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बिहार-झारखंड के शक्तिपीठ

Updated at : 06 Oct 2019 2:29 AM (IST)
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बिहार-झारखंड के शक्तिपीठ

कत्यायनी सिंह लेखिका बिहार के भभुआ से चंद किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में कैमूर की पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी एवं महामंडलेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है. इसमें साढ़े तीन फीट की काले पत्थर की माता की प्रतिमा है और वे भैंस पर सवार हैं. इस धाम में पूजा की परंपरा 19 सौ सालों से अविच्छिन्न चली […]

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कत्यायनी सिंह लेखिका

बिहार के भभुआ से चंद किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में कैमूर की पहाड़ी पर माता मुंडेश्वरी एवं महामंडलेश्वर महादेव का एक प्राचीन मंदिर है. इसमें साढ़े तीन फीट की काले पत्थर की माता की प्रतिमा है और वे भैंस पर सवार हैं. इस धाम में पूजा की परंपरा 19 सौ सालों से अविच्छिन्न चली आ रही है. इस मंदिर को कब और किसने बनाया, यह कहना कठिन है, लेकिन एक शिलालेख के अनुसार माना जाता है कि उदय सेन नामक क्षत्रप के शासन में इसका निर्माण हुआ.
मंदिर परिसर में विद्यमान शिलालेखों से इसकी ऐतिहासिकता प्रमाणित होती है. मंदिर का एक शिलालेख कोलकाता संग्रहालय में भी संरक्षित है. पुरातत्वविदों के अनुसार यह शिलालेख वर्ष 349 से 636 के बीच का है. मंदिर की प्राचीनता का आभास यहां मिले महाराजा दुत्तगामनी की मुद्रा से भी होता है, जो बौद्ध साहित्य के अनुसार अनुराधा वंश का था और ईसा पूर्व 101-77 में श्रीलंका का शासक रहा.
कहते हैं कि चंड-मुंड के नाश के लिए जब देवी उद्यत हुई थीं, तो चंड के विनाश के बाद मुंड युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी में छिप गया था. यही पर माता ने मुंड का वध किया था. इसलिए यह माता मुंडेश्वरी देवी के नाम से प्रसिद्ध हैं. इसके प्रत्येक कोने पर शिवलिंग हैं. खंडित मुर्तियां भी हैं, जो पहाड़ी के रास्ते में रखी हुई हैं या फिर पटना संग्रहालय में हैं.
रजरप्पा मंदिर
रजरप्पा झारखंड के रामगढ़ जिले में स्थित एक तीर्थस्थल है. यह रांची से करीब 80 किलोमीटर दूर है. रामगढ़ से रजरप्पा की दूरी 28 किमी है. यहां का झरना और मां छिन्नमस्तिका का मंदिर प्रसिद्ध है. रजरप्पा के भैरवी-भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर मां छिन्नमस्तिका का मंदिर है. इस मंदिर को ‘प्रचंडचंडिके’ के रूप से भी जाना जाता है.
इस मंदिर को भी शक्तिपीठ माना जाता है. मंदिर के निर्माण काल के बारे में पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है. रजरप्पा मंदिर की कला और वास्तुकला असम के प्रसिद्ध कामख्या मंदिर के समान है. यहां मां काली मंदिर के अलावा विभिन्न देवी-देवताओं के मंदिर मौजूद हैं.
मंदिर के अंदर काली की प्रतिमा है, उसमें उनके दाएं हाथ में तलवार और बाएं हाथ में अपना ही कटा हुआ सिर है. शिलाखंड में देवी की तीन आंखें हैं. इनका गला सर्पमाला और मुंडमाल से सुशोभित है. कदमों में कामदेव और रति हैं और अगल-बगल उनकी सहेलियां- डाकिनी और वर्णिनी खडी हैं. इस स्थान में अनेक मंदिर और मूर्तियां स्थापित है, जिनसे इसकी पवित्रता बढ़ जाती है.
ताराचंडी मंदिर
ताराचंडी मंदिर रोहतास जिले के सासाराम से दक्षिण दिशा में पांच किलोमीटर की दूरी पर है. इस मंदिर को जागृत शक्तिपीठ माना जाता है. यह भी मान्यता है कि मां ताराचंडी पीठ भारत के 52 पीठों में सबसे पुराना है.
यह भी माना जाता है कि जब सती का शरीर क्षत-विक्षत होकर विभिन्न स्थानों पर गिरा, तो ताराचंडी पीठ पर सती की ‘दाहिनी आँख’ गिरी थी. ताराचंडी मंदिर में अवस्थित मां तारा व सूर्य की प्रतिमा तथा बाहर रखी अग्नि, गणेश व अर्घ्य सहित शिव लिंग को खंडित प्रतिमाएं इस स्थान की प्राचीनता के द्योतक हैं. देवी प्रतिमा के बगल में बारहवीं सदी के खरवारवंशी राजा महानायक प्रताप छवि देव का एक शिलालेख भी है, जो 1169 का है.
कहा जाता है कि महर्षि विश्वामित्र ने इस पीठ का नाम तारा रखा था और यहीं पर परशुराम ने सहस्रबाहु को पराजित कर मां तारा की उपासना की थी. चारों तरफ पहाड़, झरने और जल स्त्रोतों के बीच स्थित ताराचंडी मंदिर का मनोरम वातावरण मन मोह लेता है.
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