लुप्त होती कठपुतली कला को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं बीरेंद्र

Published at :15 May 2024 12:48 AM (IST)
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लुप्त होती कठपुतली कला को सहेजने का प्रयास कर रहे हैं बीरेंद्र

जनजातीय एवं क्षेत्रीय संकाय के नागपुरी के शिक्षक डॉ बीरेंद्र कुमार महतो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. ये झारखंड आंदोलनकारी रहे हैं. नागपुरी के शिक्षक हैं. नागपुरी भाषा में कार्टून कॉमिक्स के रचयिता रहे हैं.

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रांची. जनजातीय एवं क्षेत्रीय संकाय के नागपुरी के शिक्षक डॉ बीरेंद्र कुमार महतो बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं. ये झारखंड आंदोलनकारी रहे हैं. नागपुरी के शिक्षक हैं. नागपुरी भाषा में कार्टून कॉमिक्स के रचयिता रहे हैं. इसके अलावा वे पिछले 20 सालों से लुप्त होती कठपुतली कला को भी सहेजने का प्रयास कर रहे हैं. पिछले दिनों इन्हें कठपुतली कला में उल्लेखनीय काम के लिए फतेहाबाद आगरा की साहित्य कला संस्कृति अकादमी संस्था ने रवींद्रनाथ टैगोर गौरव सम्मान से सम्मानित किया था. डॉ बीरेंद्र कठपुतली बनाते हैं, इनका प्रदर्शन करते है और प्रशिक्षण भी देते हैं. वे अब तक कठपुतली के 400 से अधिक शो कर चुके हैं. इन्होंने रांची में और रांची से बाहर दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल व राजस्थान में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया है. कठपुतली पर आधारित फिल्मों के निर्माण में भी ये शामिल रहे हैं. इनमें एक फिल्म थी-क्राई, कोलकाता के सहयोग से निर्मित एवं स्व. शिशिर टुडू के निर्देशन में बनी झारखंड की पहली कठपुतली फिल्म ”अक्षर की बरसात में भींगे ज्ञान भंडार.” यह शिक्षा पर आधारित फिल्म थी, जो रियल लोकेशन में शूट होने वाली संभवतः भारत की पहली कठपुतली फिल्म है. इस फिल्म को देश-विदेश में काफी सराहना मिली. दूसरी कठपुतली फिल्म अखड़ा, रांची के प्रसिद्ध डाक्यूमेंट्री फिल्म मेकर मेघनाथ व बीजू टोप्पो के निर्देशन में ”100 दिन मिलेगा काम” (मनरेगा कानून पर आधारित), बनी. बीरेंद्र ने इन दोनों ही फिल्मों में कठपुतली निर्देशन, कठपुतली मेकिंग, कठपुतली मूवमेंट के साथ-साथ कठपुतलियों के लिए आवाज दी.

कठपुतली कला का प्रशिक्षण भी दे रहे

बीरेंद्र झारखंड के विभिन्न जिलों में पपेट (कठपुतली) मेकिंग का प्रशिक्षण देकर लोगों को इस लुप्त होती लोककला के प्रति जागरूक कर रहे हैं. सरकार के गीत एवं नाटक प्रभाग के बैनर तले इन्होंने संत मिखाइल नेत्रहीन विद्यालय, बहूबाजार के नेत्रहीन छात्र-छात्राओं को कठपुतली बनाने का प्रशिक्षण दिया. इन बच्चों को कठपुतलियों के माध्यम से नाटक प्रस्तुत करने का भी प्रशिक्षण दिया. 2003 में इन्होंने ‘अभिशासन हेतु लोक कलाओं की भूमिका’ पर हरियाणा में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में कठपुतली कला का प्रदर्शन किया था. इस प्रदर्शन पर जामिया-मिलिया मास कम्यूनिकेशन के छात्रों द्वारा डॉक्यूमेंट्री बनायी गयी. झारखंड, बिहार, हरियाणा और राजस्थान के सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी कठपुतली बनाने और चलाने का प्रशिक्षण दे चुके हैं. 2005 में कठपुतली कला के क्षेत्र में सराहनीय योगदान के लिए ‘झारखंड रत्न प्रोत्साहन सम्मान’ तथा 2010 में नागपुरी भाषा-साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में विशेष कार्य करने के लिए ‘पीटर शांति नवरंगी हीरानागपुर साहित्य सम्मान’ से सम्मानित हो चुके हैं. वर्ष 2011 में झारखंड सरकार द्वारा एक लाख रुपये की राशि देकर पुरस्कृत व सम्मानित किया गया.

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