बदहाल छात्रावास : नहीं होता कल्याण के छात्रावासों का निरीक्षण

Updated at : 24 Aug 2018 6:16 AM (IST)
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बदहाल छात्रावास : नहीं होता कल्याण के छात्रावासों का निरीक्षण

संजय राजधानी रांची में ही फेल है पूरी व्यवस्था, कोई रिपोर्ट नहीं बनती, अपने हाल पर जीने को मजबूर हैं छात्र-छात्राएं रांची : कल्याण विभाग ने अपने छात्रावासों के सफल संचालन के लिए वर्ष 2003 में ही नियमावली बना कर इसे अधिसूचित (2993, दिनांक-31 दिसंबर 2003) किया था. इसके बाद पूर्व की नियमावली की ज्यादातर […]

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संजय
राजधानी रांची में ही फेल है पूरी व्यवस्था, कोई रिपोर्ट नहीं बनती, अपने हाल पर जीने को मजबूर हैं छात्र-छात्राएं
रांची : कल्याण विभाग ने अपने छात्रावासों के सफल संचालन के लिए वर्ष 2003 में ही नियमावली बना कर इसे अधिसूचित (2993, दिनांक-31 दिसंबर 2003) किया था. इसके बाद पूर्व की नियमावली की ज्यादातर मूल बातों को छोड़ कुछ नये प्रावधान जोड़ कर वर्ष 2017 में भी नियमावली बनी. पर इसका पालन नहीं हो रहा है. विभिन्न विद्यालयों व कॉलेजों से संबद्ध छात्रावासों में इसकी अनदेखी हो रही है. नियमावली में जिक्र है कि सभी छात्रावासों का निरीक्षण प्रत्येक छह माह में होना है.
निरीक्षण का काम प्रखंड या जिला कल्याण पदाधिकारी करेंगे तथा अपनी रिपोर्ट क्रमश: जिला कल्याण पदाधिकारी व उप निदेशक कल्याण को समर्पित करेंगे, जो अपना समेकित प्रतिवेदन आदिवासी कल्याण आयुक्त व सरकार को भेजेंगे. वहीं सभी छात्रावास अधीक्षकों को भी एक निर्धारित प्रपत्र में छात्रावास संबंधित रिपोर्ट हर तीन माह में जिला कल्याण पदाधिकारी को देनी है. इन दोनों नियमों का पालन कम-से-कम कॉलेजों के छात्रावास में नहीं हो रहा है.
उदाहरण के लिए रांची महिला कॉलेज के साइंस ब्लॉक कैंपस के एक छात्रावास में कोई अधीक्षक ही नहीं है. नियम यह भी था कि हर छात्रावास में प्रतिवर्ष स्थापना दिवस मनाया जायेगा, जिसमें कल्याण विभाग व जिला प्रशासन के संबंधित पदाधिकारी भाग लेंगे. इस कार्यक्रम में छात्रावास संचालन संबंधी विभिन्न बिंदुओं पर चर्चा की जायेगी. पर यह पूरी व्यवस्था राजधानी रांची में ही फेल है. छात्रावासों में बिजली, पानी, शौचालय व पठन-पाठन संबंधी अन्य बुनियादी सुविधाओं की कमी है.
तैयार नहीं हुआ डाटा बेस : छात्रावासों की बदतर स्थिति के मद्देनजर विभाग ने करीब डेढ़ वर्ष पहले ही अपने सभी 641 (509+132) छात्रावासों का डाटा बेस तैयार करने का निर्णय लिया था, जो आज तक पूरा नहीं हो सका है. इसमें छात्रावास व पठन-पाठन संबंधी कुल 228 तरह की सूचनाएं दर्ज होनी थी. इन्हीं सूचनाओं के माध्यम से छात्रावासों की स्थिति का आकलन करने व फिर विभिन्न मदों में बजट आवंटन करने की बात थी.
