रांची : किसानों के चेहरे पर खुशी लाने के लिए काम करें वैज्ञानिक : राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू
Updated at : 26 Aug 2018 7:46 AM (IST)
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बीएयू में गेहूं और जौ वैज्ञानिकों का तीन दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन शुरू रांची : राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि किसी भी वैज्ञानिक की सफलता का आकलन सिर्फ उनके अनुसंधान करने, किताब लिखने, बुलेटिन प्रकाशित करने और विद्यार्थियों को पीएचडी कराने से नहीं होना चाहिए. किसानों के चेहरे पर खुशी लाना भी उनके लिए […]
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बीएयू में गेहूं और जौ वैज्ञानिकों का तीन दिवसीय अखिल भारतीय सम्मेलन शुरू
रांची : राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि किसी भी वैज्ञानिक की सफलता का आकलन सिर्फ उनके अनुसंधान करने, किताब लिखने, बुलेटिन प्रकाशित करने और विद्यार्थियों को पीएचडी कराने से नहीं होना चाहिए. किसानों के चेहरे पर खुशी लाना भी उनके लिए महत्वपूर्ण है. श्रीमती मुर्मू शनिवार को बीएयू में गेहूं और जौ वैज्ञानिकों के अखिल भारतीय सम्मेलन का उदघाटन करने के बाद बोल रही थीं. तीन दिनी सम्मेलन में देश-विदेश से करीब 300 से अधिक वैज्ञानिक जुटे हुए हैं.
राज्यपाल ने कहा कि बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में अब 11 कॉलेजों का संचालन होने लगा है. इससे यहां से स्नातक करने वाले विद्यार्थियों की संख्या भी बढ़ कर 490 हो गयी है. 2016-17 में इसकी संख्या चार ही थी. इस कारण विद्यार्थियों की संख्या 126 थी. राज्य में बीएयू कई केवीके का भी संचालन कर रहा है. यहां वैज्ञानिकों की कमी है.
इसको दूर करने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद को आगे आना चाहिए. उन्होंने वैज्ञानिकों से लक्ष्य की प्राप्ति के लिए स्पष्ट मिशन, लगन और सतत प्रयास से गति देने और अपने क्षेत्र में लीक से हटकर सोचने व निर्णय लेने का आह्वान किया.
45 साल से उम्र के वैज्ञानिक पुरस्कृत : इस मौके पर उल्लेखनीय काम करने वाले विभिन्न संस्थानों के 45 साल से कम उम्र के वैज्ञानिकों को सम्मानित किया गया. प्रो महतम मेमोरियल अवार्ड-2018 सतीश कुमार को दिया गया. डॉ एम शिवा स्वामी को डॉ एसएमवी राव मेमोरियल अवार्ड दिया गया. डॉ एस नारायण आवार्ड-2018 डॉ सेवा राम को दिया गया.
2050 में 14 करोड़ टन गेहूं की जरूरत होगी : महापात्रा
आइसीएआर के महानिदेशक डॉ त्रिलोचन महापात्रा ने कहा कि 2050 तक देश की लगभग 150 करोड़ आबादी के लिए लगभग 14 करोड़ टन गेहूं की जरूरत होगी. इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए तीव्र गति से तकनीकी विकास करना होगा. ग्लोबल वार्मिंग के संभावित प्रभावों के आलोक में देश में खाद्य सुरक्षा की स्थिति और बिगड़ने की संभावना है.
उन्होंने बताया कि बेहतर अनुवांशिक क्षमता वाले नये प्रभेदों के विकास द्वारा औसत उत्पादन क्षमता के बीच की खाई को पाटने की जरूरत है. उत्तर पूर्वी समतल क्षेत्र की विभिन्न उत्पादन परिस्थितियों के लिए गेहूं के लगभग 120 उन्नत प्रभेद जारी किये गये हैं.
भारतीय गेहूं एवं जौ अनुसंधान संस्थान करनाल के निदेशक डॉ जीपी सिंह ने कहा कि देश में पिछले दस वर्षों में पंजाब एवं हरियाणा के अलावा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार आदि राज्यों में गुणवत्तायुक्त गेहूं के क्षेत्र में काफी सुधार हुआ है. देश में उत्पादित गेहूं की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय मानक के करीब है. अतिथियों का स्वागत करते हुए
महानिदेशक ने किया कृषि अभियंत्रण का निरीक्षण
आइसीएआर के महानिदेशक डॉ त्रिलोचन महापात्र ने सुबह में कृषि अभियंत्रण विभाग का निरीक्षण किया. वहां हो रहे कार्यों की जानकारी ली. विभागाध्यक्ष डॉ डीके रुसिया ने उनको बताया कि राज्य सरकार के साथ मिल कर कई योजनाओं का संचालन हो रहा है. डोभा निर्माण, कृषि उपकरण बैंक निर्माण में संस्थान सहयोग कर रहा है. डॉ महापात्र ने नया मॉडल विकसित करने वाले विद्यार्थियों को पुरस्कार देने का आदेश दिया़
झारखंड में गेहूं की खेती करना चुनौतीपूर्ण : वीसी
कुलपति डॉ परविंदर कौशल ने कहा कि झारखंड में गेहूं की खेती करने को लेकर काफी चुनौतियां है. गेहूं का औसत राष्ट्रीय उत्पादन 3.17 टन प्रति हेक्टेयर है. इसकी तुलना में झारखंड में मात्र 2.21 टन ही उत्पादन हो रहा है. यहां क्षमता की कमी नहीं है. इसके बेहतर उपयोग की जरूरत है. इस दिशा में विश्वविद्यालय और राज्य सरकार मिल कर काम कर रहे हैं. यहां गेहूं की खेती का रकबा बढ़ाना वैज्ञानिकों के लिए चुनौती है. कार्यक्रम का संचालन शशि सिंह व धन्यवाद ज्ञापन निदेशक शोध डॉ डीएन सिंह ने किया.
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