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रांची : आझीमल्लैकन्ना के रूप में हुई भगवान की पूजा-अर्चना

Updated at : 21 Dec 2019 8:58 AM (IST)
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रांची : आझीमल्लैकन्ना के रूप में हुई भगवान की पूजा-अर्चना

रांची : श्री राणी सती मंदिर लेन रातू रोड स्थित श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर मंदिर (श्रीतिरुपति बालाजी) में धनुर्मास महोत्सव के चौथे दिन श्रीभगवान का श्रीगोदादेवी के रखे हुए नाम आझीमल्लैैकन्ना के स्वरूप में भगवान की आराधना सेवा की गयी. आझीमल्लैकन्ना का अर्थ जलवृष्टि करनेवाले कृष्ण हैं. प्रात: विश्वरूप दर्शन के बाद आगम शास्त्र विधि से तिरू […]

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रांची : श्री राणी सती मंदिर लेन रातू रोड स्थित श्रीलक्ष्मी वेंकटेश्वर मंदिर (श्रीतिरुपति बालाजी) में धनुर्मास महोत्सव के चौथे दिन श्रीभगवान का श्रीगोदादेवी के रखे हुए नाम आझीमल्लैैकन्ना के स्वरूप में भगवान की आराधना सेवा की गयी. आझीमल्लैकन्ना का अर्थ जलवृष्टि करनेवाले कृष्ण हैं. प्रात: विश्वरूप दर्शन के बाद आगम शास्त्र विधि से तिरू आराधना की गयी. फिर दूध, दही, हल्दी, गंगाजल व नारियल युक्त जल से महास्नान कराया गया. फिर वस्त्राभूषण से अलंकृत कर भगवान का सुवासित पुष्पों से भव्य शृंगार किया गया. महाआरती के बाद भोग निवेदन किया गया. शुक्रवार को उद्यास्तमन सेवा के यजमान मुकेश टिवड़ेवाल थे.
क्या है कथा: श्रीगोदा जी नित्य सबेरे फूल तोड़ना, माला गूंथना, पूजा की सामग्री जुटाना आदि कामों में पिता की मदद करती थीं. पिता विष्णु चित्त सूरि (पेरियालवार) जब गाते, तब वह भी उनके साथ गातीं. भगवान की आराधना भजन के सिवा पिता-पुत्री को और कोई काम नहीं था.
श्रीगोदा जी दिन-रात भगवान के बारे में सोचा करतीं. भगवान को कौन सा फूल पसंद आयेगा. कैसी माला पहन कर वे प्रसन्न होंगे. इस प्रकार रोज ही माला गूंथ कर स्वयं पहन कर शीशे में देखती और फिर उतार कर भगवान को पहनाने के लिए पिता को दे देतीं. इस कृत को देख कर पिता बहुत क्रोधित हुए. फिर उनको भगवान ने स्वप्न दिया कि मैं गोदा की धारण की हुई माला ही पहनूंगा.
तब पेरियालवार की खुशी का ठिकाना न रहा. वहीं, पेरियालवार ने पुुत्री गोदा पर क्रोध किया था. इस कारण गोदा रोती-रोती सो गयी थी. भगवान के वचन सुन कर पेरियालवार ने गदगद होकर गोदा को उठाया और बोले- बेटी तुम धन्य हो. तेरे कारण आज मैं धन्य हो गया. अभी भगवान ने मुझे स्वयं दर्शन दिये हैं. मुझसे भूल हुई थी. श्री गोदा देवी ने दिव्य प्रबंधों का प्रणयन किया है, जिसका नाम तिरूप्पावै है. तिरूप्पावै द्रविड़ भाषा में लक्ष्मी व्रत को कहते हैं.
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