, बल्कि यह हमारे जीवन मूल्यों, संस्कृति एवं संस्कारों की सच्ची संवाहक, संप्रेषक और परिचायक भी है. सरल, सहज और सुगम होने के कारण यह पूरे देश को एक सूत्र में बांधती है. 14 सितंबर को देशभर में हिंदी दिवस मनाया जाता है. तकनीकी और आर्थिक विकास के कारण बेशक अंग्रेजी पूरे देश पर हावी होती जा रही है, लेकिन हिंदी का वजूद आज भी कायम है. क्योंकि तमाम चुनौतियों के बावजूद बहुत से लोग हिंदी के विकास में अपना योगदान दे रहे हैं.
राज्य के निर्वाचन आयुक्त और पूर्व मुख्य सचिव डॉ डीके तिवारी उतर प्रदेश में हिंदी माध्यम के स्कूल से 12वीं तक की पढ़ाई की है. इसके बाद टॉप कॉलेज में पढ़े, एमबीबीएस किया उसके बाद आइएएस बने. उनके दो भाइयों ने भी हिंदी माध्यम के स्कूल से ही पढ़ाई की है. इसके बाद एक भाई ने आइआइटी से इंजीनियरिंग की. फिर दोनों भाई भी आइएएस बने. उनकी हिंदी बेहतर रही है, इसलिए हिंदी में संचिकाअों का निबटारा भी बखूबी करते रहे हैं. डॉ तिवारी कहते हैं : ऐसा नहीं है कि हिंदी मीडियम के विद्यार्थी आगे नहीं निकल रहे हैं. बुद्धि प्रखर हो, तो हिंदी का विद्यार्थी आगे निकल ही जाता है.
हरमू निवासी रागेश बिहारी ने हिंदी माध्यम से सीए की पढ़ाई पूरी की. फिलहाल वे जेएसडब्ल्यू स्टील में झारखंड प्रोजेक्ट सीएफओ पद पर कार्यरत हैं. उन्होंने बताया कि ज्यादातर लोग सीए की पढ़ाई इंग्लिश में करते हैं. चूंकि शुरू से ही उन्होंने हिंदी मीडियम से पढ़ाई की थी, इसलिए सीए भी हिंदी से ही करने का निश्चय किया. हालांकि, स्टडी मटीरियल के लिए उन्हें काफी मुश्किलों को सामना करना पड़ा. अंग्रेजी किताबें पढ़कर हिंदी में नोट्स बनाये और पढ़ाई की. शिक्षकों ने भी काफी मदद की और हौसला बढ़ाया. वे सीए के विद्यार्थियों के लिए हिंदी में किताबें लिखने की तैयारी कर रहे हैं.
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बीआइटी मेसरा के मेकैनिकल इंजीनियरिंग विभाग की सहायक प्राध्यापक डॉ रिचा पांडेय हिंदी के विभिन्न साहित्यिक मंचों से जुड़ी हैं. पढ़ाने के बाद जो समय बचता है, वह हिंदी को समर्पित कर देती हैं. वर्ष 2019 में इनका काव्य संग्रह ‘मन के लम्हे’ का प्रकाशन हुआ. डॉ रिचा कहती है कि हिंदी सिर्फ बोलचाल की भाषा नहीं, बल्कि मानवीय भावना है. नयी शिक्षा नीति के तहत इंजीनियरिंग की पुस्तकें भी हिंदी में जारी होनी हैं. एआइसीटीइ को इसके लिए आवेदन दिया है. अनुमति मिलने पर हिंदी के प्रति अपने लगाव को पूरा करने के लिए अंग्रेजी की शैक्षणिक पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद करेंगी.
बीआइटी मेसरा के हिंदी अधिकारी डॉ पीयूष तिवारी भी हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए पूरे समर्पण भाव से काम कर रहे हैं. संस्थान में ने पदभार ग्रहण करने के बाद उन्होंने यहां हिंदी प्रकोष्ठ का गठन किया. बताया कि इसका उद्देश्य हिंदी साहित्य में रुचि रखनेवाले विद्यार्थियों और प्राध्यापकों को बढ़ावा देना है. वे विभाग में ज्यादा से ज्यादा काम हिंदी में ही करते हैं. डॉ पीयूष खुद भी साहित्य के प्रति झुकाव रखते हैं. वे कविताएं भी लिखते हैं. अपनी कविता : ‘सपने…’ के जरिये मानवीय विचारों को सजाया है. उनकी यह कविता मानव को खुद पर विश्वास रखकर जीवन में आगे बढ़ने की सीख देती है.
गढ़वा में उत्क्रमित उच्च विद्यालय सोनेहारा के हिंदी शिक्षक पंकज कुमार मिश्र बच्चों के मन से हिंदी का डर करने में जुटे हुए हैं. वे स्मार्ट फोन और प्रोजेक्टर के जरिये लेखकों के दुर्लभ साक्षात्कार का वीडियो दिखाते हैं. ‘आओ बने गुरुजी’ नाम से कार्यक्रम आयोजित करते हैं, जिसमें बच्चे ही हिंदी शिक्षक की भूमिका निभाते है. श्री मिश्र बताते है कि इससे बच्चों में हिंदी को लेकर आत्मविश्वास बढ़ रहा है. ज्यादातर बच्चे गांव से आते हैं. इसलिए बीच-बीच में अवधि, भोजपुरी, मगही का इस्तेमाल करते हैं. साथ ही बच्चों का हास्य कवि सम्मेलन भी कराते हैं, जिसमें बच्चे ही वक्ता की भूमिका निभाते हैं.
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ऑर्किड अस्पताल में कंसल्टेंट फिजिशियन सह चेस्ट स्पेशलिस्ट डॉ अभिषेक कुमार श्रीवास्तव साहित्य जगह में सक्रिय हैं. अपने पेशे से समय निकाल कर वे हिंदी की कविताएं लिखते हैं. इनकी 45 कविताओं की काव्य संग्रह ‘इत्र की शीशी एवं अन्य कविताएं’ का लोकार्पण 28 जून को हुआ. काव्य संग्रह में मानव दर्शन, प्रेम रस, कोरोना से जीवन संघर्ष और सामाजिक विषयों के अनुभव से जुड़ी कविताएं मिलती हैं. कहते हैं साहित्य के प्रति लगाव मां की तरह है. इसे स्नेह मिलना चाहिए. हरिवंश राय बच्चन के काव्य संग्रह को पढ़ने के बाद हिंदी से लगाव हुआ और 2001 से कविताएं लिखने लगे.
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