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स्मृति शेष : पढ़ें स्व अरुण जेटली के निधन पर सरयू राय का संस्मरण

Updated at : 26 Aug 2019 6:00 AM (IST)
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स्मृति शेष : पढ़ें स्व अरुण जेटली के निधन पर सरयू राय का संस्मरण

सरयू राय अरुण जी व्यक्तियों, वस्तुओं के साथ परिस्थिति के भी पारखी थे अरुण जेटली जिस सम्मान के हकदार थे, वह सम्मान देश ने उन्हें मरणोपरांत दिया. राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता, विधि क्षेत्र, क्रिकेट जगत के धुरंधरों ने, जिनमें उनके आलोचक भी शामिल हैं, वैचारिक परिधि लांघ कर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को सराहा. अरुण जी […]

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सरयू राय
अरुण जी व्यक्तियों, वस्तुओं के साथ परिस्थिति के भी पारखी थे
अरुण जेटली जिस सम्मान के हकदार थे, वह सम्मान देश ने उन्हें मरणोपरांत दिया. राजनीति, प्रशासन, पत्रकारिता, विधि क्षेत्र, क्रिकेट जगत के धुरंधरों ने, जिनमें उनके आलोचक भी शामिल हैं, वैचारिक परिधि लांघ कर उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को सराहा.
अरुण जी व्यक्तियों, वस्तुओं और परिस्थिति के भी पारखी थे. वार्तालाप के दौरान समय मानो ठहर जाता था. कितना फेंका गया, कौन लपेटा गया, क्या समेटा गया, इस पर ध्यान देने की फुर्सत नहीं रहती थी. वे सूचनाओं के भंडार थे.
अंग्रेजी में कहावत है – इनफॉर्मेशन इज पावर, यानी सूचना शक्ति है. अंग्रेजी की एक और कहावत है- सक्सेस हैज मेनी फादर्स बट फेल्युइज आर ऑर्फन. यानी सफलता के अनेक बाप होते हैं पर असफलता टुअर होती है. यह वस्तुस्थिति उस समय मेरे समक्ष भी थी. जब मैं 2009 में विधानसभा चुनाव बहुत कम अंतर से हार गया था.उस समय जब भी मेरी भेंट बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से होती थी, वे कहते थे कि बिहार चले जाइये़. इस बीच अरुण जी एक कार्यक्रम के सिलसिले में पटना में थे. मैं उनसे मिलने गया.
मुझसे पूछा, किसने आपको झारखंड जाने के लिये कहा था. नीतीश की बात क्यों नहीं मान लेते. ऐसा लगा मानो मेरे चुनाव हार जाने और नीतीश द्वारा मुझे कही गयी बात की उन्हें पूरी सूचना है.
इसी प्रकार एक वाकया संसद भवन के सेंट्रल हॉल का है. अरुण जी संसद चलते समय दिन में एकाध बार सेंट्रल हॉल में जरूर बैठते थे. मैंने उन्हें देखा तो सोचा जाकर नमस्कार कर लू़ं उन्होंने बिठाया. वार्तालाप के दौरान अचानक मेरी ओर मुखातिब हुए और पूछ बैठे कि राय साहब आपके दो घनिष्ठ मित्र हैं और दोनों ही मेरे पीछे पड़े रहते हैं. भौंचक होकर मैंने पूछा कि ऐसे कौन मेरे मित्र हो सकते हैं. उन्होंने तपाक से कहा. एक गोविंदाचार्य और दूसरे सुब्रमण्यम स्वामी.
मुझे तो सबके बीच मानो काठ मार गया. मैंने विनम्रता से कहा कि सुब्रमण्यम स्वामी निहायत स्वतंत्र विचारों के व्यक्ति हैं. उनके और आपके बीच साबूत बच जाने की स्थिति मेरी नहीं है. जहां तक गोविंद जी की बात है, तो वे मेरे मित्र नहीं बल्कि मेंटर रहे हैं और एक हद तक आपके भी रहे हैं. आप इन दोनों को मेरा मित्र बताकर नाहक मेरा स्तर ऊंचा कर रहे हैं.
मैं सेंट्रल हॉल से झारखंड भवन के रास्ते में था कि उनका फोन आया. उन्होंने कहा कि नॉर्थ ब्लाॅक के मेरे ऑफिस में आ जाइये. उनके कहे अनुसार मैं नॉर्थ ब्लॉक स्थित वित्र मंत्री के ऑफ़िस पहुंचा, तो उन्होंने कहा कि सबके बीच ऐसा कहने के प्रति मेरा कोई उद्देश्य नहीं था. एक ऐसे व्यक्तित्व का असमय उठ जाना मेरे लिये निजी आघात है.
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