रांची : अपने विश्वास के प्रति सजग रहें आदिवासी : प्रो मल्लिक
Updated at : 29 Oct 2018 9:19 AM (IST)
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आदिवासी विकास परिषद का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न असम व अंडमान-निकाेबार में झारखंड के आदिवासियों को आदिवासी का दर्जा नहीं रांची : अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन रविवार को बगईचा, नामकुम में संपन्न हुुआ़ इसमें मुख्य वक्ता, झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक प्रो संजय बसु मल्लिक ने कहा कि आदिवासियों […]
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आदिवासी विकास परिषद का राष्ट्रीय अधिवेशन संपन्न
असम व अंडमान-निकाेबार में झारखंड के आदिवासियों को आदिवासी का दर्जा नहीं
रांची : अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद का दो दिवसीय राष्ट्रीय अधिवेशन रविवार को बगईचा, नामकुम में संपन्न हुुआ़ इसमें मुख्य वक्ता, झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक प्रो संजय बसु मल्लिक ने कहा कि आदिवासियों को अपनी विश्वास व्यवस्था (बिलीफ सिस्टम) के प्रति सजग रहने की जरूरत है़
वे जातिवादी नहीं, बल्कि समानतावादी समाज का हिस्सा हैं. शुरू में देश की ज्यादातर आबादी इसी समानतावादी व्यवस्था का हिस्सा थी, जो अब घटकर लगभग दस प्रतिशत ही रह गयी है़ षड्यंत्र के तहत देश में आदिवासी क्षेत्र व आदिवासी आबादी घटायी गयी है़
उन्होंने कहा कि दुनिया में दो तरह की विश्वास व्यवस्था है़ एक मानता है कि ईश्वर ने मनुष्य की सृष्टि की और संसार का सबकुछ मनुष्य के लिए बनाया़ वहीं आदिवासी मानते हैं कि संसार पर सभी जीव-जंतुओं का बराबर हक है़ सबमें जीवन है और सभी हमारे नाते-रिश्तेदार हैं.
इसलिए इन सबको सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी भी हमारी है़ इसलिए उनके नाम के साथ उनका टोटेम भी जुड़ता है, जो किसी पशु-पक्षी आदि के नाम पर होता है़ दूसरी विश्वास व्यवस्था से इतर आदिवासी (संथाल, मुंडा) समाज की मान्यताओं के अनुसार मनुष्य की रचना अंडे से हुई है़
मरने के बाद भी वे किसी स्वर्ग या नरक में नहीं जाते, बल्कि अपने परिवार के साथ अपने घर में ही रहते हैं. आज अंतरराष्ट्रीय समुदाय आदिवासी दर्शन से प्रभावित हो रहा है़ इसी क्रम में संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी अादिवासी अधिकार घोषणापत्र तैयार किया है़ हमें इस विश्वास व्यवस्था को बचाने की जरूरत है़
कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष डॉ केएम मैत्री ने कहा कि असम व अंडमान निकाेबार में यहां के आदिवासियों को आदिवासी का दर्जा नहीं मिला है़ यह चिंता का विषय है़
आदिवासियों के धर्म कोड के लिए सशक्त पहल होनी चाहिए़ हमारी भाषाएं लुप्त हो रही हैं. सरकार इनके संरक्षण के लिए जरूरी कदम उठाये़ अविभाजित बिहार विधानसभा के पूर्व उपाध्यक्ष देवेंद्रनाथ चंपिया ने कहा कि आदिवासियों के संरक्षण के लिए अंगरेजों के समय से ही कई प्रावधान किये गये हैं, पर सरकारें उनके अधिकारों को सीमित कर रही हैं.
कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष सोमजी भाई दामाेर, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शंकरलाल बोडा, सानेलाल कोल, अशोक चौधरी, राम साहेब चव्हाण, लखीभाऊ जाधव, दारासिंग जाबरा, भाष्कर आहेर, बाला साहेब डहाके, विलास बाघमारे, प्रदेश अध्यक्ष गीताश्री उरांव, पश्चिम बंगाल के प्रदेश अध्यक्ष बिरसा तिर्की, मोहनलाल उरांव, रामदेव भगत, तमिलनाडु के मुरुगेसन राव, कर्नाटक के प्रदेश अध्यक्ष डॉ केएम मैत्री, असम के सुभाष तिर्की, नीरेंद्र मिर्धा, तेलंगाना के कोमाराम लक्ष्मण राव, सिधरप्पा काले, बिहार के जीतेंद्र उरांव, नारायण उरांव, असम के दुर्गा हंसदा, डॉ बिरसा उरांव, डॉ अभय सागर मिंज सहित विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधि मौजूद थे़
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