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रांची : कृषि मंत्री ने नहीं दी प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति

Updated at : 16 May 2019 2:50 AM (IST)
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रांची :  कृषि मंत्री ने नहीं दी प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति

शकील अख्तर, रांची : कृषि मंत्री रणधीर सिंह ने को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले के आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति दिये बिना ही फाइल लौटा दी. बैंक के पूर्व महाप्रबंधक जयदेव सिंह के खिलाफ एफआइआर की अनुमति की मांग से संबंधित फाइल दो महीने तक मंत्री के पास पड़ी रही. जनवरी से ही प्राथमिकी […]

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शकील अख्तर, रांची : कृषि मंत्री रणधीर सिंह ने को-ऑपरेटिव बैंक घोटाले के आरोपी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने की अनुमति दिये बिना ही फाइल लौटा दी. बैंक के पूर्व महाप्रबंधक जयदेव सिंह के खिलाफ एफआइआर की अनुमति की मांग से संबंधित फाइल दो महीने तक मंत्री के पास पड़ी रही.

जनवरी से ही प्राथमिकी दर्ज करने की कोशिश की जा रही है. को-ऑपरेटिव बैंक में हुए घोटाले की जांच में इस अधिकारी को भी दोषी पाया गया था. सहयोग समितियों के पूर्व निबंधक की अध्यक्षता में गठित समिति ने 2018 में मामले की जांच की थी.
इसमें पाया गया था कि बतौर महाप्रबंधक जयदेव सिंह ने सुनियोजित साजिश कर 1.23 करोड़ की एक ही योजना को छह टुकड़ों में बांट कर विभागीय स्तर पर काम कराने और भुगतान में मदद की थी. तब सरकार ने दोषी पाये गये अफसरों के खिलाफ कार्रवाई करने का फैसला किया था. इसके आलोक में राजेश कुमार तिवारी सहित अन्य के खिलाफ जनवरी, 2019 में प्राथमिकी दर्ज करायी जा चुकी है.
लेकिन बैंक के पूर्व जीएम जयदेव सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं करायी जा सकी है. नियमानुसार राजपत्रित अफसर के खिलाफ किसी मामले में प्राथमिकी दर्ज कराने के लिए मंत्री और मुख्यमंत्री की अनुमति लेने का प्रावधान है. जयदेव सिंह के खिलाफ प्राथमिकी की अनुमति से संबंधित फाइल अभी मंत्री के स्तर ही अनुमोदित नहीं हो सकी है. जबकि मामले की फाइल जनवरी से ही घूम रही है.
क्या है मामला
सरकार ने को-ऑपरेटिव बैंक में घोटाले की शिकायत मिलने के बाद इसकी जांच करायी थी. जांच के कई बिंदुओं में से एक को-ऑपरेटिव बैंक मुख्यालय में मरम्मत के नाम पर गड़बड़ी का आरोप भी शामिल था.
जांच में यह पाया गया था कि बैंक मुख्यालय में 1.23 करोड़ रुपये की एक योजना थी. पूर्व महाप्रबंधक जयदेव सिंह ने सुनियोजित साजिश के तहत इस योजना को दो चरणों में छह टुकड़ों में बांटा, ताकि योजना की स्वीकृति के लिए सरकार के स्तर पर नहीं जाना पड़े.
पहले चरण के दौरान इसे 24.97 लाख और 24.79 लाख रुपये का सिविल वर्क और 22.52 लाख रुपये का इलेक्ट्रिकल वर्क में बांटा गया. दूसरे चरण में फिर 21.43 लाख का सिविल वर्क, 16.89 लाख का सिविल व सेनेटरी वर्क और 12.95 लाख रुपये की फिटिंग आदि के काम में बांटा गया.
इस तरह इस योजना को 25-25 लाख रुपये के काम में बांट कर कार्यपालक अभियंता से तकनीकी स्वीकृति ले ली गयी थी. वहीं काम बिना टेंडर के विभागीय स्तर पर करा लिया गया. इसके बाद एमबी में दर्ज 49.77 लाख रुपये के काम के बदले 99.96 लाख का भुगतान किया गया.
जांच में यह पाया गया कि फरवरी 2018 में 10 लाख, मार्च में 15 लाख, अप्रैल में 24.75 लाख, मई में 15 लाख और जून में 35.21 लाख रुपये का भुगतान किया गया. इस मामले में राजेश कुमार तिवारी, ब्रजेश्वर नाथ और जयदेव सिंह को दोषी पाया गया. लेकिन सरकार से अनुमति नहीं मिलने की वजह से तत्कालीन महाप्रबंधक जयदेव सिंह के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज नहीं करायी जा सकी.
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