नयी नियमावली (2017) के अन्य प्रावधान
जिला व राज्य स्तर पर तैयार होगा मास्टर डाटा बेस
क्रमश: वार्डन, जिला
कल्याण पदाधिकारी व आदिवासी कल्याण आयुक्त करेंगे यह काम
छात्रावास की मांग करनेवाले शिक्षण संस्थान अपने जिले के उपायुक्त को आवेदन देंगे
छात्रावास का निर्माण करने या उपलब्ध कराने संबंधी निर्णय उपायुक्त की अध्यक्षता वाली समिति करेगी
वार्डन का आवास छात्रावास परिसर में ही होगा
किसी विद्यार्थी के बीमार होने पर वार्डन चिकित्सीय सहायता उपलब्ध करायेंगे
राजधानी के ज्यादातर छात्रावास बदहाल
रांची : बरसात में छत से टपकता पानी, पर यह पक्का नहीं कि अगले दिन सप्लाई का पानी आयेगा या नहीं. छत के टपकते पानी से बिस्तर खिसकाने तथा पानी की चिंता से बाल्टियों में पानी जमा करने की जद्दोजहद.
यही सच्चाई है राजधानी रांची के बीचोबीच स्थित भागीरथी आदिवासी बालिका महाविद्यालय छात्रावास की. बाथरूम के टूटे दरवाजों के पीछे खुद को छिपाने के लिए दरवाजे पर चादर ढंका देख, यह किसी ग्रामीण घर का दृश्य लगता है. पर दूरदराज के इलाकों से आये आदिवासी विद्यार्थियों के लिए राजधानी में बने ज्यादातर आदिवासी छात्रावासों का यही हाल है़ भागीरथी छात्रावास में फिलहाल 98 छात्राएं है़ं हॉस्टल की जर्जर हालात के कारण छात्रावास अधीक्षक प्रो चौठी उरांव इस साल नयी छात्राओं का दाखिला लेने की हिम्मत नहीं जुटा पायी.
वह बताती हैं कि पिछले साल भी नयी छात्राओं का एडमिशन नहीं लिया था़ राज्यपाल ने 16 फरवरी 2016 को इस हॉस्टल का निरीक्षण किया था़ लंबे अंतराल के बाद इसकी मरम्मत के लिए 16 लाख रुपये स्वीकृत हुए़ पर इसे कम बताने पर 29 लाख, 20 हजार रुपये की पुनरीक्षित स्वीकृति जारी की गयी़ कल्याण विभाग ने इस साल मार्च में भवन निर्माण विभाग को पैसे दे दिये है, पर अब तक मरम्मत का काम शुरू नहीं हुआ है़
ज्यादातर छात्रावासों का यही हाल : राजधानी में आदिवासी विद्यार्थियों के लिए 13 छात्रावास हैं, जिनमें स्वर्णरेखा आदिवासी बालक पीजी छात्रावास, यदुवंश आदिवासी बालक छात्रावास, कार्तिक उरांव आदिवासी बालक छात्रावास, दीप शिखा पीजी आदिवासी बालिका छात्रावास, सरस्वती बालिका छात्रावास, सरना आदिवासी बालिका छात्रावास, आकांक्षा अनुसूचित जाति बालिका छात्रावास (एससी- एसटी के लिए), भागीरथी आदिवासी बालिका महाविद्यालय छात्रावास, वीर बुधु भगत बालक छात्रावास व प्राक प्रशिक्षण आदिवासी बालक छात्रावास शामिल है़ं
इधर दीपशिखा, वीर बुधु भगत, सरना, आकांक्षा, कार्तिक उरांव व स्वर्णरेखा छात्रावास में बावर्ची नहीं है़ं वहीं प्राक प्रशिक्षण आदिवासी बालक छात्रावास में न बावर्ची है, न स्वीपर और न सुरक्षा प्रहरी. सरना आदिवासी बालिका छात्रावास व अनुसूचित जाति बालिका छात्रावास में जब सप्लाई का पानी नहीं आता है, तब वहां की छात्राएं यदुवंश आदिवासी बालक छात्रावास से पानी लेने को मजबूर है़ं
जर्जर हो चुका है एसटी बालक उच्च विद्यालय का छात्रावास
अनुसूचित जनजाति आवासीय बालक उच्च विद्यालय, मांडू के छात्रावास की स्थिति जर्जर है. सूत्रों के अनुसार इसे ध्वस्त कर नया छात्रावास बनाया जाना था. पर बाद में इसी छात्रावास की मरम्मत कर दी गयी.
इस विद्यालय की स्थापना वर्ष 1973 में हुई थी. अभी इसके 88 शैया वाले छात्रावास में 248 बच्चे रहते हैं. एक बेड पर दो-तीन छात्र. छात्रावास की रसोई विद्यालय के पुराने कक्ष में संचालित है. इसकी स्थिति भी जर्जर है.
