रांची : फर्जी डिग्री पर नियुक्त हुए तीन लेक्चरर 33 साल बाद बर्खास्त

Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 24 Feb 2019 3:34 AM

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रांची : रांची विश्वविद्यालय के मांडर कॉलेज में फर्जी डिग्री व प्रमाण पत्र पर नियुक्त हुए तीन लेक्चरर (व्याख्याता) को शनिवार को बर्खास्त कर दिया गया. कुलपति डॉ रमेश कुमार पांडेय की अध्यक्षता में हुई सिंडिकेट की आपात बैठक में 33 साल बाद इनकी सेवा समाप्त करने का निर्णय लिया गया. जिन व्याख्याताओं की सेवा […]

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रांची : रांची विश्वविद्यालय के मांडर कॉलेज में फर्जी डिग्री व प्रमाण पत्र पर नियुक्त हुए तीन लेक्चरर (व्याख्याता) को शनिवार को बर्खास्त कर दिया गया. कुलपति डॉ रमेश कुमार पांडेय की अध्यक्षता में हुई सिंडिकेट की आपात बैठक में 33 साल बाद इनकी सेवा समाप्त करने का निर्णय लिया गया.

जिन व्याख्याताओं की सेवा समाप्त की गयी है, उनमें सच्चिदानंद प्रसाद, हरिशंकर प्रसाद (अर्थशास्त्र विभाग) और मधुप किशोर (मानवशास्त्र विभाग ) हैं. इनमें से एक वर्ष 2020 में सेवानिवृत्त होनेवाले थे.

वर्ष 2008 में मिली थी शिकायत : वर्ष 2008 में विश्वविद्यालय को इन शिक्षकों के प्रमाण पत्र व डिग्री में गड़बड़ी की शिकायत मिली थी. विश्वविद्यालय प्रशासन को मामले की जांच व कार्रवाई करने में दस वर्ष लग गये. गत आठ माह में यह मामला चार बार सिंडिकेट की बैठक में रखा गया था.
परीक्षा बोर्ड द्वारा एक बार प्रमाण पत्र फर्जी बताये जाने के बाद फिर से पिछले दिनों सिंडिकेट ने मामले को परीक्षा बोर्ड को भेज दिया था. परीक्षा बोर्ड ने मामले को कार्यक्षेत्र से बाहर बताया था. बैठक में प्रोवीसी प्रो. कामिनी कुमार, रजिस्ट्रार डॉ अमर कुमार चौधरी, सिंडिकेट सदस्य श्रवण कुमार, अर्जुन राम, एडवर्ड सारेन, फुदो देवी, प्रॉक्टर दिवाकर मिंज, प्राचार्य डॉ वीएस तिवारी उपस्थित थे.
  • 1985 से मांंडर कॉलेज में पढ़ा रहे थे तीनों शिक्षक
  • 10 साल लग गये रांची विश्वविद्यालय को निर्णय लेने में
  • डॉ हरिशंकर का जन्म प्रमाण पत्र था फर्जी
  • डॉ हरिशंकर प्रसाद पर नियुक्ति के लिए गलत जन्म प्रमाण पत्र देने का आरोप था, जिसे जांच कमेटी ने सही पाया.
  • डॉ मधुप किशोर का फर्जी अंकपत्र
  • डॉ मधुप किशोर ने स्नातकोत्तर में 449 अंक होने की बात कही थी, जबकि जांच में पाया गया कि उन्हें 413 अंक मिले थे.
  • डॉ सच्चिदानंद दो साल बाद दी थी इंप्रूवमेंट परीक्षा
  • उन्हें एमए में इंप्रूवमेंट परीक्षा देने के बाद 52.5 फीसदी अंक मिले थे. नियमत: कोई अभ्यर्थी करंट बैच में ही इंप्रूवमेंट परीक्षा दे सकता है. जबकि डॉ किशोर दो वर्ष बाद इंप्रूवमेंट परीक्षा दी थी.
शिक्षकाें ने रखा था अपना पक्ष
विवि प्रशासन ने तीनों को नोटिस जारी किया था. उन्होंने अपना पक्ष विश्वविद्यालय के समक्ष रखा था. डॉ हरिशंकर प्रसाद ने गलत जन्म प्रमाण पत्र के लिए खेद प्रकट किया था. डॉ मधुप किशोर ने विवि द्वारा दिये गये अंक पत्र से अनभिज्ञता जतायी थी. जबकि सच्चिदानंद प्रसाद ने कहा था कि वे परीक्षा नियंत्रक की अनुमति से इंप्रूवमेंट परीक्षा में शामिल हुए थे.
दो कमेटी ने की जांच, महाधिवक्ता से ली राय
शिक्षकों के फर्जी डिग्री मामले की जांच के लिए दो अलग-अलग कमेटी गठित की गयी थी. एक कमेटी डीएसडब्ल्यू डॉ पीके वर्मा की अध्यक्षता में गठित की गयी थी. कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में आरोप को सही बताया था.
इसके बाद मामले में महाधिवक्ता से राय ली गयी. महाधिवक्ता की राय के बाद डॉ अशोक चौधरी की अध्यक्षता में कमेटी गठित की गयी. कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर सिंडिकेट ने शिक्षकों की सेवा समाप्त कर दी. इस दौरान मामला दो बार परीक्षा बोर्ड की बैठक में रखा गया.
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