रांची में सजा बंगला संस्कृति का रंग, जेल पार्क में तीन दिवसीय मेला शुरू

बंगला मेले में झामुमो के प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य. फोटो: प्रभात खबर
Ranchi News: रांची के जेल पार्क में तीन दिवसीय बंगला सांस्कृतिक मेला 2026 की शुरुआत हुई. मेले में बंगाली संस्कृति, संगीत, नृत्य, पारंपरिक व्यंजन, साड़ियां और सांस्कृतिक कार्यक्रम लोगों को आकर्षित कर रहे हैं. गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर की जयंती पर आयोजित इस मेले में प्रवेश निशुल्क रखा गया है. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
रांची से हिमांशु साहू की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड की राजधानी रांची के बिरसा मुंडा स्मृति उद्यान यानी जेल पार्क में बंगला संस्कृति की रंगत पूरी तरह छा गई है. बंगाली युवा मंच चैरिटेबल ट्रस्ट की ओर से आयोजित तीन दिवसीय बंगला सांस्कृतिक मेला 2026 का भव्य शुभारंभ हुआ. यह आयोजन गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की 165वीं जयंती के उपलक्ष्य में किया जा रहा है. मेले की शुरुआत ध्वजारोहण, शंख ध्वनि और पारंपरिक उलू ध्वनि के साथ हुई. उद्घाटन के बाद पूरे परिसर में बंगाली संस्कृति, संगीत और पारंपरिक परिधानों की खास झलक देखने को मिली.
कला, संगीत और परंपरा का संगम
तीन दिनों तक चलने वाले इस मेले में बंगाली संस्कृति की विविध छवियां प्रस्तुत की जा रही हैं. आयोजकों के अनुसार हर दिन अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होंगे. इसमें बंगाली गीत, नृत्य, नाटक, साहित्य संवाद और संगीत प्रस्तुतियां आकर्षण का केंद्र रहेंगी. कोलकाता से आए कलाकारों के साथ-साथ स्थानीय कलाकार भी मंच पर अपनी प्रस्तुति देंगे. मेले में गुरुदेव रविंद्रनाथ टैगोर को समर्पित विशेष कार्यक्रम भी रखे गए हैं. रविंद्र जयंती के अवसर पर साहित्यिक वक्तव्य, सांस्कृतिक संवाद और सामूहिक बंगला गीतों का आयोजन किया जाएगा. आयोजकों का कहना है कि यह मेला सिर्फ मनोरंजन नहीं बल्कि बंगला भाषा और संस्कृति के संरक्षण का भी माध्यम है.
60 स्टॉल में दिख रही बंगाल की झलक
मेले में करीब 60 स्टॉल लगाए गए हैं, जहां बंगाल की पारंपरिक साड़ियां, ज्वेलरी, हस्तशिल्प और सांस्कृतिक वस्तुएं लोगों को आकर्षित कर रही हैं. खाने-पीने के स्टॉल पर बंगाली व्यंजनों की विशेष व्यवस्था की गई है. यहां आने वाले लोग रसगुल्ला, मिष्ठी doi, फिश व्यंजन और अन्य पारंपरिक स्वाद का आनंद ले रहे हैं. आयोजकों का कहना है कि मेले में प्रवेश पूरी तरह निशुल्क रखा गया है ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग बंगाल की समृद्ध कला और संस्कृति को करीब से महसूस कर सकें. जेल पार्क का माहौल ऐसा बन गया है मानो रांची में ही छोटा सा बंगाल बस गया हो.
सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाने की पहल
कार्यक्रम में मौजूद डॉ. पंपा सेन विश्वास ने कहा कि यह मेला सिर्फ रांचीवासियों के लिए नहीं बल्कि पूरे झारखंड के लोगों के लिए खास आकर्षण बन चुका है. उन्होंने बताया कि हर साल लोग इस मेले का इंतजार उसी तरह करते हैं जैसे दुर्गा पूजा का. तीन दिनों के दौरान शंख ध्वनि प्रतियोगिता, सांस्कृतिक कार्यक्रम, ड्राइंग प्रतियोगिता और विभिन्न पारंपरिक गतिविधियां आयोजित की जा रही हैं. उन्होंने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को बंगला संस्कृति से जोड़ना है ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी सांस्कृतिक धरोहर को समझ सकें और उसे आगे बढ़ा सकें.
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रांची में बन गया छोटा बंगाल: डॉ रत्ना राय भट्टाचार्य
डॉ रत्ना राय भट्टाचार्य ने इस मेले को झारखंड ही नहीं बल्कि पूरे भारत के बंगला भाषियों का सबसे बड़ा सांस्कृतिक आयोजन बताया. उन्होंने कहा कि मेले में प्रवेश शुल्क नहीं रखा गया है, जो इसे और खास बनाता है. उनके मुताबिक मेले के भीतर प्रवेश करते ही ऐसा महसूस होता है जैसे कोई बंगाल के सांस्कृतिक माहौल में पहुंच गया हो. उन्होंने कहा कि बंगाल, बिहार और उड़ीसा की साझा सांस्कृतिक विरासत की झलक इस आयोजन में साफ दिखाई देती है. लाल-पाड़ सफेद साड़ियां, बंगाली गीत, पारंपरिक खानपान और सांस्कृतिक माहौल लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है. यही वजह है कि रांची में शुरू हुआ यह बंगला सांस्कृतिक मेला अब लोगों के बीच चर्चा का केंद्र बन गया है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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