जर्जर भवन से टपकता है पानी साफ-सफाई भी नहीं की जाती
केवल आश्वासन देकर चले जाते हैं अधिकारी
लोहरदगा जिला के आदिवासी छात्रावास पूरी तरह जर्जर हैं. यहां कॉलेज की 250 तथा हाईस्कूल की 67 छात्राएं रहती हैं. वर्ष 2012 में इसकी मरम्मत हुई थी, पर इसके छत से पानी टपकता है. छात्रावास का रसोईघर तो ठीक है, पर जल निकासी न होने से जल जमाव की समस्या है.
छात्रावास परिसर में नियमित सफाई नही होती तथा यह गंदा नगर अाता है. वार्डेन नौरी तिर्की ने कहा कि सरकार से कोई अार्थिक मदद न मिलने से व्यवस्था संभालना मुश्किल हो रहा है. शौचालय के साथ-साथ चहारदीवारी की स्थिति जर्जर है. छात्राअों ने कहा कि यहां सुविधा के नाम पर कुछ नहीं है. जिले के वरीय अधिकारी आते हैं तथा आश्वासन देकर चले जाते हैं.
जिला स्कूल, हजारीबाग के मैदान के पास आदिवासी बालक छात्रावास के दो भवन हैं. पुराने भवन की छत से पानी टपकता है. यहां शौचालयों में मल निकासी के पाइप फटे हुए हैं. इसके सफाई की कोई व्यवस्था नहीं है. वहीं मोटर खराब रहने से छात्रों को बोरिंग का पानी नहीं मिलता है.
यहां लगभग 300 विद्यार्थी रहते हैं, जिन्हें पास के चापानल से पानी का जुगाड़ करना पड़ता है. विद्यार्थियों ने बताया कि छात्रावास में जेनरेटर की सुविधा नहीं है. सोलर प्लेट सिर्फ दिखावे के लिए लगा है. बिजली की खराब स्थिति के कारण पढ़ाई बाधित होती है. जिला कल्याण पदाधिकारी से मिल कर कई बार पानी, बिजली, सफाई व अन्य सुविधाओं की मांग की गयी, जो आज तक नहीं मिली है.
शौचालय नहीं होने से खुले में शाैच करना बनी मजबूरी
जिला मुख्यालय स्थित आदिवासी बालक छात्रावास में कुल 65 छात्र रहते हैं. नियुक्ति हो जाने पर भी रसोइया व वार्डन के नहीं रहने से इन छात्रों को स्वयं भोजन बना कर खाना पड़ता है तथा व्यवस्था संभालनी होती है.
शौचालय भर जाने तथा इसकी स्थिति जर्जर होने के कारण यहां के छात्रों को खुले में शौच जाना पड़ता है. छात्रावास परिसर में सिर्फ एक चापाकल है, जिससे फ्लोराइड युक्त पानी निकलता है. पर मजबूरी में छात्रों को वही पानी का सेवन करना पड़ रहा है. छात्रों का कहना है कि जब से झारखंड अलग राज्य बना है तब से छात्रावास की स्थिति अत्यंत दयनीय है.
स्व डॉ रामदयाल मुंडा का छात्रावास तक है बदहाल
खूंटी के एसएस प्लस टू हाइस्कूल के ठक्कर बप्पा छात्रावास की स्थिति भी दयनीय है़. यह वही छात्रावास हैं, जहां कभी स्व डॉ़ रामदयाल मुंडा रह कर पढ़ाई करते थे. कल्याण विभाग द्वारा संचालित इस छात्रावास में सरकार के द्वारा महज भवन बनाया गया है़
छात्रावास में एक पुस्तकालय तो है, लेकिन किताब नहीं है़ छात्रों ने कहा कि छात्रावास में रसोइया, सफाई कर्मी व गार्ड सहित कोई कर्मी नहीं है़ सारी जिम्मेवारी छात्रों के हाथों पर ही है़ छात्रावास अधीक्षक प्रेमानंद सिंह ने बताया कि इस छात्रावास का निर्माण वर्ष 1954 में हुआ था, तब यहां सारी सुविधाएं थी़ं
पर अब झारखंड बनने के बाद कोई सुविधा नहीं मिलती. कल्याण विभाग द्वारा 100 बेड का नया भवन 2004 में बनाया गया़ पर यहां के कुल 16 शौचालय में से चार-पांच ही ठीक हैं. कुछ वर्ष पूर्व सोलर प्लेट लगाये गये थे, लेकिन वह भी बेकार है़ अधिक बारिश होने पर छत से पानी भी टपकता है़ सफाई कर्मी नहीं होने के कारण छात्रों को खुद ही पूरे छात्रावास की सफाई करनी पड़ती है़
एसएस हाई स्कूल, गुमला के छात्रावास में रसोइया नहीं है. यहां छात्रों को अपना भोजन खुद ही बनाना होता है. इससे उनकी पढ़ाई बाधित होती है. इस छात्रावास में रहने के लिए 10 कमरे हैं. एक में रसोई बनती है तथा शेष नौ कमरों में 60 छात्र रहते हैं. सोने के लिए चौकी भी नहीं मिली है.
बच्चों ने अपने खर्च से चौकी खरीदी है. सोना व पढ़ना, दोनों इसी पर होता है. छात्रावास का शौचालय नया है. पर यहां पानी नहीं है. बच्चों को इधर-उधर से पानी का जुगाड़ करना पड़ता है. हॉस्टल छात्र प्रमुख शिवकुमार खेरवार के अनुसार विभाग को कई बार पत्र लिख कर छात्रावास की समस्या दूर करने की मांग की गयी, पर समाधान नहीं हुआ है.
दो वर्ष से नहीं मिला है फंड
सदर प्रखंड कार्यालय के समीप हरिजन छात्रावास है, जिसका निर्माण 2003 में कल्याण विभाग द्वारा किया गया था. पर 15 साल में ही काफी जर्जर हो गया है. अभी 32 लाख की लागत से इसकी मरम्मत हो रही है.
इस छात्रावास में अनुसूचित जाति के 90 व अनुसूचित जनजाति के चार बच्चे रहते हैं, जो विभिन्न विद्यालय व कॉलेजों में पढ़ते हैं. इस छात्रावास के संचालन व सुविधाअों के लिए वर्ष 2015 के बाद से फंड नहीं मिला है. कमोबेश यही स्थिति सिमरिया, लावालौंग, हंटरगंज व प्रतापपुर में अनुसूचित जाति आवासीय प्राथमिक व उच्च विद्यालयों के छात्रावास की भी है. यहां भी फंड का अभाव है. सिमरिया अनुसूचित जाति आवासीय बालिका प्राथमिक विद्यालय व छात्रावास की स्थिति भी जर्जर हैं. शौच के लिए बच्चों को पानी चापाकल से लाना पड़ता है.
असुरक्षित हैं हॉस्टल की छात्राएं
एनएसी पार्क, सिमडेगा के पास स्थित आदिवासी छात्रावास में रह रही 55 छात्राएं विभिन्न समस्याओं से जूझ रही हैं. छात्रावास में सुरक्षा प्रहरी नहीं है. इससे छात्राअों में भय व्याप्त रहता है. बिजली आपूर्ति के लिये सौर ऊर्जा की व्यवस्था की गयी थी, जो गत पांच वर्षों से खराब है. बताया गया कि सोलर बैटरी खराब हो चुकी है. छात्रावास में बेड नहीं है. वायरिंग खराब है. छात्राएं खुद तार जोड़ कर बल्ब जलाती हैं. उधर किचेन में छत से पानी टपकता है. खाना बनाने के लिए छात्राएं अपने घर से लकड़ी लेकर आती हैं. चावल, दाल व सब्जी भी.
खाली हैं कमरे, कोई सुविधा नहीं
गढ़वा जिले में आदिवासी बहुल रंका, रमकंडा और चिनिया प्रखंड में एक-एक आदिवासी छात्रावास है. इनके अलावा कल्याण विभाग द्वारा जिला मुख्यालय में आदिवासी बालिका छात्रावास भी बनाया गया है. रंका में वर्ष 1986 में आदिवासी खरवार बालक छात्रावास बना है. इस छात्रावास में 13 कमरे, एक किचेन कमरा और शौचालय है.
पानी के लिये मात्र एक चापाकल है. लेकिन गत 32 वर्षों में इन सभी छात्रावासों की स्थिति जर्जर हो चुकी है. छात्रावास के दस कमरे, रसोईघर व चहारदीवारी टूट चुकी है. अभी छह साल पहले छात्रावास का नया भवन, शौचालय व रसोई घर बने हैं. पर यहां बेड सहित अन्य सामान बच्चों को घर से लाना पड़ता है. असुविधा के कारण अभी छात्रावास में सिर्फ 20 बच्चे रह रहे हैं.
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